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ब्लॉग

टकराव की राह पर न्यायपालिका और विधायिका

भारत में विधायिका और न्यायपालिका के बीच फिर से टकराव की स्थिति पैदा हो गई है. इस बार टकराव की वजह कोई कानूनी मसला या अहं नहीं बल्कि भ्रष्टाचार है. अखाड़ा खोदने में एक पूर्व जज महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने एकसूत्री कार्यक्रम के तहत न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के छुपे दाग धब्बों को उजागर करने की मुहिम छेड़ दी है. हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट में भ्रष्टाचार के कथित आरोपों में घिरे एक जज को सेवाविस्तार देने का मामला उजागर करने के बाद उन्होंने अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक नहीं पांच जजों के भ्रष्टाचार का खुलासा किया है. उनके खुलासों से जाने-अनजाने देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एचएस कपाडिया और जस्टिस आरसी लाहोटी की निष्पक्षता पर भी उंगली उठ गई है, जिन्होंने राजनीतिक दलों के हस्तक्षेप के डर से नरमी बरती थी.

सवाल टाइमिंग का

जस्टिस काटजू के खुलासों से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की पर्तें उजागर होना अलग बात है मगर इसके समय को लेकर वे खुद सवालों के घेरे में हैं. एक तो यह कि न्यायपालिका में रहते हुए उन्होंने इतनी मुखरता से इन मामलों को कभी नहीं उठाया. सितंबर 2011 में सेवानिवृत्त होने के बाद वह ये खुलासे कर सकते थे. कानून और न्यायिक गतिविधियों पर बारीक नजर रखने वालों का कहना है कि जस्टिस काटजू भारत में निजाम बदलने के बाद अपना भविष्य सुरक्षित रखने के लिए यह सब कर रहे हैं. खासकर तब जबकि इस साल बतौर प्रेस परिषद के अध्यक्ष उनका कार्यकाल पूरा होने वाला है.

जस्टिस काटजू के खुलासे ऐसे समय में हो रहे हैं जबकि केन्द्र सरकार जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को बदलने की कवायद में जुटी है. सरकार ने जजों की नियुक्ति कॉलेजियम के बजाय न्यायिक नियुक्ति आयोग के मार्फत कराने के लिए एक बिल संसद में पेश कर दिया है. उसकी इस राह में जस्टिस काटजू के खुलासे मददगार बन रहे हैं. उनके हर खुलासे के साथ न्यायपालिका में साफ सफाई का मुद्दा गरमा रहा है.

परस्पर विरोधी रुख

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चल रही बहस में अब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी चुप्पी तोड़ दी है. देश के मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा ने कॉलेजियम व्यवस्था को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि न्यायपालिका की छवि खराब करने का अभियान चलाया गया है जो भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है. इतना ही नहीं जस्टिस लोढ़ा ने कॉलेजियम सिस्टम को बेहतर बताते हुए न्यायिक आयोग के गठन का परोक्ष विरोध दर्ज करा दिया है.

चीफ जस्टिस लोढ़ा की टिप्पणी आने के बाद ही सरकार ने न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन से जुड़ा विधेयक संसद के पटल पर रखा. इतना ही नहीं कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जस्टिस काटजू के खुलासों पर यह कहकर आग में घी डालने का काम कर दिया कि इससे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की हकीकत सामने आ रही है और इसे रोकने के लिए वचनबद्ध सरकार संसद के माध्यम से सबकी सहमति से समाधान की ओर बढ़ रही है.

कहां से आएंगे ईमानदार

भारत में व्यवस्था के सभी अंग भ्रष्टाचार के दलदल में सने हुए हैं. इस हकीकत से कोई मुंह नहीं मोड़ सकता है. इस बीमारी से अब तक न्यायपालिका अछूती दिख रही थी. विधायिका या कार्यपालिका के लोग अवमानना के डर से अदालतों पर उंगली नहीं उठाते थे. मगर अब एक रिटायर्ड जज ने यह मुहिम छेड़ कर हकीकत से मुंह मोड़ने की प्रवृत्ति पर लगाम लगा दी है. जस्टिस काटजू ने न्यायपालिका को अपनी गिरेबां में झांकने की नसीहत देते हुए सवाल उठाया है कि क्या जजों के भ्रष्टाचार से न्यायपालिका की बदनामी होती है या ये मामले उजागर करने से.

इस तरह की तमाम दलीलों के बीच व्यवहारिकता का तकाजा है कि कानूनी पैबंद समस्या का समाधान तब तक नहीं हो सकते हैं जब तक कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए पूरे समाज के स्तर पर पहल न की जाए. आखिरकार जज और नौकरशाह से लेकर नेता तक, हर स्तर पर ईमानदार लोग निकल कर तो समाज से ही आएंगे.

ब्लॉग: निर्मल यादव

संपादन: महेश झा

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