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दुनिया

झगड़े से बातचीत भली

यूक्रेन विवाद पर अमेरिका और रूस के बीच सहमति नहीं हो पाई. लेकिन अच्छी बात यह है कि दोनों पक्ष एक दूसरे से बात कर रहे हैं. डॉयचे वेले के बैर्न्ड रीगर्ट इसे उम्मीद की किरण मानते हैं. अच्छा होता यदि मेज पर यूक्रेन भी होता.

अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी और उनके रूसी साथी सेर्गेई लावरोव ने पांच घंटे तक बातचीत की. भले ही पेरिस में कोई समाधान न निकला हो, यह सकारात्मक संकेत है कि रूस और पश्चिम फिर से एक दूसरे के साथ बात कर रहे हैं. जब तक बातचीत चल रही है और कूटनीति को मौका दिया जा रहा है तब तक रूस शायद ही उन 30 से 40 हजार सैनिकों का इस्तेमाल करेगा जो उसने यूक्रेन की सीमा पर तैनात कर रखा है. केरी और लावरोव की बातचीत का लक्ष्य तनाव कम करना और समझदार कूटनीति की ओर वापस लौटना होना चाहिए.

अमेरिका और रूस के राष्ट्रपतियों की भेंट पर भी कोई रोक नहीं होनी चाहिए, यदि उससे पुतिन ट्रांसनिस्ट्रिया को लपकने की कथित मंशा से पीछे हटें. यह सोवियत काल की याद में डूबे लोगों वाला यूक्रेनी सीमा पर स्थित वह इलाका है जो मोल्दाविया गणतंत्र का हिस्सा है. इस बार राष्ट्रपति पुतिन ने बराक ओबामा को फोन कर पहला कदम उठाया है. इसलिए कहा जा सकता है कि कुछ दिन पहले द हेग में तय पश्चिमी रणनीति को पहली सफलता मिली है. रूसियों ने देखा कि वे अंतरराष्ट्रीय तौर पर अलग थलग पड़ रहे हैं. बाकी काम आर्थिक आंकड़ों ने किया.

संभवतः खुद पुतिन नहीं बल्कि आर्थिक रूप से प्रभावशाली उनके करीबी लोग तनाव में कमी चाहते हैं. हालांकि आर्थिक प्रतिबंध अभी नहीं लगाए गए हैं, निवेशक रूस से भाग रहे हैं. सिर्फ पश्चिमी उद्यम ही रूस से किनारा नहीं कर रहे हैं, धनी रूसी भी अपना पैसा देश से बाहर निकाल रहे हैं. रूबल की कीमत गिर रही है और रूस का केंद्रीय बैंक इस साल विकास दर में स्थगन की उम्मीद कर रहा है.

Russische Zentralbank Moskau

रूस का केंद्रीय बैंक

बराक ओबामा और यूरोपीय संघ ने पिछले दिनों में साफ कर दिया है कि यदि रूस यूक्रेन में और कार्रवाई करता है तो वे आर्थिक शिकंजे को और कस देंगे. कम से कम दूरगामी रूप से यूरोप रूस से ईंधन के आयात में कमी लाएगा. पश्चिमी देशों की इस दृढ़ता के कारण क्रेमलिन सोचने को मजबूर हुआ है.

पुतिन के अहं पर ओबामा के सोचे समझे हमले ने भी शायद अपना काम किया है. ओबामा ने रूस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूसरे दर्जे की क्षेत्रीय सत्ता बताया था. ताकत का ऐसा प्रदर्शन संभवतः असर डालता है. लेकिन रूस को जिस बात ने भी बातचीत की मेज पर लाने में भूमिका निभाई हो, पश्चिम को जीत की खुशी में पड़ने से बचना चाहिए, जैसा कि अमेरिका के कुछ कंजरवेटिव हल्कों में दिख रहा है. अहंकार रूस को नाराज कर सकता है. पहले की ही तरह यूक्रेन संकट का समाधान खोजने के लिए रूस की जरूरत है.

अमेरिका यूक्रेन की सीमा से रूसी सैनिकों की वापसी की मांग पर अड़ा है. उसकी दलील है कि सैनिकों के द्वारा डर और धमकी का माहौल बना है. रूस इस मांग को मानेगा, इसमें संदेह है. वह एक तटस्थ यूक्रेन की मांग कर रहा है जिसका संघीय ढांचे वाला संविधान रूसी अल्पसंख्यकों को ज्यादा अधिकार दे. नाटो की सदस्यता की संभावना न हो. यूक्रेन अपनी संप्रभुता में इस कटौती को स्वीकार करेगा या उसे इसे स्वीकार करना चाहिए, यह विवादास्पद है. सेर्गेई लावरोव यूक्रेन पर बात करना चाहते हैं, उसके साथ नहीं. इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. जॉन केरी ने साफ कर दिया है, "यूक्रेन पर उसके बिना कोई फैसला नहीं होगा."

ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिकी विदेश मंत्री अब क्रीमिया से रूसियों की वापसी की मांग नहीं कर रहे हैं, जिसे उसने पश्चिमी देशों के अनुसार गैरकानूनी तरीके से हथिया लिया है. केरी सैनिक झगड़े के बढ़ने को रोकना चाहते हैं. उन्होंने और यूरोपीय देशों ने मान लिया है कि यूक्रेन के लिए क्रीमिया अब खो चुका है. रूस उसे वापस नहीं करेगा. इसलिए सारे कूटनैतिक प्रयासों के बावजूद रूस के साथ रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते. उस पर दबाव बना रहना चाहिए. व्लादिमीर पुतिन ने अपनी विस्तारवादी नीति के कारण खुद को बदनाम कर लिया है. कम से कम उन्हें यह समझ में आया है कि उनकी सीमाएं क्या हैं.

समीक्षा: बैर्न्ड रीगर्ट/एमजे

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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