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मनोरंजन

जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो

अपने नाम वहीदा लाजवाब को साकार करती हिन्दी फिल्मों की सदाबहार अभिनेत्री वहीदा रहमान अपने करिश्माई अभिनय से पांच दशक से सिने प्रेमियों के दिलों पर राज कर रही हैं.

वहीदा रहमान का जन्म 14 मई 1938 को तमिलनाडु के चेंगलपट्टू में हुआ. उनके पिता जिलाधिकारी थे. बचपन से ही वहीदा रहमान का रुझान नृत्य और संगीत की ओर था. उनके पिता उन्हें प्रेरित किया और भरतनाट्यम सीखने की व्यवस्था कर दी. वहीदा रहमान जल्द ही नृत्य कला में पारंगत हो गई और 13 वर्ष की उम्र से स्टेज पर कार्यक्रम करने लगीं.

जल्द ही उनके नृत्य की प्रशंसा होने लगी. फिल्म निर्माता उन्हें अपनी फिल्म में काम करने के लिए पेशकश करने लगे लेकिन उनके पिता ने उन्हें यह कहकर ठुकरा दिया कि वहीदा अभी बच्ची है और यह उम्र उसके पढ़ने लिखने की है. पर पिता की असामयिक मृत्यु से घर की आर्थिक जिम्मेदारी वहीदा पर आ गई. पिता के एक मित्र की सहायता से उन्हें एक तेलगु फिल्म में काम करने का मौका मिला. फिल्म सफल रही और उनके अभिनय को भी सराहा गया.

गुरूदत्त का साथ

हैदराबाद में फिल्म के प्रीमियर के दौरान निर्माता गुरूदत्त के एक डिस्ट्रीब्यूटर वहीदा के अभिनय को देखकर काफी प्रभावित हुए. उन्होंने वहीदा को गुरूदत्त से मिलने की सलाह दी. वहीदा छोटी थी इसलिए उनकी मां गुरूदत्त से मिलने गई. बाद में गुरूदत्त ने वहीदा को स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया और अपनी फिल्म 'सीआईडी' में काम करने का मौका दिया.

फिल्म निर्माण के दौरान गुरूदत्त ने वहीदा को नाम बदलने की सलाह दी. लेकिन उन्होंने साफ इंकार करते हुए कहा कि उनका नाम वहीदा ही रहेगा. दरअसल वहीदा का अर्थ है 'लाजवाब', इसलिए वे अपना नाम बदलने को तैयार नहीं थीं. बाद में वहीदा रहमान ने अपने लाजवाब अभिनय से अपने नाम को भी सार्थक किया. फिल्म जबरदस्त कामयाब साबित हुई.

प्यासा और कागज के फूल

1957 में वहीदा रहमान को एक बार फिर गुरूदत्त की फिल्म 'प्यासा' में काम करने का मौका मिला. फिल्म के निर्माण के समय मधुबाला को लेने की योजना थी, लेकिन गुरूदत्त को भरोसा था कि फिल्म के चरित्र के साथ केवल वहीदा ही इंसाफ कर सकती हैं. वहीदा रहमान ने एक वेश्या गुलाबो का किरदार निभाया. इस किरदार को उन्होंने इतने सहज और दमदार तरीके से पेश किया कि दर्शक उनके अभिनय के कायल हो गए. इसके बाद वहीदा रहमान ने 1959 में गुरूदत्त की फिल्म 'कागज के फूल' में भी काम किया.

'कागज के फूल' के प्रीमियर के दौरान वहीदा रहमान ने कहा था, "फिल्म बहुत हैवी है, नहीं चलेगी." उनकी इस बात पर कथाकार अबरार अल्वी ने कहा था, "तुम अभी बच्ची हो, तुम क्या समझती हो." शुरू में फिल्म नहीं चली, लेकिन बाद में इसे लोगों ने काफी सराहा. यह फिल्म देश की महानतम कला फिल्मों में शुमार की गयी. इसकी मुख्य वजह यह थी कि फिल्म अपने वक्त से काफी आगे की थी.

चौदहवी का चांद

1960 में वहीदा रहमान की यादगार फिल्म 'चौदहवीं का चांद' प्रदर्शित हुई जो सुपरहिट रही. इस फिल्म के एक गाने 'चौदहवी का चांद हो या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो' ने दर्शकों को वहीदा का दीवाना बना दिया और उन्हें कहना पड़ा कि वह अपने नाम की तरह सचमुच लाजवाब हैं.

1962 में उनकी फिल्म 'साहब बीबी और गुलाम' रिलीज हुई. फिल्म के निर्माण के समय वहीदा रहमान छोटी बहू के किरदार को निभाना चाहती थीं लेकिन इस किरदार के लिए अभिनेत्री मीना कुमारी को उपयुक्त समझा गया. इस बात को लेकर वहीदा काफी दुखी हुईं. उनका मन रखने के लिए फिल्म निर्देशक ने छोटी बहू के रूप में उनका स्क्रीन टेस्ट लिया लेकिन वह इसमें सफल नहीं रही. निर्देशक अबरार अल्वी किसी भी कीमत पर फिल्म में वहीदा को रखना चाहते थे. इसलिए उन्होंने वहीदा को जवा का किरदार निभाने के लिए राजी कर लिया. हालांकि यह किरदार छोटी बहू जितना महत्वपूर्ण नहीं था, इसके बावजूद वहीदा रहमान ने अपनी छोटी सी भूमिका में जान डाल दी और दर्शकों को अपना दीवाना बना लिया.

गाइड और खामोशी में

वहीदा रहमान के सिने करियर की एक और अहम फिल्म 'गाइड' 1965 में रिलीज हुई. फिल्म में वहीदा का रोजी का किरदार नकारात्मक छवि वाला था. शादीशुदा स्त्री किसी और के साथ रहे और बाद में उसे जेल भिजवा दे, दर्शक इसे स्वीकार नहीं करते और कई लोगों ने वहीदा को यह किरदार निभाने से मना किया. इसके बावजूद वहीदा रहमान ने इसे चुनौती के रूप में लिया और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्म फेयर अवार्ड भी जीता.

फिल्म 'खामोशी' 1969 में रिलीज हुई. इसमें वहीदा के अभिनय के नए आयाम देखने को मिले. फिल्म में वहीदा ने एक ऐसी नर्स का किरदार निभाया जो पागल मरीजों का इलाज करते करते खुद ही बीमार हो जाती है. अपनी पीड़ा को वहीदा ने आंखों और चेहरे पर इस तरह पेश किया जैसे वह अभिनय न करके वास्तविक जिंदगी जी रही हों.

12 साल का विराम

सत्तर के दशक में वहीदा रहमान ने चरित्र भूमिकाएं निभानी शुरू कर दीं. इन फिल्मों में 'अदालत' 'कभी कभी', 'त्रिशूल', 'नमक हलाल', 'हिम्मतवाला', 'कुली', 'मशाल', 'अल्लाहरखा', 'चांदनी' और 'लम्हे' प्रमुख हैं. इसके बाद वहीदा रहमान ने लगभग 12 साल तक फिल्म इंडस्ट्री से किनारा कर लिया. 2001 में उन्होंने अपने करियर की नई पारी शुरू की और 'ओम जय जगदीश', 'वॉटर', 'रंग दे बसंती' और 'दिल्ली6' जैसी फिल्मों से दर्शकों का मन मोहा.

अपने जीवन के 70 से भी ज्यादा बसंत देख चुकी वहीदा रहमान आज भी उसी जोशो खरोश के साथ अपने किरदार को फिल्मों में जीवंत कर रही हैं.

एमजे/आईबी (वार्ता)

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