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फीडबैक

'जो चाहते हैं वही मिलता है'

हमारे पाठक पुरस्कार घर पहुंचने पर हमें अक्सर संदेश पहुंचा देते हैं. अपनी इच्छाओं और उम्मीदों को पाठक इमेल, पत्रों और फेसबुक के जरिए हम तक पहुंचाते हैं.

डीडब्ल्यूजी आपके द्वारा भेजा गया लेदर फाइल कवर मुझे मिल चुका है और यह मुझे बहुत पसंद आया. मैं यह सोच कर हैरान हूं कि आप वही प्राइज भेजते हैं जिसकी मुझे जरुरत होती है. लेकिन अब मुझे लैपटॉप की जरुरत है और आप से हमेशा जुड़ा रहना चाहता हूं. आपकी वेबसाइट की न्यूज मुझे ईमेल के द्वारा मिलती रहती है, बहुत अच्छा लगता है. अब मैं मंथन क्विज का विनर बनना चाहता हूं. डीडब्ल्यू परिवार का सदस्य

हरजीत सिंह

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डीडब्ल्यू की हिन्दी सेवा आम भारतीयों की आवाज उठाने वाला मंच बन गया है क्योंकि डीडब्ल्यू अपनी खबरों में सत्य, साहस, निष्पक्षता, योग्यता को प्रदर्शित करता है. इसके सभी स्तम्भ काफी अच्छे हैं. यह काफी ज्ञानवर्धक जानकारियां देता है. आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

कृष्णा कुमार, बक्सर, बिहार

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आप लोगों से पुराना रिश्ता एक बार फिर मजबूत हो गया. मंथन कार्यक्रम जो गतिविधि हमारे अंदर लाया है उसकी प्रशंसा करना बहुत ज़रुरी है. यह टीवी प्रसारण हम सभी के लिये बहुत महत्व रखता है. खासकर भारत के राष्ट्रीय चैनल डीडी1 पर. आज का मंथन जिसने मंथन क्विज देकर नेटजनों के बीच उत्साह पैदा कर दिया. हां यह कहना जरुरी है कि इस क्विज में कुछ नियम इस प्रकार थे कि फेसबुक पर दोस्तों को जोड़ने, शेयर करने की थी.

मोहम्मद असलम, आलमी रेडियो लिस्नर्स क्लब, आजमगढ ,उत्तर प्रदेश

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आपकी मंथन क्विज समाप्त हो चुकी है और मुझे खुशी है कि एक महीने चली. इस क्विज ने हम लोगों का मनोबल बहुत बढाया और सक्रियता के साथ नए लोगों को भी डीडबल्यू हिन्दी से जोडने का प्रयास किया. मंथन क्विज शुरु होने के दिन मेरे 110 से कम मित्र डीडबल्यू हिन्दी को लाइक कर रहे थे और आज ये संख्या 271 पहुंच गयी है. मंथन क्विज में शामिल मित्रों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही. ये 135 के आंकडे तक ही पहुंच पाये. यदि प्रविष्टि मोबाइल से भी मान्य होती तो ये संख्या 300 तक पहुंच सकती थी और ऐसी स्थिति में डीडबल्यू हिन्दी पेज को लाइक करने वालों की भी संख्या बढती. इसी समयावधि में डीडबल्यू हिन्दी परिवार ने भी तेजी से मनोवैज्ञानिक आंकडा यानी एक लाख को भी छू लिया. डीडबल्यू हिन्दी परिवार को बडा होते देखकर बहुत खुशी होती है तो कभी-कभी डर भी लगता है कि कहीं मैं इस भीड में खो ना जाऊं.

अनिल द्विवेदी, अमेठी, उत्तर प्रदेश

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संकलनः विनोद चड्ढा

संपादनः आभा मोंढे

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