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दुनिया

जोखिम से भरा "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट

चीन के भारी कर्ज से दूसरे देश सड़कें, रेलवे लाइनें आदि बनाएंगे. इनका ठेका चीनी कंपनियों को मिलेगा. कर्जा लेने वाले देश चीनी कंपनी का बिल चुकाएंगे. ऊपर से सूद समेत कर्ज भी लौटाएंगे.

चीन गरीब देशों को अरबों डॉलर का कर्ज देगा. इस कर्ज से गरीब देश अपने यहां सड़कें, पुल, पोर्ट और हवाई अड्डे बनाएंगे. लेकिन अगर कर्जा डूबने लगा तो क्या होगा? चीन के "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट को लेकर ऐसे सवाल भी पूछे जा रहे हैं. कर्ज देने वालों में चीन के दो प्रमुख बैंक हैं, चाइना डेवलपमेंट बैंक और एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ऑफ चाइना. दोनों एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका के कई देशों को 200 अरब डॉलर का कर्ज दे चुके हैं.

बीजिंग में दो दिन के वन बेल्ट, वन रोड सम्मेलन के दौरान एलान किया गया कि सैकड़ों अरब डॉलर का कर्ज और दिया जाएगा. लेकिन जैसे जैसे प्रोजेक्ट आगे बढ़ने, वैसे वैसे जोखिम भी बढ़ता जाएगा. बैंक, लेनदार और देनदारों के बीच का समीकरण बेहद अहम हो जाएगा. एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ऑफ चाइना चाहता है कि हर देश के लिए कर्ज की सीमा निर्धारित की जाए. बैंक के उप गर्वनर सुन पिंग कहते हैं, "कुछ देशों को अगर हमने बहुत ज्यादा कर्ज दिया तो ऋण की स्थिरता पर सवाल उठ सकते हैं."

फिलहाल चीन के पास काफी पैसा है. वन बेल्ट, वन रोड प्रोजेक्ट को फिलहाल चीन की सरकार अन्य देशों की सरकारों के साथ मिलकर तय कर रही है. कर्ज की दर काफी कम है. लेकिन कागजों से निकलकर प्रोजेक्ट जैसे ही जमीन पर शुरू होगा, वैसे ही व्यावहारिक परेशानियां सामने आएंगी. वन रोड, वन बेल्ट के तहत आने वाले 1,676 प्रोजेक्ट्स को चीन के सरकारी इदारे फाइनेंस कर रहे हैं.

इस प्रोजेक्ट के तहत बहुत ही बड़ा ठेका चीन कम्युनिकेशन कंस्ट्रक्शन ग्रुप को मिला है, अकेले 40 अरब डॉलर का ठेका. ग्रुप को 10,320 किलोमीटर लंबी सड़कें, 95 गहरे बंदरगाह, 10 एयरपोर्ट, 152 पुल और 1.080 रेलवे प्रोजेक्ट्स पूरे करने हैं. यानि चीन सूद समेत कर्ज भी वसूलेगा और उसकी कंपनियों को निर्माण के दौरान होने वाला फायदा भी मिलेगा.

इंडोनेशिया को चाइना डेवलपमेंट बैंक ने 40 साल की मियाद पर कर्ज दिया है. कर्जे की कोई गारंटी नहीं है. चीन 5.29 अरब डॉलर वाले जकार्ता-बानडुंग रेलवे प्रोजेक्ट को 75 फीसदी फाइनेंस कर रहा है. इंडोनेशिया में यह पहला हाई स्पीड रेलवे प्रोजेक्ट है. लोन की शर्तों के तहत 10 साल का ग्रेस पीरियड है. 60 फीसदी कर्ज दो फीसदी की ब्याज दर से अमेरिकी डॉलरों में चुकाना होगा. बाकी का 40 फीसदी कर्ज 3.4 फीसदी ब्याज दर पर युआन में चुकता करना होगा.

चीन के सेंट्रल बैक के गर्वनर झोउ शियानचुआन जोखिम और समस्याओं की चेतावनी दे चुके हैं. उन्हें डर है कि कहीं वेनेजुएला जैसा संकट फिर सामने न आ जाए. वित्तीय रूप से खस्ताहाल वेनेजुएला में चीन के 65 अरब डॉलर फंस चुके हैं. शंघाई में फिच रेटिंग के बैंक समीक्षक जैक युआन कहते हैं, "जिन जगहों पर ये कर्ज जा रहा है, वे ऐसी जगहें हैं जिन्हें पश्चिम के कारोबारी बैंकों से कर्ज मिलने में मुश्किल हुई. उनकी क्रेडिट रेटिंग बहुत अच्छी नहीं या फिर उनके प्रोजेक्ट्स के व्यावसायिक रूप से फलदायी होने पर सवाल उठे हैं. चिंता यह है कि चीनी बैंकों की पूंजी गलत ढंग से न बंट जाए."

चीन के सबसे बड़े व्यावसायिक बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, "हकीकत यह है कि व्यावसायिक बैंक बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं हैं. हम रियायती कर्ज नहीं देते हैं और हम नहीं चाहते हैं कि बेल्ट और रोड वाले देशों को ऐसा लगे कि उन्हें छूट दी जा रही है."

दक्षिण पूर्वी एशिया के देश लाओस की गिनती दुनिया के सबसे गरीब देशों में होती है. चीन-लाओस रेलवे प्रोजेक्ट के लिए देश को 7 अरब डॉलर का कर्ज दिया गया है. यह कर्ज लाओस की जीडीपी का आधा है. इस कर्ज को लाओस को 3 फीसदी से कम ब्याज दर पर लौटाना होगा. पाकिस्तान की सड़क और रेल परियोजनाओं पर चीन 56 अरब डॉलर निवेश करना चाहता है. 2022 तक पाकिस्तान को इस कर्ज के बदले 5 अरब डॉलर की किश्त का भुगतान करना पड़ेगा.

कर्ज लेने वाले देशों का कहना है कि उनके पास और कोई विकल्प नहीं है. पाकिस्तान की यूनाइटेड बैंक की सीईओ सीमा कामिल कहती हैं, "यह कहना बहुत आसान है कि कर्जा बहुत ही ज्यादा होगा, लेकिन अगर हमें यह न मिलें तो हम कहां जाएंगे?"

(ये भी पहुंचे सिल्क रोड सम्मेलन में)

 

ओएसजे/एमजे (रॉयटर्स)

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