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दुनिया

जॉन केरी के बयान को नेतन्याहू ने बताया इस्राएल-विरोधी

इस्राएली प्रधानमंत्री ने अमेरिकी विदेश मंत्री केरी के भाषण को "बेहद निराशाजनक" और "इस्राएल-विरोधी" बताया है. वहीं जर्मनी ने इसे असल में शांति स्थापित करने के 'टू स्टेट' सिद्धांत की दिशा में "कुछ करने का आह्वान" बताया.

अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी ने इस्राएल-फलीस्तीन के लिए प्रस्तावित 'टू स्टेट' समाधान पर कहा कि इस्राएल के अवैध बस्तियां बनाते जाने पर अमेरिका चुप नहीं बैठ सकता. केरी ने कहा, "कई सालों के हमारे कड़े प्रयासों के बावजूद, टू-स्टेट कास प्रस्ताव अब गंभीर संकट में पड़ा दिख रहा है." केरी ने आगे कहा, "हम ऐसा नहीं कर सकते कि शांति की उम्मीद के यूं क्षीण होते दिखने पर भी हम कुछ ना कहें."

ओबामा प्रशासन का कार्यकाल खत्म होने के मात्र कुछ हफ्ते पहले आई केरी की इस टिप्पणी का काफी महत्व है. एक हफ्ते पहले ही संयुक्त राष्ट्र में इस्राएली बस्तियों को रोकने के एक प्रस्ताव पर अमेरिका ने वीटो नहीं किया था, जिससे इस्राएल नाराज हुआ. अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार इस्राएल की वे बस्तियां अवैध मानी जाती हैं और केरी ने कहा कि इस तरह नेतन्याहू इस्राएल को लोकतंत्र से दूर ले जा रहे हैं. दूसरी ओर, अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने जोरदार तरीके से इस्राएल के बस्तियां बनाते जाने का समर्थन किया. जर्मनी के विदेश मंत्री फ्रांक-वाल्टर श्टाइनमायर ने केरी के भाषण का स्वागत करते हुए इसे एक "चेतावनी" और "कुछ करने का आह्वान" दोनों बताया.

बीते आठ सालों के ओबामा के कार्यकाल के दौरान कई बार इस्राएल के साथ संबंधों को दोस्ताना दिखाने की कोशिश हुई. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब वो दिखावा नहीं रहा और ओबामा-नेतन्याहू संबंध भी अब तक के सबसे बुरे हाल में आ गए हैं. यूएन प्रस्ताव के पहले भी दोनों ईरान को लेकर अपने मतभेदों के कारण आमने-सामने आ चुके हैं. लेकिन जॉन केरी के इस एक घंटे से भी लंबे भाषण के कारण संबंधों में और खटास आई है.

जनवरी में पद संभालने वाले नए राष्ट्रपति ट्रंप ने इस्राएल को भरोसा दे दिया है कि 20 जनवरी के बाद हालात अलग होंगे. ट्रंप ने तो यहूदी राष्ट्र के साथ "बहुत, बहुत गलत व्यवहार होने" पर अफसोस भी जताया है.

केरी ने अपने भाषण में कहा, "अगर वे एक राष्ट्र चाहते हैं, तो या तो इस्राएल यहूदी हो सकता है या लोकतांत्रिक, दोनों नहीं हो सकता. और इस तरह तो कभी शांति नहीं आएगी." केरी ने इस्राएल की रक्षा और भविष्य में उसकी मदद के लिए अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि उन्होंने एक संभावित शांति समझौते की छह सूत्री रूपरेखा तैयार कर दी है, जिसे आगे बढ़ाना या ना बढ़ाना अब अगली अमेरिकी सरकार के हाथ में होगा.

केरी के बयान के बाद नेतन्याहू ने भी कैमरे के सामने आकर ओबामा प्रशासन से अपनी नाराजगी साफ जाहिर की और साथ ही ट्रंप के साथ काम करने की इच्छा भी जताई. उन्होंने अवैध बस्तियों पर जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया और फलीस्तीन के हमलों और हिंसा भड़काए जाने को कम तवज्जो देने के लिए केरी की निंदा की.

अमेरिका, फलीस्तीन और दुनिया के ज्यादातर देश वेस्ट बैंक और पूर्वी येरुशलेम में इस्राएली बस्तियां बसाए जाने का विरोध करते हैं. यह जमीन का वो हिस्सा है जिस पर इस्राएल ने 1967 में कब्जा किया था और फलीस्तीनी यहां एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा चाहते है. इस्राएली सरकार का तर्क है कि वहां बस्तियों का निर्माण रोकने से भी कोई शांति नहीं आई इसलिए अब करीब छह लाख इस्राएलियों के निवास वाले इस इलाके का हल इस्राएल-फलीस्तीन की सीधी बातचीत से ही निकल सकता है.

Westbank Siedlung Givat Zeev (Reuters/B. Ratner)

वेस्ट बैंक पर बनी बस्तियां.

इस्राएल में रहने वाली अरब आबादी को नागरिकता मिली हुई है, जबकि वेस्ट बैंक के इस कब्जे वाले इलाके में रहने वाले करीब 25 लाख फलीस्तीनियों को नहीं. वहीं पूर्वी येरुशलेम में निवासी के तौर पर तो अधिकार तो मिला है लेकिन नागरिकता उनके पास भी नहीं है. 'टू स्टेट उपाय' के अंतर्गत ओबामा प्रशासन चाहता था कि भविष्य में इस्राएल की सीमाएं सुरक्षित की जाएं और 1967 में उसके कब्जे में लिए गए इलाके को एक स्वतंत्र फलीस्तीनी राष्ट्र बनाने की प्रक्रिया "परस्पर सहमति और बराबरी की अदला-बदली" के आधार पर हो. केरी ने भी इसी विचार को दोहराते हुए दोनों पक्षों से एक दूसरे को पूरी तरह एक राष्ट्र का सम्मान देने, धार्मिक स्थलों पर आने-जाने की आजादी देने और बाकी कई दावों को छोड़ने की राह पर चलने की बात कही. इसके अलावा केरी ने फलीस्तीनी शरणार्थियों की मदद करने की मांग को भी दोहराया, जो इस्राएल के गले नहीं उतरा. 

आरपी/एमजे (एपी)

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