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विज्ञान

जैव कूड़े से बायो गैस

काफ़ी अरसे से कूड़े जलाकर ताप प्राप्त किया जाता रहा है. इसके लिए कूड़ा जलाने के विशेष संयंत्र बनाए जाते हैं. लेकिन पर्यावरण रक्षा के क्षेत्र में सक्रिय लोगों का कहना है कि यह पर्यावरण को काफ़ी नुकसान पहुंचाता है.

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बायो गैस से बिजली

समस्या यह है कि उर्जा प्राप्त करने के लिए ईंधन के रूप में कूड़ा मिल जाता है, और इसलिए कूड़ा बचाने, उन्हें अलग करने और फिर से उनके उपयोग या रिसाइक्लिंग पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता. लेकिन बायोगैस संयंत्र में जैव कूड़े को सड़ाकर उससे उर्जा प्राप्त करना एक अलग बात है. पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार यह कूड़े से उर्जा प्राप्त करने का सबसे अच्छा पर्यावरण सम्मत तरीका है. लेकिन यह तकनीक अभी बहुत विकसित नहीं हुई है. जर्मनी के वेस्ट म्युंस्टरलैंड के गेशेर कस्बे में परती ज़मीन में नगरपालिका का कूड़ेदान है. यहां कंपोस्ट खाद बनाने के बदले जैव कूड़े से उर्जा प्राप्त किया जा रहा है. इस संयंत्र के प्रबंधक हिंड्रिक श्टेगेमान कहते हैं.

इस संयंत्र में ही हम कूड़े से उर्जा प्राप्त कर लेते हैं और फिर जैव कूड़े का कीचड़ बचा रहता है. यहां रसोई के कूड़े व अन्य जैव कूड़ों का इस्तेमाल किया जाता है. - हिंड्रिक श्टेगेमान

एक जटिल प्रक्रिया

और यह इस तरह होता है. सबसे पहले अलग अलग कूड़ों को एक साथ मिलाया जाता है, संयंत्र के तकनीकी विभाग के प्रधान हूबर्ट राइज़मान्न की भाषा में उनका कॉकटेल तैयार किया जाता है. वे पूरी प्रक्रिया को समझाते हुए कहते हैं -

तरल कीचड़ को सबसे पहले वहां लाया जाता है और फिर बंकर से ठोस बायो पदार्थ उसमें मिलाया जाता है. तौल के ज़रिए पता चलता है कि किस पदार्थ की कितनी मात्रा है और फिर हिसाब लगाया जा सकता है कि

29.06.2009 DW-TV JOURNAL WIRTSCHAFT MINIREPORTAGE Biogas

आप कैसा कॉकटेल चाहते हैं. फिर मामला आगे बढ़ता है. - हूबर्ट राइज़मान्न

यानी उन्हें पाइप के ज़रिए असली संयंत्र में लाया जाता है. चार विशाल कंटेनर, जो गोल ढक्कनों से बंद हैं. इन्हें फ़ैर्मेंटर कहा जाता है. हूबर्ट राइज़मान्न यहां संपन्न होने वाली प्रक्रिया के बारे में कहते हैं -

फ़ैर्मेंटर में बायो पदार्थ का तापमान 50 डिग्री रखा जाता है. उन्हें लगातार घोटा जाता है, और इस प्रकार बायोलॉजिकल प्रक्रिया से बायोगैस उत्पन्न होता है, जिन्हें पाइप के ज़रिए बाहर भेजा जाता है. - हूबर्ट राइज़मान्न

मीथेन पर नियंत्रण

कुछ खमीर उठाने जैसी प्रक्रिया से बायो पदार्थों का विखंडन होता है और बायोगैस बनते हैं. इनमें मीथेन के अलावा कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और हाइड्रोजन सल्फ़ाइड होते हैं. मीथेन गैस वायुमंडल में कार्बन डाई ऑक्साइड के मुक़ाबले लगभग 21 गुना तापघर प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं. लेकिन हूबर्ट राइज़मान्न भरोसा दिलाते हैं कि इसमें कोई खतरा नहीं है. वे कहते हैं -

अगर दूसरे तरीके से इस गंदे कीचड़ का इस्तेमाल किया जाए, तो मीथेन गैस अनियंत्रित रूप से वायुमंडल में पहुंच सकती हैं और उसे नुकसान पहुंचा सकती हैं. और इसीलिए इन कंटेनरों को सीलबंद रखा गया है, ताकि मीथेन गैस वहीं पहुंचे, जहां उसकी ज़रूरत है. यानी कि बिजलीघर में ईंधन के रूप में. - हूबर्ट राइज़मान्न

और यह बिजलीघर कैसा है? हूबर्ट राइज़मान्न बताते हैं -

यह लगभग 500 किलोवाट की क्षमता वाली एक गैस मोटर है. यहां ईंधन के रूप में बायोगैस को जलाया जाता है. और इससे बिजली बनती है, जिसे सार्वजनिक बिजली लाइन में भेज दिया जाता है. - हूबर्ट राइज़मान्न

पर्यावरण के लिए ख़तरनाक़ सभी गैस यहां जलकर ख़त्म हो जाते हैं और इनसे साल में लगभग चालीस लाख किलोवाट घंटे के बराबर

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पाइप में बंद मीथेन

बिजली तैयार कर ली जाती है. यह लगभग एक हज़ार परिवारों के लिए पर्याप्त होती है. जर्मनी के पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण संघ बुंड की क्लाउडिया बेइटिंगर की राय में यह कूड़े से उर्जा प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका है. वह कहती हैं -

इस तरह मीथेन गैस को जला दिया जाता है, उसे बिजली में बदल दिया जाता है. हम इसी की हिमायत करते हैं और इसे भविष्यमुखी मानते हैं. - क्लाउडिया बेइटिंगर

अगर इस बायोगैस को साफ़ किया जाए, तो मीथेन गैस की मात्रा सौ फ़ीसदी तक बढ़ाई जा सकती है. फिर वह खनिज गैस की बराबरी कर सकता है. लेकिन यूरोप में यह तकनीक अभी प्रारंभिक स्तर पर है. मसलन जर्मनी में सिर्फ़ दस फ़ीसदी जैव कूड़े को ऐसे संयत्रों में लाया जाता है. ज़्यादातर हिस्से का इस्तेमाल सीधे कंपोस्ट के रूप में होता है. फ़्राइबुर्ग के पर्यावरण संस्थान के ग्युंटर डेहोउस्ट का कहना है कि ऐसे संयंत्रों से कहीं ज़्यादा फ़ायदा हो सकता है -

ऐसे संयंत्रों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उर्जा के उत्पादन के बाद बचे अवशेष का कंपोस्ट के रूप में खेतों के लिए या दूसरी जगह भी इस्तेमाल किया जा सकता है. - ग्युंटर डेहोउस्ट

बायोगैस के इस्तेमाल से जर्मनी में हर साल 15 लाख टन कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन से बचा जा सकता है. लेकिन ग्युंटर डेहोउस्ट की राय में इसके लिए ज़रूरी है कि सारे देश में जैव कूड़े को अलग करके उसे जमा किया जाए. वह कहते हैं -

अभी तक जर्मनी में सारे देश में कूड़े को अलग करते हुए इकट्ठा नहीं किया जा रहा है. और यह हमारी पहली मांग यह होनी चाहिए कि हर परिवार जैव कूड़े के एक कंटेनर से जुड़ा होना चाहिए, ताकि हर किसी को उसके इस्तेमाल का मौक़ा मिले. - ग्युंटर डेहोउस्ट

जर्मनी के पर्यावरण मंत्रालय में भी अब वायुमंडल और संसाधनों की रक्षा के लिए उर्जा के स्रोत के रूप में जैव कूड़े के महत्व को माना जा रहा है. देखा जाए, आने वाले समय में इस क्षेत्र में तकनीक कहां तक आगे बढ़ती है.

रिपोर्ट: अन्ना फ़्लोरेंस्के/उभ

संपादन: अशोक कुमार

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