जैविक पिता का नाम जानने का हक | दुनिया | DW | 06.02.2013
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दुनिया

जैविक पिता का नाम जानने का हक

सारा पी. वीर्यदान करने वाले एक गुमनाम व्यक्ति की बेटी है. वह अपने जैविक पिता का नाम जानना चाहती थी. अब एक जर्मन अदालत ने उसे उसका अधिकार दिलाया है. फैसला बहुत से बच्चों के लिए उम्मीद की किरण है.

नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया के हाम हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि वीर्य बैंक को गोपनीय तरीके से पैदा हुए बच्चे को उसके असली पिता का नाम बताना होगा. गुमनाम व्यक्ति के वीर्य की मदद से पैदा होने वाले बच्चों को वीर्य दाता की पहचान जानने का हक है. 1989 के बाद से ही जर्मन संवैधानिक अदालत ने कई फैसलों में पिता की पहचान जानने के बच्चों के हक पर जोर दिया है. लेकिन वीर्यदान वाले मामले में पहली बार साफ तौर पर अदालती फैसला आया है.

अदालत में अपील 1992 में जन्मी सारा पी. ने की थी, जिसकी मां ने कृत्रिम गर्भाधान कराया था. हाई कोर्ट ने व्यक्तित्व के स्वतंत्र विकास के संवैधानिक अधिकार को वीर्यदान करने वाले की गुमनामी के अधिकार से ज्यादा महत्वपूर्ण करार दिया. हाई कोर्ट का यह फैसला अंतिम है. इसके खिलाफ अपील नहीं की जा सकती है. गर्भाधान करने वाले डॉक्टर थॉमस कात्सोर्के ने कहा है कि उसने वीर्यदाता से संबंधित दस्तावेज नष्ट कर दिए हैं, क्योंकि उन्हें सिर्फ 10 साल रखने का नियम था. डॉक्टर कोत्सोर्के ने इस फैसले को सैद्धांतिक प्रकृति का बताया है.

Name von anonymem Samenspender muss preisgegeben werden

जस्टिस थॉमस फोग्ट की बेंच

सर्वोच्च अदालत ने बच्चों के सूचना पाने के अधिकार को अपने विभिन्न फैसलों में मजबूत तो बनाया है लेकिन वीर्यदान की मदद से पैदा हुए बच्चों के सूचना पाने के अधिकार पर कानूनी स्पष्टता नहीं है. 2007 से ट्रांसप्लांटेशन कानून और कोशिका कानून में तय किया गया है कि इलाज कराने वाली महिला और दाता की पहचान बताने वाले कागजात 30 साल तक सुरक्षित रखे जाएंगे. इससे पहले यह अवधि सिर्फ 10 साल थी.

डॉक्टर 2007 तक दस्तावेजों को नष्ट कर सकते थे और बहुत सारे मामलों में ऐसा किया भी गया. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय तौर पर वीर्यदाताओं को पहचान गोपनीय रखने की गारंटी दी जाती थी. कागजातों को 30 साल तक सुरक्षित रखने का कानून बनने के बाद वीर्यदान करने वाले लोगों को बताया जाता है कि उनके वीर्य की मदद से पैदा होने वाले बच्चे भविष्य में उनसे संपर्क करने की कोशिश कर सकते हैं. प्रभावित बच्चों के सही आंकड़े जर्मनी में मौजूद नहीं हैं, लेकिन एस्सेन शहर के रिप्रोडक्शन मेडिसिन सेंटर के अनुसार करीब एक लाख बच्चे गुमनाम वीर्यदाताओं की मदद से पैदा हुए हैं. इस सेंटर के प्रमुख कात्सोर्के हैं, जिन पर इस मामले में मुकदमा हुआ था.

जैविक पिता की पहचान जानने पर कानूनी लड़ाई जर्मनी में न्यायिक दुविधा को दिखाता है. 2007 तक दस्तावेज को सुरक्षित रखने की कानूनी अवधि सिर्फ दस साल थी और कागजात को नष्ट करने वाले डॉक्टरों ने कोई अपराध भी नहीं किया है, लेकिन फिर भी वीर्यदान से पैदा हुए लोगों को अदालत ने जानकारी का अधिकार दिया है. वीर्यदान के मुद्दों पर काम करने वाले संगठन डोनोगेने इन्सेमिनेशन ने इस संबंध में जल्द ही कानून बनाने की मांग की है.

जर्मनी में हालांकि वीर्यदान करीब सौ साल से संभव है लेकिन इस सिलसिले में बहुत सी बातें जर्मनी में अभी भी नियमित नहीं हैं. यूं तो जर्मनी में इस पर कभी भी प्रतिबंध नहीं रहा लेकिन काफी समय तक डॉक्टर से इसे अनैतिक और अशिष्ट मानते रहे. 1970 में डॉक्टरों के राष्ट्रीय सम्मेलन में और 1986 में कानूनविदों के राष्ट्रीय सम्मेलन में बहुमत से इसे मान्यता देने का फैसला लिया गया.

Symbolbild Samenspende

नहीं रहेंगे गुमनाम वीर्यदाता

कानूनी नियमन नहीं होने के कारण बहुत सी बातें साफ नहीं हैं. वीर्यदान की सुविधा लेना शादीशुदा और गैर शादीशुदा दोनों तरह के जोड़ों के लिए संभव है, लेकिन कुछ प्रांतों में नोटरी के जरिए कराए गए समझौते की जरूरत होती है ताकि बच्चे का वित्तीय भविष्य सुरक्षित रहे. सिंगल और समलैंगिक महिलाएं यह सुविधा ले सकती हैं या नहीं, यह वीर्य बैंकों पर भी निर्भर करता है. बहुत से डॉक्टर भी इन्हें यह सुविधा नहीं देना चाहते क्योंकि कानूनी स्थितियां स्पष्ट नहीं हैं. समलैंगिक जोड़े करार कर एक दूसरे को वित्तीय सुरक्षा की गारंटी दे सकते हैं, जिसमें मां नहीं बनने वाली महिला पुरुष की जगह ले लेती है.

एक अस्पष्ट इलाका बच्चे की वित्तीय जिम्मेदारी का भी है. सैद्धांतिक रूप से वीर्य देने वाले पुरुष से बच्चे का पालन पोषण करने की मांग की जा सकती है. अगर वीर्य किसी सिंगल महिला को दिया गया है तो कानूनी रूप से स्थिति वन नाइट स्टैंड जैसी है, जिसमें वीर्यदाता को बच्चे का जैविक पिता माना जाएगा. इसके अलावा शादीशुदा जोड़ों के बच्चे भी असली पिता से पालन पोषण की मांग कर सकते हैं.

शादीशुदा जोड़ों में महिला के पति को ही बच्चे का बाप माना जाता है, भले ही वीर्य किसी और का क्यों न रहा हो. इसलिए बच्चे को पहले अपने सामाजिक पिता के पितृत्व को चुनौती देनी होगी और न्याय पाना होगा. इसके बाद दूसरे मुकदमे में वीर्यदाता को जैविक पिता साबित करना होगा और पालन पोषण के खर्च की मांग करनी होगी. जर्मनी में ये दोनों ही मामले अभी तक नहीं आए हैं. कुछ देशों में वीर्यदान करने वाले कानूनी रूप से बेहतर सुरक्षित हैं.

जर्मनी में वीर्यदान करने वालों का कोई सही आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. लेकिन देश में करीब एक दर्जन वीर्य बैंक हैं जो डॉक्टरों और बच्चों की चाह पूरी करने वाले केंद्रों के साथ सहयोग करते हैं. वीर्य क्रायोतकनीक की मदद से जमाकर रखा जाता है और एचआईवी जैसी संक्रामक बीमारियों के लिए उसकी पहले ही जांच कर ली जाती है. वीर्य दान करने वालों को आम तौर पर 100 यूरो मिलता है, जबकि एक चक्र के लिए महिलाओं को 500 से 700 यूरो देना पड़ता है. गर्भधारण की संभावना 15 से 20 फीसदी होती है.

एमजे/ओएसजे (डीपीए)

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