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दुनिया

जेब में डिग्री लिए आप्रवासी

जर्मनी में आने वाले आप्रवासियों में उच्च प्रशिक्षित लोगों की तादाद बढ़ रही है. जर्मन राजनीतिज्ञ सालों से इस बात की कोशिश कर रहे थे, लेकिन विशेषज्ञ इस रुझान को शंका की नजरों से देख रहे हैं.

वो दिन लद गए, जब जर्मनी में आप्रवासियों की तस्वीर तुर्की के फैक्टरी मजदूरों या पोलैंड के मिस्त्रियों से प्रभावित थी. आज जर्मनी में काम ढूंढने वालों की बात करने पर ग्रीक डॉक्टर या स्पेनी इंजीनियर की तस्वीर सामने आती है. इस बीच आंकड़े भी इस बदलाव की पुष्टि करते नजर आते हैं. 2005 से 2009 के बीच यूनिवर्सिटी डिग्री वाले आप्रवासियों की संख्या 30 फीसदी से बढ़कर 44 फीसदी हो गई है. विशेषज्ञ इसका श्रेय उच्च प्रशिक्षित कामगारों के लिए वीजा नियमों में ढील को देते हैं.

बोलोनिया प्रक्रिया का कमाल

जर्मनी में कुशल कामगारों का बड़ा हिस्सा यूरोपीय संघ के देशों से आ रहा है. श्रम बाजार पर रिसर्च करने वाले संस्थान आईएबी के रिसर्चर हैर्बर्ट ब्रुकर यूरोपीय संघ की बोलोनिया प्रक्रिया को इस रुझान को बढ़ावा देने वाला बताते हैं. इस प्रक्रिया के तहत सदस्य देशों की डिग्रियों में समानता लाने और उसकी मान्यता के कदम तय किए गए थे. उच्च प्रशिक्षित आप्रवासियों में अधिकतर ऐसे हैं जो जर्मनी में पढ़ाई पूरी होने के बाद यहीं रुक गए हैं और जर्मन कंपनियों में काम कर रहे हैं.

वैसे जर्मनी में निर्माण, रेस्तरां और खेती जैसे कम कुशल रोजगारों में लगे आप्रवासी भी कम प्रशिक्षित नहीं हैं. ब्रुकर का कहना है, "संभवतः बहुत से ऐसे लोग अपनी शिक्षा से कम स्तर का काम कर रहे हैं." बोखुख विश्वविद्यालय में आप्रवासन पर रिसर्च करने वाले लुडगर प्रीस कहते हैं, "हमारे यहां अभी भी व्यावसायिक डिग्रियों को मान्यता देने की बहुत ही मुश्किल प्रक्रिया है." इसमें परिवर्तन की जरूरत है. अप्रैल 2012 से जर्मनी में आप्रवासियों को इस बात का कानूनी अधिकार मिल गया है कि अपने देश में पाई गई उनकी डिग्री की तीन महीने के अंदर जांच की जाएगी.

मुश्किल बाधाएं

इस तरह की बाधाओं के बावजूद हैर्बर्टब्रुकर का मानना है कि कि जर्मनी आप्रवासियों को अपनी ओर और खींचेगा. 2014 के बाद रुमानिया और बुल्गारिया के लोग भी जर्मनी आना शुरू करेंगे. अब तक जर्मन श्रम बाजार इन देशों के कामगारों के लिए खुला नहीं था. ब्रुकर का मानना है कि इन दोनों देशों के आप्रवासी भी जर्मनी में उसी तरह पांव जमा पाएंगे जैसा कि 2011 के बाद आए पूर्वी यूरोप के ईयू देशों के कामगारों ने किया है. सरकार और राजनीतिक दलों की चिंता के बावजूद कि वे जर्मन सामाजिक व्यवस्था के लिए बोझ बन सकते हैं, लगभग सभी जर्मनी कंपनियों में काम पाने में कामयाब रहे.

कुछ लोगों के लिए जर्मनी में काम पाने के दरवाजे खुल रहे हैं तो दूसरों के लिए जर्मनी में आना मुश्किल होता जा रहा है. आप्रवासन पर शोध करने वाले लुडगर प्रीस कहते हैं, "तीसरे देश वाले नियम के कारण जर्मनी पहुंच पाने वाले शरणार्थियों की तादाद घट रही है." यूरोपीय संघ के इस नियम के अनुसार लोगों को उसी देश में शरण के लिए अर्जी देनी पड़ती है, जिससे होकर वे यूरोपीय संघ में घुसते हैं. आम तौर पर विकासशील देशों के शरणार्थी ग्रीस, स्पेन या इटली होकर आते हैं. यूरोपीय संघ के विस्तार के बाद जर्मनी सीमावर्ती देश नहीं रह गया है. गरीबी से भागने वाले शरणार्थी आम तौर पर विकासशील देशों से आते हैं और कम प्रशिक्षित हैं. प्रीस का कहना है कि उन्हें जर्मन रोजगार बाजार से दूर रखा जा रहा है, जबकि आप्रवासन पर यूरोप में चल रही बहस में उनके बारे में भी सोचा जाना चाहिए.

रिपोर्टः रेगिना मेनिष/एमजे

संपादनः एन रंजन

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