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दुनिया

जी का जंजाल बनी पॉलीथिन

भारत में रोज औसतन 20 गाय पॉलीथिन खाने से मरती हैं. इससे खेती आधारित अर्थव्यवस्था वाले देश में पशुधन को हो रहे नुकसान का अंदाजा लगाया जा सकता है. 12 साल पहले पॉलीथिन पर रोक तो लगाई गई लेकिन उसका अब तक पालन नहीं हुआ है.

बाजार से सामान लाने की सहूलियत देने वाली पॉलीथिन पूरी कुदरत के लिए बेहद खतरनाक है. मगर मामूली सी सहूलियत के लिए समूचे जीव जगत को इतने बड़े नुकसान में डालकर पॉलीथिन पर प्रतिबंध लागू न कर पाने की मजबूरी पर अब देश की सर्वोच्च अदालत ने सवाल खड़े किए हैं.

12 साल में प्रतिबंध बेअसर

प्लास्टिक की हल्की पॉलीथिन को बनाने, रखने और यहां तक कि इस्तेमाल करने पर भारत सरकार ने साल 2002 में ही प्रतिबंध लगा दिया था. धीरे धीरे सभी राज्य सरकारों ने इसे लागू कर तो कर दिया, मगर देश भर में कहीं भी बीते 12 सालों में प्रतिबंध का असर देखने को नहीं मिला है. पॉलीथिन से नुकसान का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सख्त रुख अख्तियार करने के बजाय संवेदनाओं का सहारा लिया है. इस मामले में अदालत ने स्वीकार कर लिया कि कोर्ट के सख्त रुख से बेसुध सरकारों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है. देश के प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू ने इस समस्या के लिए सिर्फ सरकार ही नहीं, लोगों की संवेदनहीनता को भी जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने कहा कि आखिरकार लोगों को खुद समझना चाहिए कि वे प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल कर खुद अपनी सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं.

दिल्ली भी अछूती नहीं

पॉलीथिन प्रायः सफेद रंग की होती है. इससे होने वाले पर्यावरणीय नुकसान के कारण इसे दुनिया भर में व्हाइट पॉल्युशन का नाम दिया गया है. भारत में बीते 12 सालों में श्वेत प्रदूषण को रोकने के लिए किए गए उपायों की सुस्त चाल का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राजधानी दिल्ली में पॉलीथिन से जनित समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है. सितंबर 2012 में दिल्ली सरकार ने पॉलीथिन के उत्पादन, संग्रह और इस्तेमाल को संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रख दिया. इसके दोषी पाए जाने पर भारी जुर्माना लगाने के प्रावधानों का भी कोई असर होता नहीं दिख रहा है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली के तीनों नगर निगमों ने इस प्रतिबंध को लागू करने के लिए अब तक कुछ नहीं किया. कानून कागजों तक ही सीमित है. इसे लागू करने के लिए दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग ने शुरु में छापेमारी जरुर की मगर स्थानीय निकायों ने इतना करना भी मुनासिब नहीं समझा.

नतीजा सिफर ही

मजे की बात तो यह है कि दिल्ली सरकार के सख्त रवैये के बाद पॉलीबैग का निर्माण करने वाली एक कंपनी ने तो पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट में पॉलीथिन को प्रतिबंधित करने वाले सरकारी आदेश पर ही स्टे लगाने की मांग कर डाली. अदालत ने इस याचिका को खारिज कर सरकार को अपने ही बनाए कानून का पालन करने का एक मौका दिया मगर नतीजा सिफर ही रहा.

मजबूर होकर अब सुप्रीम कोर्ट ने संवेदनाओं का सहारा लिया है. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की रिपोर्ट के हवाले से अदालत ने सरकार और नागरिकों को कहा है कि धोखे से पॉलीथिन खाने के कारण हर साल दुनिया भर में एक लाख से अधिक व्हेल मछली, सील और कछुए सहित अन्य जलीय जंतु मारे जाते हैं. जबकि भारत में 20 गाय प्रतिदिन पॉलीथिन खाने से मर रही हैं. इतना ही नहीं सैकड़ों सालों तक नष्ट न होने वाली पॉलीथिन से नदी नाले ब्लॉक हो रहे हैं और जमीन की उत्पादकता पर भी असर पड़ रहा है. अदालत ने कहा है कि अगर इन तथ्यों को जानकर भी हम अंजान बने बैठे हैं तब फिर पॉलीथिन के घातक परिणाम के लिए सिर्फ सरकारों को दोष देना ठीक नहीं होगा.

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