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दुनिया

जीएसटी से क्यों डर रहे हैं छोटे कारोबारी

भारत में अब तक का सबसे बड़ा कर सुधार एक जुलाई से लागू तो हो गया लेकिन कई विश्लेषक इसे छोटे कारोबारियों और लाखों मजदूरों के लिए जोखिम भरा बता रहे हैं.

गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी जीएसटी को सत्तर साल पहले आजाद हुए भारत के इतिहास का सबसे बड़ा कर सुधार माना जा रहा है जिसने करीब दर्जन भर से ज्यादा संघ और राज्य के करों को खत्म कर दिया है. अधिकारियों का कहना है कि यह कर लाखों कारोबारियों को टैक्स के दायरे में लायेगा और सरकार का राजस्व बढ़ेगा.

जीएसटी के आलोचक इसे जटिल बता रहे हैं. साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि इसका पालन करना खर्चीला होगा. नये कर नियमों के मुताबिक फर्मों को अपने बिल एक पोर्टल पर डालने होंगे जो उन्हें सप्लायरों के बिल से मैच करायेगा. जिन कंपनियों ने टैक्स नंबर के लिए खुद को रजिस्टर नहीं कराया है, उन्हें ग्राहकों से हाथ धोना पड़ सकता है.

मुंबई में मानवाधिकार मामलों के वकील विनोद शेट्टी का कहना है, "छोटी गैर निबंधित कंपनियों के साथ अछूतों की तरह व्यवहार हो रहा है. सभी कंपनियां खुद को रजिस्टर कराने और नियमों का पालन करने का खर्च नहीं उठा सकतीं. इसका नतीजा आप देखेंगे कि छोटे व्यापार बंद होंगे और कामगारों की छुट्टी होगी."

भारत के 10 में से 9 मजदूर छोटी छोटी कंपनियों और व्यापारों में काम करते हैं. कपड़ा उद्योग में आधे से ज्यादा, जूते चप्पलों और गहनों के व्यापार में 70 फीसदी से ज्यादा मजदूर इन्हीं कंपनियों में काम करते हैं. नये नियमों के मुताबिक 20 लाख रुपये से ज्यादा का सालाना कारोबार करने वाली सभी फर्मों को जीएसटी के लिए रजिस्टर करना होगा. इसके लिए हिसाब किताब रखने के तौर तरीके बदलने के साथ ही कंप्यूटर और इंटरनेट जैसी चीजों में निवेश भी करना होगा. मामूली मुनाफे पर काम करने वाली छोटी कंपनियों के लिए यह एक महंगा सौदा है. विनोद शेट्टी कहते हैं, "पूरा तंत्र केवल निबंधित कंपनियों के फायदे की सोच रहा है. जिन कंपनियों के लिए रजिस्टर होना जरूरी नहीं है, नुकसान उनका भी होगा क्योंकि तब निबंधित कंपनियां उनके साथ काम नहीं करना चाहेंगी."

विनोद शेट्टी का कहना है, "वास्तव में यह उन छोटे व्यापारियों को निशाना बनायेगा जो ज्यादा पैसे वाले नहीं हैं. उनका रोजगार छिन सकता है." सरकार का कहना है कि टैक्स का नया तंत्र व्यापार करना आसान बनायेगा और कंपनियों का खर्च घटेगा. टैक्स का आधार बढ़ने से सार्वजनिक पैसे में बढ़ोत्तरी होगी और कल्याण के कामों के लिए ज्यादा खर्च हो सकेगा.

कई लोगों का यह भी कहना है कि कारोबारियों के लिए शुरुआती खर्च और दूसरी दिक्कतों का बोझ व्यापार में मुनाफे से उतर जाएगा. हालांकि फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो एंड स्मॉल एंड मीडियम इंटरप्राइजेज के महासचिव अनिल भारद्वाज कहते हैं, "छोटी कंपनियों के लिए अस्तित्व का सवाल है या तो वो इसका पालन करें और भूखे रहें या फिर पालन ना करें और मर जाएं. यह तय है कि कुछ कंपनियों को नुकसान होगा."

अनियमित क्षेत्र में काम करने वाले 40 करोड़ से ज्यादा कामगार भारत की जीडीपी का करीब आधे से ज्यादा हिस्सा पैदा करते हैं. उनका काम बंद हुआ तो उनके लिए नौकरी ढूंढना आसान नहीं होगा क्योंकि आर्थिक विकास के बावजूद नौकरियों में बहुत इजाफा नहीं हुआ है.

आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले दो सालों में श्रम आधारित क्षेत्रों में भी महज दो लाख नौकरियां पैदा हुई हैं जो उसके पहले के दो साल के मुकाबले महज पांचवां हिस्सा हैं. इस बीच सरकार ने 2022 तक नए लोगों को रोजगार के लिए प्रशिक्षित करने का अपना लक्ष्य भी फिलहाल टाल दिया है. शेट्टी कहते हैं, "जरा सोचिए लाखों लोगों तो जीएसटी की वजह से नौकरी से हटा दिया गया है और ये लोग बिना नौकरी सड़कों पर हैं. अगर सरकार जीएसटी को और ज्यादा विस्तृत नहीं बनाती तो सामाजिक अशांति और बढ़ेगी."

एनआर/एके (रॉयटर्स)

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