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दुनिया

जीएसटी पर नहीं थम रही है अफरा-तफरी

केंद्र सरकार जिस जीएसटी को आर्थिक प्रगति के क्षेत्र में एक मील का पत्थर बता रही है उसे लेकर भारत के छोटे और मझोले कारोबारी आतंकित हैं. क्या केंद्र सरकार इसे लागू करने में जल्दबाजी दिखा रही है?

भारत में 30 जून से एक नई टैक्स प्रणाली लागू हो जाएगी. केंद्र सरकार संसद में आधी रात को आयोजित एक समारोह में इस नई प्रणाली की शुरूआत करेगी. अब सर्विस टैक्स और वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) की जगह गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) ले लेगा. लेकिन पूरे देश में इसे लेकर भ्रामक स्थिति है. केंद्र ने जहां इसे आर्थिक प्रगति के क्षेत्र में एक मील का पत्थर करार दिया है, वहीं तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी इसे नोटबंदी के बाद दूसरी सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल करार देती हैं. उन्होंने संसद में होने वाले कार्यक्रम के बॉयकॉट का भी एलान किया है. लेफ्ट फ्रंट भी इसी राह पर चल रहा है. देश के विभिन्न राज्यों में जीएसटी लागू करने के विरोध में कारोबारी हड़ताल पर हैं.

उपभोक्ता सामान बेचने वाले कारोबारी जीएसटी का डर दिखा कर भारी छूट दे रहे हैं. कई मामलों में यह छूट 40 से 50 फीसदी तक है. खासकर इलेट्रानिक सामानों और कपड़ों पर तो छूट की बरसात हो रही है. फ्यूचर समूह के रिटेल चेन बिग बाजार ने 30 की आधी रात तक भारी छूट का एलान किया है. दूसरी ओर, अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसी आनलाइन कंपनियों ने भी 50 फीसदी तक छूट का एलान किया है. इससे ग्राहकों में भारी खुशी है. एक ग्राहक रतन लाल वर्मा कहते हैं, "अगर आपको एक लाख का टीवी 60 हजार में मिल रहा है तो इससे बेहतर क्या हो सकता है?" टीवी,  मोटरसाइकिल और फ्रिज जैसी चीजें भी भारी छूट पर बिक रही हैं. जीएसटी-पूर्व होने वाली इस सेल से जहां उपभोक्ताओं की बल्ले-बल्ले है वहीं छोटे व मझौले व्यापारियों में जीएसटी को लेकर तमाम आशंकाएं हैं.

जीएसटी का सफर

जीएसटी की दिशा में पहला कदम करीब तीन दशक पहले तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री वीपी सिंह ने वर्ष 1986-87 में उठाया था. उन्होंने मोडवैट लागू किया था जो आगे चल कर वैट बना. वर्ष 1991 से 1996 के दौरान वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह ने सर्विस टैक्स शुरू किया था. उसके बाद वर्ष 2005-06 में पी चिदंबरम ने वैट लागू कर दिया. उन्होंने अप्रैल 2010 से जीएसटी लागू करने का प्रस्ताव रखा. वर्ष 2008 में जीएसटी का ढांचा तैयार हो गया. वर्ष 2010 में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने जीएसटी लागू करने की पूरी तैयारी कर ली थी. लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात समेत विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों के विरोध के चलते ऐसा नहीं हो सका. वर्ष 2011 में मनमोहन सिंह ने आरोप लगाया कि अमित शाह की गिरफ्तारी के बाद बीजेपी ने जीएसटी का रास्ता रोक दिया है.

वर्ष 2012-13 में यूपीए सरकार ने सूचना तकनीक के आधारभूत ढांचे के लिए जीएसटी नेटवर्क को हरी झंडी दिखाई थी. लेकिन इसमें पेट्रोलियम उत्पादों को शामिल करने की योजना को राज्यों के वित्त मंत्रियों ने खारिज कर दिया. वर्ष 2014 में अरुण जेटली ने इसके लिए नए प्रारूप में एक संविधान संशोधन विधेयक पेश किया. अगले साल लोकसभा ने इसे पारित कर दिया. राज्यसभा में कांग्रेस ने इसे यह कहते हुए रोक दिया कि उसके सुझावों को भी इस विधेयक में शामिल किया जाना चाहिए. वर्ष 2016-17 के दौरान केंद्र ने विभिन्न राज्यों को जीएसटी के लिए मना लिया. इसके प्रारूप और टैक्स दर भी लगभग सहमति तैयार हो गयी. राज्यों ने भी संबंधित विधेयक को हरी झंडी दिखा दी.

अब जीएसटी लागू होने के बाद कुछ चीजें महंगी हो जाएंगी और कुछ सस्ती. इसके तहत जिन वस्तुओं पर पहले तीन से नौ फीसदी तक टैक्स लगता था, उन पर एक समान पांच फीसदी टैक्स लगेगा. इसी तरह नौ से 15 फीसदी टैक्स वाली वस्तुओं पर जीएसटी की दर 12 फीसदी होगी और 15 से 21 फीसदी वाली पर अब 18 फीसदी. पहले जिन वस्तुओं पर 21 फीसदी या उससे ज्यादा टैक्स लगता था उन पर अब 28 फीसदी टैक्स लगेगा.

विरोध

देश के तमाम राज्यों ने शुरूआती ना-नुकूर और विरोध के बावजूद जीएसटी से संबंधित विधेयक पारित कर दिया है. केरल और पश्चिम बंगाल ने इसके लिए अध्यादेश की राह अपनायी थी. लेकिन बीजेपी और पीडीपी की साझा सरकार वाले  जम्मू-कश्मीर ने अब तक इससे संबंधित विधेयक पारित नहीं किया है. देश भर के तमाम कारोबारी जीएसटी के विरोध में हड़ताल पर हैं. इधर, पश्चिम बंगाल सरकार ने एक बार फिर इसे टालने की अपील की है. 

West Bengal Chef-Ministerin Mamata Bannerjee (UNI)

ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसका विरोध करते हुए 30 जून को इसे लांच करने के लिए आयोजित कार्यक्रम का बॉयकॉट करने का एलान किया है. ममता कहती हैं, "तृणमूल कांग्रेस जीएसटी के खिलाफ नहीं है. वह इसे बिना किसी ठोस योजना के लागू करने का विरोध कर रही है." उनकी दलील है कि जीएसटी लागू करने के लिए जरूरी आधारभूत ढांचा अब तक तैयार नहीं किया जा सका है. इसके अलावा खासकर छोटा व मझौला कारोबारी तबका इससे काफी आतंकित व भ्रमित है. वह कहती हैं कि इस मुद्दे पर पारदर्शिता के अभाव और कुप्रबंधन की वजह से कई जगह दवाओं जैसी जरूरी चीजों की किल्लत हो गयी है और विभिन्न वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही है. छोटे कारोबारी अब तक इसके लिए इनवॉयस, लेखा प्रणाली और सूचना तकनीक प्रणाली जैसी मौलिक जरूरतें नहीं जुटा सके हैं. ममता ने भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार की खिंचाई करते हुए कहा है कि उसने (भाजपा ने) विपक्ष में रहने के दौरान लगभग सात वर्षों तक जीएसटी का कड़ा विरोध किया था लेकिन सत्ता में आने के बाद अचानक उसका रुख पलट गया है. मुख्यमंत्री का कहना है कि तमाम व्यवस्था को दुरुस्त करने और नियमों को अधिसूचित करने के लिए कम से कम छह महीने का समय चाहिए. ऐसा नहीं होने की स्थिति में जीएसटी लागू करने से अफरा-तफरी का माहौल पैदा होगा और इसकी पूरी जिम्मेदारी केंद्र की होगी.

केंद्र की मुश्किल

विपक्षी राजनीतिक दलों के रवैये और देश के विभिन्न राज्यों में व्यापारियों की हड़ताल ने केंद्र को मुश्किल में डाल दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य में भी यह हड़ताल चल रही है. मोदी को 30 जून को ही अहमदाबाद में टेक्सटाइल इंडिया प्रदर्शनी का उद्घाटन करना है. दूसरी ओर, केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली कहते हैं, "जीएसटी काउंसिल ने तमाम पहलुओं को संज्ञान में लेकर ही इसे लागू करने का फैसला किया है. लेकिन अगर इससे किसी को कोई समस्या होती है तो सरकार उस पर विचार करने के लिए तैयार है." वैसे, बड़े कारोबारियों को छोड़ दें तो खासकर छोटे व मझौले कारोबारी जीएसटी को लेकर भारी असमंजस में हैं. उनके समक्ष यह साफ नहीं है कि नई प्रणाली के तहत हिसाब-किताब कैसे होगा और टैक्स रिटर्न कैसे जमा किया जाएगा. अब आरएसएस से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच ने भी जीएसटी का विरोध किया है. मंच के नेता अश्विनी महाजन कहते हैं, "इससे छोटे कारोबारियों को नुकसान होगा. अब बाजारों में चीन में बने सामानों की और भरमार हो जाएगी."

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि आधारभूत ढांचा तैयार किये बिना केंद्र ने जिस तरह जल्दबाजी में जीएसटी लागू करने का फैसला किया है उससे देश में एक बार फिर नोटबंदी के बाद के अफरा-तफरी वाले माहौल के दोहराये जाने का अंदेशा है. उनका कहना है कि पहले कारोबारियों की समस्याओं के समाधान के लिए जगह जगह सहायता केंद्रों की स्थापना करनी चाहिए थी और उनको अपना आधारभूत ढांचा और सूचना तकनीक प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए था.

 

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