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दुनिया

जितनी मछली खायेगा अमेरिका, उतने बम बनायेगा उत्तर कोरिया!

आल्डी या वाल्मार्ट जैसे बड़े सुपरमार्केट स्टोरों से खाना खरीदने वाले अमेरिकी अनजाने ही सही उत्तर कोरियाई सरकार को उसके परमाणु कार्यक्रम के लिए धन जुटाने में मदद कर रहे हैं.

चीन के हुनचुन में ट्यूबलाइट की रोशनी वाले सामूहिक शयनागारों में लोहे की चारपाइयों पर सोते मजदूर हर सुबह तड़के ही उठ जाते हैं. इन मजदूरों की बनाई खाने पीने की चीजें सीधे अमेरिका में दुकानों और घरों तक पहुंचेंगी.

इस जगह निजता पर पाबंदी है. मजदूर बिना अनुमति लिए परिसर के बाहर नहीं जा सकते. यह जोड़े में या समूह में ही यहां से बाहर जाते हैं और इसके लिए उन्हें पहले से मंजूरी लेनी पड़ती है. उत्तर कोरियाई निरीक्षक इस बात का ध्यान रखते हैं कि इनमें से कोई भाग ना जाए. इन लोगों के पास ना तो टेलिफोन है और ना ही ईमेल. इन्हें अपनी कमाई का बहुत छोटा हिस्सा ही मिलता है और बाकी लगभग 70 फीसदी उत्तर कोरियाई सरकार ले लेती है.

इसका साफ मतलब है कि आल्डी या वाल्मार्ट जैसे बड़े सुपरमार्केट स्टोरों से खाना खरीदने वाले अमेरिकी अनजाने ही सही उत्तर कोरियाई सरकार को उसके परमाणु कार्यक्रम के लिए धन जुटाने में मदद कर रहे हैं. अमेरिकी लोगों की खरीदारी से शायद उस प्रक्रिया को भी पैसा पहुंच रहा है जिसे खुद अमेरिका "आधुनिक युग की दासता" नाम देता है. 

उत्तर कोरिया के कामगार विदेशों में काम करते हैं, यह तो सब जानते हैं लेकिन कुछ संवाददाता पहली बार उन चीजों तक जा पहुंचे जो उत्तर कोरिया के मजदूर अमेरिकी लोगों के लिए बनाते हैं. इन चीजों को कनाडा, जर्मनी और यूरोपीय संघ के देशों में भी बेचा जाता है. सीफूड के अलावा उत्तर कोरियाई मजदूर लकड़ी के फर्श और सिलसिलाए कपड़े और कुछ दूसरी चीजें भी बनाते हैं. हालांकि संवाददाता सीफू़ड के अलावा और किसी चीज के निर्यातक फर्म तक नहीं पहुंच सके.

अमेरिकी कंपनियों को उन चीजों का आयात करने की अनुमति नहीं हैं जिन्हें बनाने में उत्तर कोरियाई मजदूर लगे हों भले ही ये सामान दुनिया में कहीं पर भी बना हो. ऐसा नहीं करने वालों पर अमेरिकी कानून के अंतर्गत मुकदमा चलाने का प्रावधान है.

अमेरिका में सीफू़ड के कारोबारियों की सबसे बड़ी संस्था नेशनल फिशरीज इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष जॉन कोनेली ने समाचार एजेंसी एपी को बताया कि उनका समूह अपनी सभी कंपनियों से अपने सप्लाई चेन की जांच करने का आग्रह कर रहा है ताकि "यह तय किया जा सके कि पैसा कामगारों तक पहुंचे और उसे किसी खतरनाक तानाशाह तक पहुंचने से रोका जा सके." 

अमेरिकी सांसदों ने भी बुधवार को इस जांच के जवाब में कहा कि अमेरिका को उत्तर कोरियाई लोगों को अपने देश से दूर रखने और चीन को उत्तर कोरियाई मजदूरों को नौकरी देने से मना करने के लिए कहना चाहिए. 

मजदूरों का निर्यात

उत्तर कोरिया के विदेशी कामगार खाड़ी देशों में निर्माण, पोलैंड में जहाजरानी और रूस में इमारती लकड़ियों का काम करते हैं. उरुग्वे में अधिकारियो ने बताया कि पिछले साल करीब 90 उत्तर कोरियाई लोग मछली पकड़ने वाली नावों में क्रू के रूप में काम कर रहे थे. संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के बाद उत्तर कोरिया के कामगारो के लिए नये वर्क परमिट जारी करने पर रोक लग गयी है लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने पहले से काम कर रहे मजदूरों को निशाना नहीं बनाने की बात कही है.

हुनचुन में करीब 3000 उत्तर कोरियाई मजदूर काम करते हैं. चीन के सुदूर उत्तरपूर्वी हिस्से का यह इलाका उत्तर कोरिया और रूस की सीमा से बस कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है. शहर में साइनबोर्ड चीनी, रूसी और कोरियाई भाषा में हैं. 

स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए चीन और उत्तर कोरिया ने सालों पहले यहां की फैक्ट्रियों में उत्तर कोरियाई मजदूरों को ठेके पर रखना शुरू किया. एक ऐसे औद्योगिक क्षेत्र की नींव रखी गयी जहां सस्ते मजदूर उपलब्ध थे. उसके बाद से हुनचुन में दर्जनों कंपनियां शुरू हो गयी हैं.

इलाके की सारी कंपनियों में एक जैसे हालात हैं, यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन संवाददाताओं ने उत्तर कोरियाई लोगों को हुनचुन की कई कंपनियों में रहते और काम करते देखा. इन मजदूरों को पत्रकारों से बात करने की इजाजत नहीं दी गयी. हालांकि संवाददाता ने उनके उत्तर कोरियाई होने की पुष्टि कई तरीके से की. इन मजदूरों के कमरे में उत्तर कोरिया के दिवंगत नेता की तस्वीरें लगी थीं, उनकी खास बोलचाल और हुनचुन के कारोबारियों से उनकी बातचीत में उनके लहजे को पकड़ने की कोशिश की गयी. इसके अलावा उनके दस्तावेज भी देखे गये और कुछेक उत्तर कोरियाई मजदूरों के पासपोर्ट की फोटकॉपी भी दिखी.

वहां मौजूद कुछ उत्तर कोरियाई महिलाओं से संवाददाता ने जब बात की तो उन्होंने बताया कि वो राजधानी प्योंग्यांग के किसी इलाके के निवासी हैं. इन लोगों के ठेके दो या तीन साल के होते हैं और इन्हें इससे पहले घर नहीं जाने दिया जाता. तभी इन लोगों का ध्यान रखने वाला निरीक्षक आ गया और उसने मजदूरों से चुप रहने को कहा.

उत्तर कोरियाई मजदूरों पर लगी बंदिशों के कारण उन्हें चीनी कामगारों की तुलना में अधिक स्थायी माना जाता है. चीनी मजदूरों के पास उनकी नौकरी की रक्षा करने वाले नियम हैं. इसके साथ उन्हें समय समय पर काम से छुट्टी लेने का हक भी मिलता है. उत्तर कोरियाई मजदूर को तभी छुट्टी मिलती है जब वो बीमार होते हैं. काम थकाऊ होता है और उन्हें 12 घंटे लंबी शिफ्टों में काम करना होता है. चीनी मजदूरों को हर महीने 540 डॉलर की मजदूरी मिलती है जबकि उत्तर कोरियाई मजदूरों को सिर्फ 300 डॉलर मिलते हैं. इसका भी करीब 70 फीसदी हिस्सा किम जोंग उन के पास जाता है.

संवाददाताओं ने कम से कम तीन ऐसी फैक्ट्रियों की पहचान की जिन में उत्तर कोरियाई मजदूर काम करते हैं और जिनका माल अमेरिका को निर्यात किया जाता है. ये कंपनियां हैं हुनचुन डोंगययांग सीफूड इंडस्ट्री एंड ट्रेडिंग कंपनी लिमिटेड, हुनचुन पगोडा इंडस्ट्री कंपनी लिमिटेड और यानताई डाचेन हुनचुन सीफूड प्रोडक्ट्स. यह कंपनियां चीन, रूस और कुछ मामलों में अलास्का से सीफूड बटोरती हैं. इन कंपनियों ने उत्तर कोरियाई मजदूरों के बारे में कोई ब्यौरा देने से मना कर दिया. कार्गो के आंकड़े बताते हैं कि हर साल ये कंपनियां 2000 टन से ज्यादा का माल अमेरिका और कनाडा में भेज रही है. कार्गों में मौजूद कुछ बॉक्स पर रेवे और पेन्नी ग्रॉसर्स, आईइसविंड जैसी जर्मनी के मशहूर सुपरस्टोर्स के नाम छपे थे. रेवे समूह का कहना है कि उन्होंने हुनचुन डोंग्यांग के साथ कारोबार किया है लेकिन अब कारोबार का वक्त पूरा हो गया है.

छिपी जिंदगी

चीन में उत्तर कोरियाई मजदूरों पर रूस और मध्यपूर्व के देशों की तुलना में ज्यादा निगरानी है. उत्तर कोरिया को यह डर सताता है कि कहीं ये उन लोगों की राह पर ना चल पड़ें जो चीन भाग गये थे या फिर वे चीन में दक्षिण कोरियाई लोगों से भी मिल सकते हैं. दक्षिण कोरिया की कुकमिन यूनिवर्सिटी में उत्तर कोरिया के विशेषज्ञ आंद्रेई लांकोव ने कहा, "अगर कोई उत्तर कोरियाई विदेश जाना चाहता है तो चीन उसका सबसे आखिरी विकल्प होता है क्योंकि चीन की फैक्ट्रियों में जेल जैसे हालात हैं."

हुनचुन की ज्यादातर फैक्ट्रियों में महिला कामगार हैं और उनकी उम्र 20 से 30 साल के बीच है. इनमें से ज्यादातर को दलालों के जरिए काम पर रखा गया है जो अकसर विदेश में काम दिलाने के नाम पर कमीशन वसूलते हैं. चीन में आने वाले मजदूर पहले ही अलग अलग टीमों में बांट दिये जाते हैं. हर समूह में एक कोरियाई निरीक्षक रहता है. इन लोगों को अपने मालिकों से भी मिलने नहीं दिया जाता. एक फैक्ट्री के मैनेजर ने बताया कि उन्हें सिर्फ निरीक्षक से बात करने की अनुमति होती है. एक तरह से उत्तर कोरिया के लोग चीन जा कर भी उत्तर कोरिया में ही रहते हैं. उन पर लगातार नजर रखी रहती है. एक कमरे में कई कई लोग, दरवाजे बंद और बगल में मौजूद फैक्ट्री. फैक्ट्री से कमरे तक और कमरे से फैक्ट्री तक बस इतना ही उन्हें पता होता है.

ज्यादातर फैक्ट्रियों में महिलाएं अपना खाना खुद बनाती हैं. उनके यहां लगे टीवी पर चीन के कार्यक्रम नहीं दिखते. उत्तर कोरियाई लोगों को उनके परिसर से बाहर जाने का मौका मिलता है तो वह शहर के गलियों वाले बाजारों में जाते हैं जहां प्लास्टिक शीट और फोल्डिंग टेबल पर बाजार सजे होते हैं. 

कितनी कमाई?

दक्षिण कोरियाई खुफिया एजेंसियों का अनुमान है कि 2014 में उत्तर कोरिया के 50-60 हजार कामगार दुनिया के 50 देशों में काम करते थे. इनमें ज्यादातर लोग चीन और रूस में थे. अब यह संख्या एक लाख के करीब होने की बात कही जा रही है. खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट और चीन के कारोबारी समुदाय से जुड़े सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इन लोगों के काम से हर साल कोरिया को 20-50 करोड़ अमेरिकी डॉलर की आमदनी होती है.

उत्तर कोरिया के लिए यह एक अहम और भरोसेमंद आय का जरिया है खासतौर से इसलिए भी क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के कारण उत्तर कोरिया से हर साल 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर का निर्यात रुक गया है. चीन ने कहा है कि वह उत्तर कोरियाई निर्यात पर रोक लगाएगा लेकिन अब तक उसने व्यवहारिक प्रतिबंधों पर अमल नहीं किया है.

एनआर/एके (एपी)

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