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ब्लॉग

जारी है मौत की सजा पर बहस

भारत में विभिन्न मानवाधिकार संगठन मौत की सजा खत्म करने की वर्षों से मांग करते रहे हैं. प्रभाकरमणि का कहना है कि इस पुरानी मांग को पूरा करने की दिशा में सरकार ने अब तक कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है.

मौत की सजा खत्म करने की मांग पर लंबे अरसे से बहस चल रही है. वर्ष 2004 में पश्चिम बंगाल में एक अभियुक्त धनंजय सिंह को फांसी दिए जाने के बाद कोई आठ वर्षों तक देश में किसी को यह सजा नहीं दी गई. अदालतों ने मौत की सजाएं तो कई मामलों में सुनाई हैं लेकिन उनको अमली जामा नहीं पहनाया गया. उसके बाद 26/11 हमलों के अभियुक्त अजमल कसाब और उसके तीन महीनों बाद संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू को दी गई फांसी से यह चुप्पी टूटी.

भारत सरकार के रूख से साफ है कि वह फिलहाल मौत की सजा को खत्म करने की पक्षधर नहीं है. इससे पहले संयुक्त राष्ट्र ने आठ साल पहले जब मौत की सजा पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा था तब भारत ने इसके विरोध में वोट डाला था. उस समय सरकार ने अपने फैसले के समर्थन में दलील दी थी कि उसे अपने देश के कानूनों को तय करने का संप्रभू अधिकार है और मौत की सजा बेहद बिरले मामलों में ही दी जाती है. दुनिया के लगभग 140 देशों में फांसी की सजा पर रोक लगा दी गई है. लेकिन भारत में इसे लेकर अब भी कई विवाद और आशंकाएं हैं.

दरअसल, किसी मानवीय चूक से न्याय नहीं मिलने की वजह से किसी को मौत की सजा देने की आशंका ही मानवाधिकार संगठनों का प्रमुख तर्क है. एमनेस्टी इंटरनेशनल और पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की ओर से किए गए अध्ययनों से साफ है कि किसी को मौत की सजा देने के फैसले की प्रक्रिया एकतरफा और पक्षपातपूर्ण है. सुप्रीम कोर्ट भी कई बार इस तथ्य को स्वीकार कर चुका है. कुछ साल पहले 14 सेवानिवृत्त जजों ने राष्ट्रपति को एक पत्र लिख कर कहा था कि वर्ष 1996 से अब तक सुप्रीम कोर्ट ने गलती से 15 लोगों को मौत की सजा सुनाई है और इनमें से दो को फांसी दी जा चुकी है. उन जजों ने इसे स्वाधीन भारत और अपराध के इतिहास में सबसे बड़ा अन्याय करार दिया था. मौत की सजा का विरोध कर रहे संगठनों का सवाल है कि किसी को फांसी पर लटका दिए जाने के बाद अगर पता चलता है वह बेकसूर था तो इस अन्याय की भरपाई कैसे हो सकती है. देश की मौजूदा जटिल न्याय प्रणाली में ऐसी मानवीय गलतियों की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. दूसरी ओर, मौत की सजा जारी रखने के पक्षधर लोगों व संगठनों की दलील है कि खासकर महिलाओं व बच्चों के खिलाफ गंभीर अपराध के मामलों में मौत की सजा ऐसे अपराधों की पुनरावृत्ति रोकने की दिशा में अहम भूमिका निभाएगी. लेकिन बीते साल अमेरिका में हुए एक अध्ययन में इस बात के कोई ठोस सबूत नहीं मिले थे कि मौत की सजा से ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने में सहायता मिलती है.

इस समय पूरी दुनिया मौत की सजा देने से बच रही है. यूरोपीय संघ ने तो मौत की सजा खत्म करने को अपनी सदस्यता के लिए एक अनिवार्य शर्त बना दिया है. संयुक्त राष्ट्र साधारण सभा ने दिसंबर, 2010 में तीसरी बार इस मुद्दे पर मतदान किया था और पूरी दुनिया में इस सजा पर रोक लगाने की मांग की थी. लेकिन भारत सरकार का रवैया इस मामले में अलग है. मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी अपना कार्यभार संभालने के बाद अब तक कम से कम 14 लोगों की दया याचिकाएं ठुकरा चुके हैं. उनमें से दो को तो फांसी पर लटकाया भी जा चुका है. इससे सवाल पैदा होना स्वाभाविक है कि आकिर प्रणब मुखर्जी का रुख इस मामले पर इतना कड़ा क्यों है? इससे सरकार के रूख का भी पता चलता है क्योंकि राष्ट्रपति अपने फैसले तो गृह मंत्रालय की सलाह पर ही लेते हैं. उसे पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने 54 लोगों की मौत की सजा माफ करते हुए उसे आजीवन कारावास में बदला था. राष्ट्रपति के पास कई दया याचिकाएं तो काफी लंबे अरसे से लंबित हैं. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर भी इस पर चिंता जता चुके हैं. उन्होंने कहा था कि अगर सजा देनी है तो जितनी जल्दी दिया जाए, समाज के लिए उतना ही बेहतर है.

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, पूरे देश में फिलहाल 477 लोग या तो फांसी दिए जाने या फिर उसे आजीवन कारावास में बदले जाने का इंतजार कर रहे हैं. सरकार का कहना है कि आजादी के बाद अब तक सिर्फ 54 लोगों को फांसी पर लटकाया गया है. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2001 से 2011 के दौरान देश की विभिन्न अदालतों ने हर साल औसतन 132 लोगों को मौत की सजा सुनाई थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इनमें से हर साल 3-4 सजाओं की ही पुष्टि की.

न्यूयार्क स्थित मानवाधिकर संगठन ह्यूमन राइट्स वाच की दक्षिण एशिया प्रमुख मीनाक्षी गांगुली कहती हैं कि जब सुप्रीम कोर्ट भी इस देरी पर चिंता जता चुका है तो राष्ट्रपति को फांसी की सजा पाने वाले अभियुक्तों की सजा को आजीवन कारावास में बदल देना चाहिए. साउथ एशिया एनालिसिस ग्रुप के निदेशक एस. चंद्रशेखरन कहते हैं कि मौत की सजा पाने वाले को लंबे समय तक ऊहापोह में रखना मानवता के खिलाफ है. देश की विभिन्न जेलों में कई लोग दशकों से फांसी की सजा का इंतजार कर रहे हैं.

अब भारतीय विधि आयोग ने एक बार फिर मौत की सजा पर आम लोगों की राय जानने की दिशा में पहल की है. लेकिन सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति के बिना महज दिखावे की औपचारिकताओं से किसी का भला नहीं होगा. जरूरत है पूरी न्याय प्रक्रिया को चुस्त-दुरुस्त और त्रुटिविहीन बनाने की दिशा में गंभीर पहल की.

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