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विज्ञान

जारी है 'परफेक्ट साउंड' की तलाश

क्या यह कला है या विज्ञान, शानदार अकॉस्टिक तैयार करने के लिए यह तो पता होना ही चाहिए कि हमारे कान सिर के दो तरफ होते हैं लेकिन साथ ही आर्किटेक्ट के साथ अच्छी दोस्ती होनी भी जरूरी है.

भारत में खुले आसमान के नीचे या किसी भी सभागृह में संगीत के कार्यक्रम सुनने की परंपरा रही है. गाड़ियों के हॉर्न, शोर के बीच लोग इस संगीत का उतना ही मजा लेते हैं जितना यूरोप के किसी कंसर्ट हॉल में. भारत में आज बड़े बड़े सभागृह बन गए हैं. हालांकि बेस्ट अकॉस्टिक की वहां भी तलाश है और यूरोप में भी.

जब भी हम शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम सुनने जाते हैं. अचानक लगता है जैसे ऑर्केस्ट्रा के बीचों बीच बैठे हों. हालांकि हर हॉल में ऐसा इफेक्ट आए जरूरी नहीं. कुछ बहुत सूखे होते हैं, कुछ में गूंज बहुत ज्यादा होती है. तो कहीं कुछ और समस्या तो कुछ बहुत बेचैन करने वाले होते हैं.

शानदार

जहां साउंड इंजीनियरिंग का कमाल होता है, आसान शब्दों में कहें कि जहां अकॉस्टिक लाजवाब होता है, उनमें एम्सटरडम का कंसर्टगेबाऊ भी एक हॉल है. इस साल वह अपनी स्थापना की 125वीं जयंती मना रहा है. यह हॉल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि इसे तब बनाया गया था जब ध्वनि की भौतिकी समझ से बाहर थी. 19वीं सदी के आर्किटेक्ट ने ये बड़े बड़े हॉल सिर्फ अनुभव के आधार पर तैयार किए हैं. बेहतरीन हॉल्स के आकार से प्रेरणा लेते हुए ये बनाए गए हैं.

अकॉस्टिशियन रॉब मेटगेमायर बताते हैं, "स्टेज के पीछे कंसर्टगेबाऊ की दीवारें गोलाकार इसलिए हैं क्योंकि लाइप्जिष के गेवांडहाउस में ऐसा किया गया है. पुराने आर्किटेक्ट को नहीं पता था कि दीवार का आकार अहम है या नहीं लेकिन अब हम जानते हैं कि ऐसा जरूरी नहीं. लेकिन दिखाई देता है कि वो लोग अच्छे हॉल्स में जाते थे और उनके गुणों को देखते थे. वे कुछ नया नहीं बनाना चाहते थे लेकिन कुछ ऐसा जो उनके काम आ सके."

ध्वनि का विज्ञान

आज कई तरह की और एक से एक कंप्यूटर मॉडलिंग उपलब्ध हैं लेकिन बढ़िया ध्वनि वाला कंसर्ट हॉल बना पाना जितना कला है उतना ही विज्ञान भी. सेंट पीटर्सबर्ग के ओपेरा मारीन्स्की II के लिए काम करने वाले युर्गेन राइनहोफ कहते हैं, "मैं अपने युवा साथियों को कभी कभी परेशान करता हूं क्योंकि वह अपने कैलकुलेशन कंप्यूटर पर करते हैं. मैं बहुत कम गणनाएं करता हूं और बाकी महसूस करके करता हूं."

पैरिस में बना साले प्लेयल 1920 में बनाया गया था. इसका आकार परवलयिक है. ऑर्केस्ट्रा बिलकुल बीच में बैठता और इस तरह ध्वनी सीधे हॉल की पिछली दीवारों से टकराती है न कि साइड की दीवारों से बाउंस होती है. लेकिन इसके आर्किटेक्ट भूल गए कि इंसानी कान चेहरे के दोनों ओर होते हैं सामने नहीं. इंसानों को साइड से आने वाली प्रतिध्वनि की जरूरत होती है ताकि वह आवाज सुन सके.

20वीं सदी के मध्य में आर्किटेक्ट्स ने बारोक काल की सजावट को पीछे छोड़ दिया. सीधी फ्लैट दीवारें बनने लगीं और छोटी मोटी सजावट. उनको बाद में समझ में आया कि ये सुनहरी मूर्तियां, लकड़ियों के बॉक्स, भारी पर्दे आंखों को तो सुकून देते ही थे लेकिन कान के लिए भी अच्छे थे.

अकॉस्टिक बनाम आर्किटेक्चर

किसी भी प्रोजेक्ट की सफलता के लिए जरूरी है कि अकॉस्टिशियन यानी ध्वनिविज्ञानी पर्सनैलिटी मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग दोनों में निपुण हों. आर्किटेक्ट हमेशा कुछ नया बनाना चाहते हैं जबकि अकॉस्टिशियन उस तरीके से चिपके रहना चाहते हैं जो पहले काम कर चुका हो.

युर्गेन राइनहोफ जब आर्किटेक्चर कंपनी डायमंड एंड श्मिट के साथ मारिन्स्की II पर काम कर रहे थे तो उन्होंने पांच की बजाए तीन गैलरियां ही रखी. उनका कहना है,"अगर आप ज्यादा गैलरी लेवल रखते हैं तो बीच की खुली जगह कम होती है और इस कारण आवाज पीछे की सीट तक नहीं पहुंचती. इसका चरम उदाहरण न्यूयॉर्क में है. जहां गैलेरी के छज्जे बहुत ज्यादा हैं. तीसरी चौथी लाइन तक ठीक है लेकिन सातवीं आठवीं लाइन में हॉल के साथ दर्शक का कोई संपर्क नहीं रहता. ऐसा लगता है कि आप बाहर खड़े हो कर खिड़की से सुन रहे हैं."

राइनहोफ कहते हैं कि अकॉस्टिक की सफलता निर्भर करती है कि आप कितना जोखिम उठाना चाहते हैं और आर्किटेक्ट से आप कितना समझौता कर सकते हैं.

इंसानी कान

सबसे बढ़िया अकॉस्टिक होना अच्छा लक्ष्य है लेकिन कंसर्ट हॉल लोगों के लिए होता है और कोई मेजरमेंट का उपकरण नहीं है. इंसानी कान शानदार मशीन हैं. वह कई रिफ्लेक्शन के बावजूद मूल आवाज को पकड़ सकती है. इंसानी मस्तिष्क हालांकि पुरानी यादों को भूल नहीं पाता. इस कारण कंसर्ट हॉल की गुणवत्ता का पता लगाना मुश्किल हो जाता है. रॉब मेटगेमायर बताते हैं, "ध्वनि के बारे में लोगों के विचार उनकी संस्कृति से आते हैं कि वो शास्त्रीय संगीत कैसे सुनना चाहते हैं. मैंने भारत में एक हॉल के लिए काम किया था. मैंने पाया कि वो शास्त्रीय संगीत की आवाज के प्रति उतना गंभीर नहीं थे."

कलाकारों के लिए भी अकसर सच में क्या हो रहा है और हॉल से उन्हें क्या महसूस होता है इसमें कोई तालमेल नहीं होता. लंदन के अल्बर्ट हॉल में लगता है जैसे कि आप एक छोटे कमरे में हों और दीवारें आपके चारो ओर. पियानो वादक और कंडक्टर बैरी डगलस के मुताबिक छह हजार सीटों वाले हॉल में, "आप दर्शकों को देखें तो लगता है किसी ने पर्दा पेंट करके लगा दिया है."

हॉल में लोग सिर्फ इसलिए ही नहीं चाहिए होते कि वे टिकट खरीदते हैं और कलाकार को किसी के सामने बजाने का मौका देते हैं. आधा भरा हुआ हॉल गूंज के समय को 13 फीसदी कम कर देता है. यही वो कारण है जो हर हॉल में उसी कलाकार की आवाज को बदल देता है और उसे घर से अलग बनाता है.

डगलस मानते हैं, "सबसे अहम है कि आप नजदीकी महसूस करें. जब मैंने कार्यक्रम देना शुरू किया. तो मुझे बहुत तनाव होता था. लेकिन किसी ने कहा कि आप चिंता मत करें और सोचें कि आप सिर्फ एक के लिए ही बजा रहे हैं. लोग किसी वायर से जुड़े हुए नहीं हैं."

बिल्कुल क्योंकि सबसे अच्छी ध्वनि या अकॉस्टिक वहीं होता है जहां कलाकार और दर्शक दोनों ही इसे नोटिस न करें.

रिपोर्टः मार्सिया आदैर/एएम

संपादनः एन रंजन

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