1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

ताना बाना

जापानी कारों से जर्मन कारों की रेस

जापानी कारों के मुकाबले देर से भारतीय बाजारों में उतरी जर्मन कार कंपनियां उन्हें पछड़ाने में जुटी हैं. लेकिन उनकी ऊंची कीमत, नकारात्मक छवि और कार्बन उत्सर्जन जैसे मुद्दे इस रेस में उनके लिए स्पीडब्रेकर साबित हो रहे हैं.

default

भारतीय ऑटोमोबाइल क्षेत्र में फिलहाल जापानी कारों का बर्चस्व है. बाजार में उनकी हिस्सेदारी लगभग 27 फीसदी है. वहीं बीएमडब्ल्यू और फोल्क्सवागेन जैसी जर्मन कंपनियां तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक 0.5 फीसदी हिस्से पर ही काबिज हो सकी हैं.

जयराम के वार

बीते दिनों केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अधिक धुंआ उगलने वाले स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल (एसयूवी) को 'अपराधी' और 'सामाजिक तौर पर बेकार' वाहन करार दिया था. उनकी इस टिप्पणी ने वाहन क्षेत्र में विवाद पैदा कर दिया. उसके बाद जर्मन कंपनी बीएमडब्ल्यू ने रमेश की टिप्पणी पर कड़ा ऐतराज जताया था.

रमेश ने कहा कि इन गाड़ियों का निर्माण अब भी इसलिए हो रहा है क्योंकि ये सब्सिडी दर पर बेचे जा रहे डीजल पर चलती हैं जिससे बीएमडब्ल्यू, बेंज और होंडा जैसी कारों के मालिकों को फायदा होता है. मंत्री का सुझाव था कि इन कारों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाना चाहिए

Flash-Galerie VCD Umweltliste

. इन गाड़ियों में ईंधन किफायती मानकों का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा था कि लोगों को जर्मनी की महंगी गाड़ियों और अत्यधिक ईंधन उपयोग करने वाले एसयूवी खरीदने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए.

बुनियादी अड़चनें

आखिर अपनी उच्च तकनीक के बावजूद ऑटोमोबाइल क्षेत्र में इस रेस में जर्मन कारों के पिछड़ने की वजह क्या है? इस सवाल पर आटोमोबाइल एक्सपर्ट जे. थामस कहते हैं, "इनका महंगा होना सबसे बड़ी वजह है. इसके अलावा जर्मन कारों को फैमिली कार नहीं माना जाता है. इनको एसयूवी यानी स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल कहा जाता है. युवा वर्ग की कार के इस तमगे की वजह से अमीर लोग इनकी बजाय टोयटा और होंडा सिटी जैसी जापानी कारों की ओर आकर्षित हो रहे हैं."

जर्मन कंपनी फोल्क्सवागेन के साथ एक और दिक्कत है कि बुकिंग के बाद ग्राहक को समय पर डिलीवरी नहीं मिलती. मुंबई के दिलीप चेरियन ने इस साल दीवाली पर 50 हजार रुपए दे कर अपनी पत्नी के लिए एक पोलो कार की बुकिंग कराई थी. तब कंपनी ने उनसे कहा था कि आठ से 12 सप्ताह के बीच डिलीवरी हो जाएगी. चेरियन बताते हैं, "कंपनी लगातार टालमटोल करती रही. लेकिन बाद में उन्होंने जब दीवाली से पहले डिलीवरी में असमर्थतता जताई तो मैंने सूद समेत अपने पैसे मांगे. कंपनी ने अब तक मेरे पैसे वापस नहीं किए हैं." चेरियन अब इस मामले को उपभोक्ता अदालत में ले जाने की सोच रहे हैं. चेरियन कहते हैं कि कई ग्राहक उनकी तरह ही अपनी गाढ़ी कमाई के पसों से कार की बुकिंग कर डीलर के चक्कर काट रहे हैं.

बड़ा निवेश

अपनी नकारात्मक छवि को सुधारने के लिए फोल्क्सवागेन ने भारत के 41 शहरों में व्यापक प्रचार अभियान शुरू किया है. इसके तहत जगह-जगह बड़े बैनर और बिलबोर्ड लगाए गए हैं. टेलीविजन पर भी विज्ञापन

DW.COM

WWW-Links