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विज्ञान

जान बचाएगी टर्की की चमड़ी

टर्की के चेहरे और गर्दन की झूलती हुई चमड़ी में ऐसी खूबी का पता चला है जो कई खतरनाक स्थितियों में इंसान का जीवन बचा सकती है. और वह भी छोटे मोटे खतरों से नहीं बल्कि आंतकी हमले, रासायनिक रिसाव या फिर कैंसर जैसे खतरों से.

सदियों से गोलमटोल टर्की ने अपनी गर्दन की लटकी हुई चमड़ी को गुस्सा या जोश को दिखाने के लिए बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल किया है. यह पक्षी अपनी गर्दन का रंग बदल कर ये सारी भावनाएं व्यक्त करता है. गुस्से में उसकी गर्दन का रंग लाल से नीला हो जाता है, तो जोश में नीले से सफेद. अपनी इसी खूबी की वजह से जापान और कोरिया में टर्की को एक और नाम से जाना जाता है. और वह है "सेवन-फेस्ड बर्ड" या सात चेहरों वाला पक्षी.

टर्की की चमड़ी के इस विशेष गुण के कारण ही अमेरिका और दक्षिण कोरिया के इंजीनियरों ने निर्णय किया कि वे इस पर शोध करेंगे.

टर्की खतरे को भांप कर जिस खूबी से रंग बदलने की क्षमता रखता है, उसका कारण जानने के लिए वैज्ञानिकों ने टर्की की त्वचा का बारीकी से अध्ययन किया. पता यह चला कि इस पक्षी की चमड़ी में प्रकाश को परावर्तित करने वाले कोलेजन फाइबर के गुच्छे पाए जाते हैं, जो कि रक्त वाहिकाओं के घने जाल के बीच फैले होते हैं. जब खून ले जाने वाली धमनियां फैलती या सिकुड़ती हैं तब उनके साथ साथ कोलेजन फाइबर भी हरकत में आ जाते हैं. वैज्ञानिकों ने पाया कि इसी गतिविधि के कारण इनकी त्वचा पर पड़ने वाला प्रकाश अलग अलग कोणों से परावर्तित होता है. इस तरह से चमड़ी का रंग बदला हुआ दिखाई देता है.

इसके बाद वैज्ञानिकों ने एम13 बैक्टीरियोफेज नाम के ऐसे वायरस का इस्तेमाल किया जो टर्की के शरीर के लिए हानिकारक नहीं होते. ये वायरस टर्की के शरीर में फैल जाते हैं और खुद से अपनी संख्या बढ़ा सकते हैं. वैज्ञानिकों ने त्वचा में उनके पैटर्न को देख कर एक ऐसी बायोफिल्म या झिल्ली बनाई जिसमें टर्की की चमड़ी से मिलते जुलते फाइबर के गुच्छे हों. इन बायोफिल्मों ने प्रकाश पड़ने पर वैसे ही व्यवहार किया जैसे टर्की की चमड़ी करती है. इसके अलावा जब उन पर अलग अलग तरह के रासायनिक वाष्प छोड़े गए तो भी बायोफिल्म ने तुरंत ही रंग बदला. इससे खतरे का तुरंत आभास हो जाता है, यहां तक की नंगी आंखों से भी.

जिन रसायनों को जांचा गया उनमें हेक्सेन, आइसोप्रोपिल अल्कोहल, इथेनॉल, मीथेनॉल और बेहद खतरनाक टीएनटी वाष्प भी शामिल हैं. टीम ने इस तरह की जांच के लिए एक मोबाइल एप्लीकेशन भी बनाया है जिसे 'आईकलर एनालाइजर' कहा जाता है. यह ऐप बहुत सारे वाष्पों के बीच अंतर कर सकता है, और इस तरह उन वाष्पों के रसायन को पहचान जाता है. कैलिफोर्निया के बर्कले विश्वविद्यालय के सियुंग वुक ली कहते हैं, "हमारा सिस्टम बहुत सुविधाजनक है, और बनाने में सस्ता भी पड़ रहा है." वुक ली ने इस स्टडी का नेतृत्व किया जो 'नेचर कम्यूनिकेशन्स' नाम के जर्नल में प्रकाशित हुई है. वुक ली आगे कहते हैं, "इस तकनीक को इस तरह से रूपांतरित किया जा सकता है कि स्मार्टफोन किसी खास रसायन के रंगीन फुटप्रिंट को पहचानने में काम आए."

बहुत से वैज्ञानिक ऐसे संवेदक बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो कलर रीडिंग दे सकें. रंगों से रसायन को पहचानना आसान होगा लेकिन ज्यादातर रंग इतनी बारीकी से किसी खास रसायन के साथ जोड़े नहीं जा सकते. टर्की की त्वचा की तर्ज पर तैयार की गई यह नई तकनीक कई तरह के रसायनों के बहुत कम मात्रा में मौजूद होने पर भी उसे पहचान कर प्रतिक्रिया दे देता है. इंजीनियर उम्मीद जता रहे हैं कि जेनेटिक इंजीनियरिंग का इस्तेमाल कर इस तकनीक को और सुधारा जा सकता है. स्टडी में कहा गया है, "हमारे विश्वसनीय और रंगमापीय सेंसर बहुत सारे हानिकारक जहरीले तत्वों और रोगाणुओं को पकड़ने में काम आएंगे. इससे मानव स्वास्थ्य की रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों ही हो सकेगी." वुक ली बताते हैं, "भविष्य में इस तकनीक का इस्तेमाल कर एक ऐसे तरीके को विकसित किया जा सकेगा, जिससे सिर्फ सांस की जांच करके कैंसर और अन्य कई बीमारियों का पता लगाना संभव होगा."

आरआर/एमजे(एएफपी)

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