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दुनिया

जान पर खेलने पर मजबूर इरिट्रिया के लोग

बिना किसी दोष के गिरफ्तारी, प्रताड़ना और हत्याएं. इरिट्रिया की गरीबी में जिंदगी बसर करने वालों की यही कहानी है. यही वजह है कि बड़ी तादाद में लोग देश छोड़ कर यूरोप की ओर आ रहे हैं.

इरिट्रिया से यूरोप का रास्ता खतरों से भरा है. यह जानते हुए भी हर साल हजारों लोग भूमध्य सागर में यूरोप जाने वाले जहाजों पर सवार हो जाते हैं. पूर्वोत्तर अफ्रीका में बसे इस देश के हालात इतने बुरे हैं कि यहां से निकलने के लिए लोग अपनी जान भी दांव पर लगाने से पीछे नहीं हटते. उनका मानना है कि एक तानाशाह राष्ट्रपति के शासन से बुरा और कुछ नहीं हो सकता. आजादी के जीवन की उम्मीद लिए वे यूरोप की ओर निकल पड़ते हैं.

यूरोप आने वाले शरणार्थियों में इरिट्रिया के लोग दूसरे नंबर पर हैं. इनसे ज्यादा संख्या है सीरिया से आने वाले लोगों को. सीरिया में लंबे समय से चल रहे गृह युद्ध में लाखों लोग मारे जा चुके हैं. ऐसे में देश छोड़ने से बेहतर विकल्प उन्हें नहीं दिखता. इरिट्रिया में युद्ध नहीं है लेकिन वहां सरकार की मनमानी लोगों की परेशानी का सबब बनी हुई है. अमेरिका ने कई बार इरिट्रिया सरकार पर विरोधियों के अपहरण, प्रताड़ना और हत्याओं का आरोप लगाया है.

उत्तर कोरिया जैसे हालात

1993 में इरिट्रिया इथियोपिया से अलग हो कर एक आजाद देश बना और ईसाईआस अफवेर्की देश के राष्ट्रपति बने और तब से अब तक उन्हीं का शासन चला आ रहा है. देश में ना ही कोई विपक्ष है और ना ही स्वतंत्र मीडिया, जो सरकार की आलोचना कर सके. सरकार के खिलाफ आवाज उठाना खतरे से खाली नहीं है. 1993 से अब तक देश में कभी चुनाव नहीं हुए. देश आजाद तो हुआ लेकिन नागरिकों को किसी तरह की आजादी नहीं मिली.

इसलिए हैरानी की बात नहीं है कि इरिट्रिया को कई बार अफ्रीका का उत्तर कोरिया कह कर भी पुकारा जाता है. उत्तर कोरिया की ही तरह इरिट्रिया भी बाकी की दुनिया से कटा हुआ है, देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है, अंतरराष्ट्रीय मीडिया को वहां अपने संवाददाता भेजने की अनुमति नहीं है और विदेशियों को वीजा मिलना भी कोई आसान काम नहीं. यहां तक कि देश में मानवाधिकारों की स्थिति का ब्यौरा रखने वाली संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिवेदक शीला बी कीथारूथ को भी देश में जाने की अनुमति नहीं है.

पांचवां सबसे गरीब देश

इरिट्रिया में जबरन मजदूरी कराने और गुलामी पर रोक है. लेकिन सेना के रवैये को गुलामी से भी बदतर माना जाता है. देश में हर वयस्क को 18 महीने सेना में काम करना अनिवार्य है. लेकिन मानवाधिकार संगठनों की मानें तो कई बार सालों तक लोगों से जबरन सेना में काम कराया जाता है. उन्हें बेहद कम वेतन दिया जाता है और उनसे दुर्व्यवहार किया जाता है. ऐसे में युवा अपना देश छोड़ यूरोप का रास्ता पकड़ना चाहते हैं. आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल भूमध्य सागर से इटली पहुंचने वाला हर पांच में से एक शरणार्थी जहाज इरिट्रिया से आया. स्वीडन, जर्मनी और स्विट्जरलैंड को इरिट्रिया से सबसे ज्यादा आवेदन पत्र मिलते हैं. जर्मनी में बीते साल 13,200 शरणार्थी आवेदन इरिट्रिया से आए.

सरकार लोगों को देश छोड़ कर जाने से रोकने में कोई रुचि लेती नहीं दिखा रही क्योंकि इसमें भी उसका फायदा है. आलोचक अगर खुद ही देश छोड़ कर चले जाएंगे तो सरकार को किसी से खतरा नहीं रह जाएगा. लेकिन विदेश पहुंचे लोगों पर भी सरकार की नजर रहती है. विदेशों में मौजूद अपने दूतावासों के जरिए सरकार सुनिश्चित करती है कि ये लोग सरकार को टैक्स देते रहें. सरकार ने विदेश में रहने वाले इरिट्रिया के नागरिकों के लिए एक विशेष 'प्रवासी कर' बनाया है जिसके तहत नागरिकों को अपनी कमाई का दो फीसदी सरकार को देना होता है. इसके अलावा अधिकतर लोग अपने परिवारों को भी पैसा भेजता हैं.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इरिट्रिया दुनिया का पांचवां सबसे गरीब देश है. देश में रह रहा युवा हताश है और जान जोखिम में डाल कर यूरोप आने पर मजबूर है.

आईबी/आरआर (डीपीए)

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