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दुनिया

जानलेवा साबित हो रहा है प्यार

दुनिया भर में प्यार जीवन को जीने के लायक बनाती है लेकिन भारत में ठीक इसका उल्टा है. यहां प्यार और स्त्री पुरुष के आपसी संबंध जानलेवा साबित हो रहे हैं.

एक नए रिसर्च से यह सच्चाई सामने आई है कि भारत में जितने लोग आतंकवादी घटनाओं में मरते हैं, उससे कहीं ज्यादा मौतें प्यार व शारीरिक संबंधों की वजह से होती हैं. अध्ययन के यह नतीजे चौंकाने वाले लेकिन सच हैं. राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की ओर से जारी वर्ष 2012 के यह आंकड़े कई नए तथ्यों का खुलासा करते हैं.

इन आंकड़ों से साफ है कि प्यार यहां निजी दुश्मनी और संपत्ति विवाद के बाद हत्याओं की तीसरी सबसे बड़ी वजह है. यही नहीं, देश के सात राज्यों में तो प्यार ही हत्याओं की सबसे प्रमुख वजह है. इनमें 445 हत्याओं के साथ आंध्र प्रदेश पहले नंबर पर है तो 325 के आंकड़े के साथ उत्तर प्रदेश दूसरे पर. इन सातों राज्यों में प्यार व शारीरिक संबंधों की वजह से होने वाली हत्याएं निजी दुश्मनी और संपत्ति विवाद के चलते होने वाली हत्याओं के बराबर है. राजस्थान और पश्चिम बंगाल में पिछले साल 39 हत्याएं प्यार और शारीरिक संबंधों की वजह से हुईं हैं. इन दोनों राज्यों में हत्या के कारणों में प्यार तीसरे नंबर पर है.

आंकड़े कहते हैं कहानी

क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़े अपनी कहानी खुद कहते हैं. पिछले साल पूरे देश में 34,434 हत्याएं हुईं. इनमें से सबसे ज्यादा 3,877 हत्याएं निजी दुश्मनी के चलते हुईं. बाकी में से 3,169 हत्याओं की वजह संपति विवाद था तो 2,549 हत्याएं प्यार के चलते ही हुईं. दिलचस्प बात यह है कि जिन सात राज्यों में प्यार की वजह से सबसे ज्यादा हत्याएं हुईं, उनमें इज्जत के लिए हत्या (आनर किलिंग) की खातिर बदनाम हरियाणा शामिल नहीं है. वहां इस दौरान प्यार के चलते 50 हत्याएं हुईं, जबकि निजी दुश्मनी ने 218 लोगों की जान ले ली. राजस्थान, पश्चिम बंगाल, केरल और पूर्वोत्तर भारत के दूसरे राज्यों में प्यार की वजह से होने वाली हत्याओं के अपेक्षाकृत कम मामले दर्ज हुए. बिहार में सबसे ज्यादा 1,159 लोग संपति विवाद में मारे गए. देश में निजी दुश्मनी की वजह से होने वाली हत्याओं (570) के मामले में भी बिहार अव्वल रहा. उसके बाद उत्तर प्रदेश का नंबर रहा. पिछले साल उत्तर प्रदेश में जहां कुल 4,966 हत्याएं हुईं, वहीं बिहार 3,556 हत्याओं के साथ दूसरे नंबर पर रहा. पूर्वोत्तर का मुख्य दरवाजा कहे जाने वाले असम में जातिगत दुश्मनी के चलते सबसे ज्यादा 51 लोग मारे गए. देश में जहां संपत्ति विवाद के चलते 3,169 लोगों की हत्या हुईं, वहीं प्यार और शारीरिक संबंध 2,549 लोगों की हत्या की वजह बने.

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दहेज हत्या

दिलचस्प बात यह है कि प्रगतिशील कहा जाना वाला पश्चिम बंगाल इस दौरान दहेज के लिए होने वाली हत्याओं के मामले में दूसरे नंबर पर रहा. इस मामले में 415 हत्याओं के साथ ओडीशा पहले नंबर पर रहा जबकि बंगाल में 252 हत्याएं हुईं. वर्ष 2001 के मुकाबले इन आंकड़ों को देखने पर दहेज के लिए होने वाली हत्याओं में लगातर बढ़ोतरी दर्ज की गई है. डायन और झाड़-फूंक प्रथा की वजह से होने वाली मौतों के मामले में भी ओडीशा(32) पहले स्थान पर है. उसके बाद झारखंड (26), आंध्र प्रदेश (24) और बिहार (13) का नंबर है. इन आंकड़ों के मुताबिक, पूरे देश में इस दौरान 120 राजनीतिक हत्याएं हुईं और इनमें 32 हत्याओं के साथ बिहार पहले स्थान पर रहा है.

क्यों हो रही है हत्याएं

आखिर पवित्र और महान समझा जाने वाला प्यार इन हत्याओं की वजह क्यों बन रहा है. कोलकाता में समाजशास्त्र के प्रोफेसर मोहम्मद हफीज कहते हैं, "दरअसल, अब समाज में असहिष्णुता बढ़ रही है. खासकर विजातीय युवक-युवतियों का प्रेम संबंध अब भी लोगों के गले नहीं उतरता. इसलिए ऐसे संबंधों में हत्या एक सामाजिक पंरपरा बन गई है." सिलीगुड़ी में मनोवैज्ञैनिक डा. धीरेन गोस्वामी कहते हैं, "21वीं सदी में पहुंचने के बावजूद समाज की मानसिकता में ज्यादा बदलाव नहीं आया है. जर, जोरू व जमीन को तो सदियों से विवाद की सबसे प्रमुख जड़ माना जाता है. लेकिन अब प्रेम और शारीरिक संबंधों की वजह से बढ़ती हत्याओं ने इस कहावत का मतलब बदल लिया है." वे कहते हैं कि चौतरफा तनाव की वजह से अब असहिष्णुता भी बढ़ रही है. इस वजह से क्षणिक उत्तेजना में प्रेमी जोड़ों की हत्या कर दी जाती है.

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एक दिलचस्प तथ्य यह है कि प्रेम विवाह के लिए मशहूर पश्चिम बंगाल इस मामले में होने वाली हत्याओं में काफी नीचे है. पहले सात नंबर पर जो राज्य हैं उनमें न तो बंगाल शामिल है और न ही इज्जत के नाम पर होने वाली हत्याओं के लिए कुख्यात हरियाणा. खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश व हरियाणा में तो विजातीय प्रेम संबंधों के मामले में मौत की सजा का अलिखित नियम है. पश्चिम बगाल में प्रेम के मामले में समाज काफी हद तक उदार है. शायद इसलिए यहां प्रेम की वजह से होने वाली हत्याएं दूसरे राज्यों के मुकाबले कम हैं.

कोलकाता में अपराध विज्ञान के विशेषज्ञ सुनील लाहिड़ी कहते हैं, "यह चिंताजनक है. समय के साथ समाज का बदलना जरूरी है. प्रेम व शारीरिक संबंधों की वजह से हजारों लोगों का मारा जाने से साफ है कि समाज अब तक अपनी पुरातन सोच से नहीं उबर सका है." लाहिड़ी के मुताबिक, इस प्रवृत्ति को बदलने के लिए पूरे देश में जागरुकता अभियान चलाया जाना चाहिए. लेकिन सेवानृवृत्त प्रोफेसर डा. सुदर्शन बनर्जी की राय इसके विपरीत है. वह कहते हैं, "कोई भी ऐसा अभियान पूरे देश के लोगों की मानसिकता नहीं बदल सकता. आम लोग जब तक अपना नजरिया खुद नहीं बदलते तब तक परिस्थिति में कोई खास बदलाव आने की उम्मीद कम ही है."

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: निखिल रंजन

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