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विज्ञान

जानलेवा मधुमेह की चपेट में शहरी औरतें

एक अध्ययन से पता चला है कि भारत की शहरी महिलाएं स्वास्थ्य के हर संकेतक के लिहाज से प्रभावित हैं. वैसे अब ग्रामीण महिलाएं भी मधुमेह जैसे खतरे से बाहर नहीं रहीं.

भारत में मध्यवर्ग की शहरी महिलाओं में मधुमेह के मामले बढ़ रहे हैं. ग्रामीण इलाके की महिलाओं में यह प्रवृत्ति कम है. इसके अलावा कॉर्पोरेट क्षेत्र में महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में मधुमेह के ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं. ताजा अध्ययन में इसका खुलासा हुआ है. वर्ष 2015 में देश में मधुमेह के 6.91 करोड़ मरीज थे. अगले पंद्रह वर्षों में यह आंकड़ा बढ़कर 11 करोड़ तक पहुंचने का अंदेशा है.

अध्ययनरिपोर्ट

हाल में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि शहरी महिलाओं में मधुमेह के बढ़ते मामलों के चलते उनको तरह-तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है. इससे उनकी मृत्युदर भी बढ़ी है. मध्यवर्ग की शहरी महिलाओं में से जहां 17.7 फीसदी इस बीमारी की चपेट में हैं, वहीं ग्रामीण इलाके में यह आंकड़ा 10 फीसदी है. केंद्र सरकार के विज्ञान व तकनीक मंत्रालय की ओर से प्रायोजित उक्त अध्ययन के मुताबिक, शहरी महिलाओं का बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई), कमर पर चर्बी, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल भी बढ़ रहा है.

तीन-चार वर्षों तक चले अपनी किस्म के इस सबसे बड़े अध्ययन में देश के पांच अलग-अलग इलाकों की लगभग सात हजार महिलाओं को शामिल किया गया था. इस अध्ययन से साफ है कि शहरी महिलाएं स्वास्थ्य के हर संकेतक के लिहाज से प्रभावित हैं. वैसे, ग्रामीण इलाके की महिलाओं के लिए भी अब खतरे की घंटी बजने लगी है. इन इलाकों में 22.5 फीसदी महिलाएं मोटापे की शिकार हैं. लेकिन शहरी गरीब महिलाओं में यह आंकड़ा 45.6 और मध्यवर्ग की महिलाओं के मामले में 57.4 फीसदी है.

इस बीच, एक अन्य अध्ययन में कहा गया है कि शहरी कॉर्पोरेट क्षेत्र में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में मधुमेह का प्रभाव कुछ कम है. स्वास्थ्य बीमा कंपनी अपोलो म्युनिख हेल्थ इंश्योरेंस के इस ताजा अध्ययन में कहा गया है कि मधुमेह-जनित समस्याओं के मामले में पुरुष मरीज महिलाओं के मुकाबले 13 फीसदी ज्यादा दावे कर रहे हैं. कंपनी ने अपने आठ लाख ग्राहकों के अध्ययन के बाद उक्त बात कही है. इसके मुताबिक 40 से 60 वर्ष की उम्र के बीच मधुमेह के मरीजों की तादाद 20 फीसदी बढ़ गई है. कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एंटोनी जैकब कहते हैं, "चालीस पार वाले लोगों में मधुमेह का खतरा पहले के मुकाबले तेजी से बढ़ा है." वे कहते हैं कि कॉर्पोरेट क्षेत्र में सीनियर मैनेजमेंट के स्तर पर पहुंच जाने की वजह से इस उम्र में काम का दबाव काफी बढ़ जाता है. इससे तनाव बढ़ता है जो मधुमेह को न्योता देता है.

बढ़तेमामले

साइलेंट किलर कहे जाने वाले मधुमेह के मरीजों की तादाद देश में तेजी से बढ़ रही है. वर्ष 2015 में भारत में लगभग सात करोड़ लोग इसकी चपेट में थे. इस बीमारी के मामले में गुजरात का पहला स्थान है. मधुमेह के चलते फिलहाल लगभग पौने दो करोड़ लोग किडनी की बीमारी से जूझ रहे हैं. सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि अगले पंद्रह वर्षों के दौरान मधुमेह के मरीजों की तादाद बढ़ कर 11 करोड़ से ज्यादा होने का अंदेशा है. बीते साल यानी 2015 में देश में इस बीमारी की वजह से पैदा होने वाली जटिलताओं के चलते 1.28 लाख वयस्कों की मौत हो गई.

जैकब कहते हैं, "ग्रामीण इलाकों के मुकाबले शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों में मधुमेह के मामले छह गुना ज्यादा हैं." वह कहते हैं कि मधुमेह की वजह से कॉर्पोरेट क्षेत्र में लोगों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है और उनके जीवन का स्तर खराब हो रहा है.

वजह

विशेषज्ञों का कहना है कि शहरों में बदलती जीवनशैली, खान-पान की बदलती आदतें और लगातार बढ़ता काम का दबाव ही इस बीमारी की प्रमुख वजह है. मधुमेह विशेषज्ञ डा. वीरेंद्र भट्टाचार्य कहते हैं, "शहरी जीवन में भागदौड़ के चलते लोगों की जीवनशैली तेजी से बदली है. उनके पास न तो खाने का समय है और न ही शारीरिक कसरत का. इसके अलावा फास्ट फूड का बढ़ता प्रचलन लोगों को इस बीमारी के मुंह में धकेल रहा है." वह कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति शुरूआत में इस बीमारी का गंभीरता से नहीं लेता. बाद में इसकी वजह से दूसरी जटिलताएं सामने आने पर लोग सचेत होते हैं. लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है. अनियंत्रित मधुमेह की वजह से किडनी, आंखों और दिल की बीमारियां हो सकती हैं. एक अन्य विशेषज्ञ डॉक्टर सीमा साहनी कहती हैं, "शहरी इलाकों में खासकर महिलाओं को दोतरफा दबाव झेलना पड़ता है. उनको घर भी संभालना होता है और दूसरी तरह दफ्तर में तनाव व काम के बोझ से भी जूझना पड़ता है." वह कहती हैं कि ऐसी महिलाओं के पास शारीरिक कसरत का भी समय नहीं होता. व्यस्तता और काम के बोझ से वह नियमित रूप से स्वास्थ्य की जांच नहीं करा पातीं. इसी वजह से ऐसी महिलाओं में मधुमेह के मामले ज्यादा सामने आ रहे हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि थोड़ी-सी जागरुकता बरतने पर इस जानलेवा बीमारी पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है. डॉक्टर भट्टाचार्य कहते हैं कि जीवनशैली और खान-पान की आदतों में मामूली बदलाव से लाखों जिंदगियां बच सकती हैं. इसके लिए सरकार और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय गैर-सरकारी संगठनों को मिल कर एक जागरुकता अभियान चलाना होगा ताकि लोग समय रहते इस बीमारी की गंभीरता को समझ कर इससे बचाव कर सकें. वह कहते हैं कि इस बीमारी की चपेट में आने के बाद मामूली संयम भी लोगों की उम्र बढ़ा सकता है.

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