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दुनिया

जानलेवा नसंबदी शिविर

भारत में छत्तीसगढ़ प्रांत में सरकारी शिविर में नसबंदी कराने वाली आठ महिलाओं की मौत हो गई हैं जबकि दर्जनों नसबंदी कराने वाली महिलाओं की हालत चिंताजनक बनी हुई है.

छत्तीसगढ़ में अधिकारियों का कहना है कि नसबंदी ऑपरेशन कराने वाली 60 से ज्यादा महिलाओं की हालत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया है और उनमें से 24 गंभीर रूप से बीमार है. बिलासपुर के कमिश्नर सोनमणी बोरा ने बताया, "ऑपरेशन कराने वाली महिलाओं की तरफ से सोमवार को कमजोर नाड़ी, उल्टियां और अन्य तकलीफों की शिकायत की गई. सोमवार से अब तक आठ महिलाओं की मौत हो गई और 64 पीड़ित अलग अलग अस्पतालों में दाखिल है."

राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत राज्य सरकारें अक्सर सामूहिक नसंबदी शिविरों का आयोजन करती हैं. जिसमें महिलाओं को इसके लिए प्रोत्साहित करने के लिए 1400 रुपये दिए जाते हैं. कई बार लक्ष्य पूरा करने के लिए सरकारें स्वयं नसंबदी के लिए सहमत होने वाले जोड़ों को महंगे तोहफे भी देती हैं. हालांकि ऑपरेशन स्वैच्छिक होता है, नागरिक अधिकार समूहों का कहना है कि कार्यक्रम ऐसा है कि महिलाओं को नसंबदी कराने के लिए मजबूर किया जाता है. कई बार अस्पतालों में अपर्याप्त चिकित्सा सुविधा होती है.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने राज्य के चार आला चिकित्सा अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है. इसके अलावा ऑपरेशन करने वाले उस डॉक्टर के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज की गई है. मुख्यमंत्री ने मृतक महिलाओं के परिवार को चार-चार लाख रुपये देने का एलान किया है. बिलासपुर में गुस्साए रिश्तेदारों ने विरोध प्रदर्शन किया जहां ज्यादातर महिलाओं का इलाज चल रहा है. उनकी मांग है कि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए.

इंडियन एक्सप्रेस अखबार का कहना है कि ऑपरेशन एक डॉक्टर और उसके एक सहायक ने पांच घंटे के भीतर किया. इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने बिलासपुर के जिला चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर आर के भांगे के हवाले से छापा, "कोई लापरवाही नहीं हुई, वह एक सीनियर डॉक्टर हैं, हम जांच करेंगे." बिलासपुर के मुख्य अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक का कहना है कि यह बताना मुश्किल है कि किन कारणों से महिलाओं की मौत हुई. रमनेश मूर्ति के मुताबिक, "इस त्रासदी के कारणों पर अटकलें लगाना जल्दबाजी होगी. हम यहां भर्ती महिलाओं के इलाज को अहमियत दे रहे हैं, क्योंकि उनका रक्तचाप गिर गया है. पोस्टमार्टम हो जाने के बाद ही हम कारण जान पाएंगे "

पिछले साल एक न्यूज चैनल ने एक रिपोर्ट दिखाई थी जिसमें सामूहिक नसंबदी करने के बाद महिलाओं को खुले मैदान में बेहाल छोड़ दिया गया था. इस रिपोर्ट को दिखाए जाने के बाद काफी विवाद हुआ था. अधिकारियों ने कहा था कि इस प्रक्रिया में शामिल होने वाली महिलाओं का ऐसे अस्पताल में ऑपरेशन किया गया था जहां महिलाओं के रखने का इंतजाम नहीं था.

2011 में सरकार ने नसबंदी शिविरों के लिए दिशा निर्देश जारी किए थे. लेकिन उन पर ठीक से अमल न होने के कारण 2012 में ह्यूमन राइट्स वॉच ने सरकार से स्वतंत्र शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करने का आग्रह किया था जिसमें लोग मजबूर किए जाने और नसबंदी केंद्रों की खराब गुणवत्ता सेवा की शिकायत कर सकें. उसने साथ ही सरकार से पुरुष सरकारी कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण की प्राथमिकता तय करने को कहा था जिसमें पुरुषों को गर्भनिरोधक विकल्पों के बारे में जानकारी और परामर्श दी जा सके.

लेकिन केंद्र सरकार को दिए गए सुझावों के बाद भी जमीनी स्तर पर समस्या जस की तस है. भारत में परिवार नियोजन कार्यक्रम का ध्यान परंपरागत रूप से महिलाओं पर केंद्रित है और जानकारों का कहना है कि पुरुष नसबंदी सामाजिक तौर पर अब भी स्वीकार्य नहीं है.

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