जाति व्यवस्था विरोधी है दलित साहित्य | मनोरंजन | DW | 21.06.2014
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मनोरंजन

जाति व्यवस्था विरोधी है दलित साहित्य

तुलसी राम भारत के उन लेखकों में शामिल हैं जिन्होंने अभाव और नाउम्मीदी से सुरक्षित भविष्य और ख्याति का लंबा रास्ता तय किया है. उनकी आत्मकथा ‘मुरदहिया’ ने प्रकाशित होते ही हिन्दी साहित्य जगत में सनसनी फैला दी थी.

ऐसा नहीं कि मुरदहिया हिन्दी में किसी दलित लेखक की पहली या सर्वश्रेष्ठ आत्मकथा थी, लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि जिस निर्लिप्तता और मार्मिकता के साथ तुलसी राम ने अपने बचपन के अनुभवों का बेबाक ढंग से वर्णन किया था, वह अपने-आप में विशिष्ट था. कुछ ही माह पहले उनकी आत्मकथा का दूसरा खंड ‘मणिकर्णिका' आया है और उसका भी साहित्यप्रेमियों ने स्वागत किया है. तुलसी राम नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में प्रोफेसर हैं. प्रस्तुत है उनके साथ हुई बातचीत के कुछ अंश:

पिछले दो दशकों के दौरान हिंदी में दलित लेखन ने अपनी जगह बना ली है. आत्मकथाओं के अलावा कहानियां, उपन्यास और कविता आदि विधाओं में भी दलित लेखक खूब लिख रहे हैं. क्या हिंदी में भी दलित लेखन उतना ही सशक्त है जितना मराठी जैसी अन्य भारतीय भाषाओं में?

निश्चित रूप से दलित साहित्य विभिन्न भाषाओं तथा विभिन्न विधाओं मे लिखा जा रहा है. 1960 और 1970 के दशक में आत्मकथाओं की वजह से मराठी दलित साहित्य काफी चर्चा में रहा किंतु उसके बाद मराठी दलित साहित्य की चर्चा धीरे-धीरे कम होने लगी. इसका प्रमुख कारण था हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य का उदय होना. हिन्दी का दलित साहित्य भी मराठी की ही तरह अपनी आत्मकथाओं के लिए ही प्रसिद्ध हुआ किंतु कथा साहित्य तथा काव्य के क्षेत्र मे अब भी वह कमजोर है.

क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि दलितों के बारे में प्रामाणिक साहित्य केवल दलित लेखक ही रच सकते हैं? इसके आधार पर काफी समय से कुछ दलित लेखक प्रेमचंद को दलित-विरोधी तक बता रहे हैं और 'कफन' जैसी उनकी श्रेष्ठ मानी जाने वाली कहानियों को पाठ्यक्रम से निकाले जाने की मांग भी कर रहे हैं.

मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूं कि दलित साहित्य सिर्फ दलित ही लिख सकता हैं. दलित साहित्य मूलतः जाति व्यवस्था विरोधी साहित्य है. अतः वर्ण व्यवस्था के खिलाफ जो भी लिखे उसे दलित साहित्य माना जायेगा. वर्ण व्यवस्था के खिलाफ लिखने का सीधा सन्दर्भ धर्म तथा ईश्वर के खिलाफ भी होता है क्योंकि जाति व्यवस्था को धर्म और ईश्वर की देन कहा गया है. जहां तक प्रेमचंद की कहानी ‘कफन' का सवाल है, इसका समापन बड़े ही नाटकीय ढंग से चमत्कारिक रूप में किया गया है. कोई भी दलित कफन बेच कर शराब नहीं पी सकता. प्रेमचंद के निष्कर्ष से दलित विरोधी भावना भड़कती है. कोई भी पाठक जब यह पढ़ता है कि एक दलित कफन बेच कर शराब पी गया तो उसके प्रति अनायास ही घृणा का भाव पैदा हो जाता है. किन्तु ऐसे एक अपवाद के कारण प्रेमचंद को दलित विरोधी नहीं कहा जा सकता. उन्होंने अपने लेखन में दलितों से जुड़े सवालों को उठाया है. प्रतिबंध की मांग करने वाले लोगों को प्रेमचंद को सम्पूर्णता में देखना चाहिए.

दलित लेखकों की शिकायत है कि उनके लेखन की सवर्ण साहित्यकार और आलोचक जानबूझकर उपेक्षा करते हैं. क्या आपको ऐसी उपेक्षा सहनी पड़ी?

कुछ कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी लोग निश्चित रूप से दलित साहित्य की उपेक्षा करते हैं किन्तु हिन्दू समाज का एक बहुत बड़ा समुदाय तर्कबुद्धि के चलते दलित साहित्य के प्रति काफी उदारता से पेश आता है. जहां तक मेरा व्यक्तिगत सवाल है, मेरे लेखन को दलितों से कहीं ज्यादा सवर्ण साहित्यकारों तथा आलोचकों ने पसंद किया है.

हिंदी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य के बारे में आपकी क्या राय है? विभिन्न विधाओं में इन दिनों कैसा लिखा जा रहा है? कौन सी विधा पिछड़ गयी है?

हिंदी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में झांका जाए तो पता चलता है कि कहानी लेखन बहुत सशक्त है किन्तु काव्य लेखन दिन-प्रतिदिन कमजोर होता जा रहा है. धीरे-धीर आलोचना विधा भी विलुप्त होती जा रही है. नाटक विधा लगभग विलुप्त हो चुकी है.

क्या लेखक का गैर-राजनीतिक होना उसे बेहतर लेखक बनाता है या किसी विशिष्ट विचारधारा से लैस होना?

गैर राजनीतिक लेखक समाज के यथार्थ से हमेशा दूर रहता है और वह मात्र कल्पना को अपने लेखन का हथकंडा बना लेता है. यह जरुरी नहीं है क़ि कोई लेखक किसी राजनैतिक दल से जुड़ा हो, किन्तु बिना रैशनल विचारधारा के कोई अच्छा लेखक नहीं बन सकता.

डॉक्टर अंबेडकर का सपना जातिव्यवस्था का समूल नाश था. लेकिन वह तो और भी मजबूत होती दीख रही है. आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

डा. अंबेडकर जीवन भर जाति व्यवस्था के विरोध में लड़ते रहे किन्तु उनके बाद के सभी दलित नेताओं ने जातिव्यवस्था विरोधी आन्दोलन को जातिवादी आंदोलन में बदल दिया जिसके कारण जातीय सत्ता की होड़ मच गयी. जातिवादी राजनीति के विकास के साथ ही हिन्दुत्ववादी सांप्रादायिकता की राजनीति बहुत मजबूती से उभर कर सामने आयी है जिसके कारण दलितों के विरुद्ध सामाजिक भेदभावों में बेतहाशा वृद्धि हुई है.

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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