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ताना बाना

ज़रदारी के अधिकारों में कटौती तय

पाकिस्तान में राष्ट्रपति असिफ अली ज़रदारी ने संविधान के ऐतिहासिक 18वें संशोधन पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. इसके तहत राष्ट्रपति के अहम अधिकारों में कौटती होगी और देश में लोकतंत्र मजबूत होने की उम्मीद है.

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राष्ट्रपति ज़रदारी के अधिकारों में होगी कटौती

18वें संशोधन के बाद पाकिस्तान में राष्ट्रपति प्रतीकात्मक राष्ट्राध्यक्ष होगा और सभी अहम अधिकार प्रधानमंत्री और संसद के पास होंगे. अब राष्ट्रपति से संसद को भंग करने, प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने और सेनाध्यक्षों की नियुक्ति करने के अधिकार वापस ले लिए जाएंगे. सैनिक शासक जनरल ज़िया उल हक़ और उसके बाद परवेज मुशर्रफ के दौर में राष्ट्रपति को ये सब अधिकार दिए गए. अतीत में कई बार सैनिक शासन की वजह से पाकिस्तान में लोकतंत्र को पटरी पर से उतारा गया है.

प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी ने 18वें संशोधन को लोकतंत्र की जीत का दर्जा दिया और कहा कि यह एक मील का पत्थर साबित होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि इस संविधान संशोधन से देश में स्थिरता बढेगी और यह परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान के लिए आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में भी फायदेमंद होगा.

समझा जाता है कि इस संशोधन के साथ ही असिफ अली ज़रदारी का भविष्य भी दांव पर लगा है क्योंकि देश के भीतर उनका विरोध बढ़ रहा है. 2008 में पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की हत्या के बाद उनके पति आसिफ अली जरदारी के नेतृत्व में पाकिस्तान पीपल्स पार्टी ने जीत हासिल की. इसके बाद राष्ट्रपति का पद संभालने वाले ज़रदारी तालिबान उग्रवादियों को खत्म करने और देश की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में अब तक नाकाम रहे. साथ ही उन पर भ्रष्टाचार के पुराने मामले हावी हो रहे हैं. अब तक वह राष्ट्रपति होने के नाते इन मुकदमों से बचे हुए हैं लेकिन पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सरकार से मांग की है कि उनके खिलाफ दर्ज मामलों को फिर से खोला जाए.

पाकिस्तान में सभी पार्टियां 18वें संशोधन को ऐतिहासिक मान रही है. हसन अस्करी जैसे राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रपति के अधिकार औपचारिक तौर पर कम तो किए जा रहे हैं, लेकिन खासकर असिफ अली ज़रदारी का प्रभाव तो बना ही रहेगा. इसकी वजह यह भी है कि ज़रदारी ही पाकिस्तान की सबसे शक्तिशाली और सत्ताधारी पार्टी पीपीपी के कर्ताधर्ता हैं.

18वें संशोधन के मुताबिक दो बार प्रधानमंत्री रह चुका कोई व्यक्ति अब आगे भी चुनाव लड सकता है. यह प्रावधान खासकर दो बार प्रधानमांत्री रह चुके और विपक्ष के नेता नवाज़ शरीफ के हित होगा. इसके अलावा ब्रिटिश राज से सरहदी सूबे के नाम से जाने जाने वाले सीमांत पश्चिमोत्तर प्रांत का नाम अब खैबर पखतूनख्वा होगा. यह नाम वहां रहने वाली बहुसंख्यक पख्तून आबादी की इच्छाओं के मुताबिक रखा गया है. हालांकि हजारा डिविजन जैसे कुछ इलाकों में प्रांत का नाम बदलने का विरोध भी हो रहा है.

18वें संशोधन में संसद के ऊपरी सदन सीनेट की सीटों की संख्या 100 से बढ़ाकर 104 कर दी गई है. बढ़ी हुई चार सीटें गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को दी जाएगी.

रिपोर्टः एजेंसियां/प्रिया एसेलबोर्न

संपादनः ए कुमार

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