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ब्लॉग

जल प्रलयः एक महीने बाद

आखिर 15 जुलाई की वो डेडलाइन आ गई जिसके बाद उत्तराखंड की कुदरती आफत में लापता हुए लोग मृतक मान लिए जाएंगें और मुआवजा उनके परिजन ले पाएंगे. मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. लेकिन इसमें कई पेंच हैं.

करीब छह हजार लोग एक महीने पहले आई इस भीषण आपदा में लापता बताए गए हैं. उत्तराखंड के करीब एक हजार लोग लापता हैं. अन्य 18 राज्यों के लापता लोग हैं. सरकार का कहना है कि मुआवजे के लिए एक महीने की कटऑफ डेट रखी गई थी लेकिन लापता लोगों की तलाश का सिलसिला जारी रहेगा. सरकार ने एक अटपटा फैसला और किया है कि मुआवजा लेने वाले परिजनों से एक एफिडेविट भी इस आशय का लिया जा रहा है कि अगर लापता व्यक्ति घर आ गया तो मुआवजे की रकम लौटानी होगी. राज्य के व्यक्ति के लिए पांच लाख रुपये की राशि है और राज्य के बाहर के व्यक्ति के लिए केंद्र की ओर से साढ़े तीन लाख रुपये की राशि रखी गई है.

उत्तराखंड एक बड़ी भारी विपदा के बाद उतनी ही बड़ी अनिश्चितता, अराजकता और पसोपेश में फंस गया नजर आता है. सेना, वायुसेना और अर्धसैनिक बलों की मदद से एक लाख 17 हजार यात्रियों को सुरक्षित निकाल लिया गया है लेकिन राहत और बचाव का दूसरा चरण आपाधापी का शिकार नजर आता है. इस चरण में उन प्रभावित इलाकों में राहत और रसद पहुंचाने का काम किया जा रहा है जो पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं और घरों में खाने को दाना तक नहीं है. आपदा में प्रभावितों की संख्या पांच लाख के करीब है.

Überschwemmung in Indien

मृतकों और लापता लोगों की संख्या पर भी असमंजस

सरकार का दावा है कि ये काम भी युद्धस्तर पर किया जा रहा है. आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्या का कहना है, "कहीं कोई कमी या ढिलाई की बात नहीं है, मैं खुद कई इलाकों के दौरों पर गया हूं और मैंने पाया है कि रसद लोगों को मिल रही है और हमारे कर्मचारी बखूबी काम कर रहे हैं." लेकिन रसद सामग्री बांटने की प्रक्रिया में सुस्ती और समन्वय के अभाव को लेकर लोगों में आक्रोश है. उत्तरकाशी में आपदा प्रभावितों ने इस सिलसिले में स्थानीय अधिकारियों का घेराव भी किया. गढ़वाल मंडल के रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी और टिहरी जिलों और कुमाऊं के पिथौरागढ़ व बागेश्वर जिलों के चार हजार प्रभावित गांवों में से सैकड़ों ऐसे हैं जिनका सड़क संपर्क बाकी देश से कटा हुआ है. वहां घोड़ों, खच्चरों की मदद से राहत सामग्री भिजवाई जा रही है. लेकिन इनमें भी कई इलाके ऐसे हैं जहां किसी भी तरह से कोई रास्ता नहीं बचा लिहाजा वहां आपात मार्ग निकालने की कोशिश की जा रही हैं.

इस बीच मुख्य सचिव सुभाष कुमार ने प्रभावित इलाकों का दौरा किया और माना कि असली चुनौती उन गांवों तक राशन पहुंचाने की है जिनसे संपर्क कटा हुआ है. सेना के हेलीकॉप्टर खराब मौसम के बीच कुछ इलाकों में राहत सामग्री उतार रहे हैं लेकिन वहां से उन्हें दूरदराज की चढ़ाइयों में बसे गांवों तक पहुंचाना बहुत मुश्किल हो रहा है. रसद बड़े पैमाने पर आ तो रही है लेकिन बंट नहीं पाई है..

Flut Himalaya

कई जगहों पर पहुंचना मुश्किल

उत्तराखंड में जल प्रलय को आए एक महीना हो गया है. प्रलय के ग्राउंड जीरो यानी केदारनाथ में मरघट सा सन्नाटा पसरा हुआ है. हर तरफ मलबा फैला हुआ है. उसकी सफाई के लिए और मलबे के नीचे से लाशें निकालने के लिए पुलिस, डाक्टरों और सफाईकर्मियों की टीमें वहां भेजी गई हैं. केदारनाथ की तबाही को जांचने परखने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का एक दल भी उत्तराखंड के दौरे पर है.

केदारनाथ में मलबे की सफाई के लिए जेसीबी मशीनें ले जाने की बात की जा रही हैं लेकिन भूविज्ञानी आगाह करते हैं कि केदारनाथ एक बेहद संवेदनशील भूक्षेत्र हैं और यहां खतरा अभी टला नहीं है. भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण संस्थान के पूर्व निदेशक पीसी नवानी का कहना है, "ये एक ग्लेशियल डिपोजिट है और उससे जल्दीबाजी में छेड़छाड़ खतरनाक हो सकती है." भूगर्भविज्ञानियों के मुताबिक मलबे में आई चट्टानों, बोल्डरों, पत्थरों और गाद का अध्ययन प्राकृतिक कहर की वजहों और स्रोतों के बारे मे कुछ जानकारी दे सकता है.

ब्लॉग: शिवप्रसाद जोशी

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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