1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

विज्ञान

जल्दी जांच से खत्म नहीं होगा टीबी

2015 तक तपेदिक का संक्रमण कैसे कम किया जाए, इसके लिए दुनिया भर में कोशिशें जारी हैं. तुरंत नतीजा बताने वाला परीक्षण भी अब उपलब्ध है, लेकिन इससे बीमारी कम हो पाएगी, इसमें शंका है.

दक्षिण अफ्रीका में जारी परीक्षणों के दौरान यह पता चला है कि नई जांच, एक्सपर्ट एमटीबी/आरआईएफ ने टीबी का पता जल्दी लगाया और इसलिए मरीजों को जल्दी दवाई भी दी जा सकी. हालांकि बीमारी की गंभीरता पर इसका ज्यादा असर नहीं हुआ. मुख्य शोधकर्ता और केप टाउन मेडिसिन विभाग के कीर्तन ढेडा ने बताया, "एक्सपर्ट के कारण बीमारी का जल्दी पता लगने के बावजूद, टीबी की गंभीरता कुल मिला कर कम नहीं हुई है."

एक्सपर्ट की जांच दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे, जांबिया और तंजानिया में की जा रही है. इन इलाकों में तपेदिक संक्रमण की दर अप्रैल 2011 से मार्च 2012 के बीच ज्यादा रही. टीबी के संदेह वाले 744 लोगों को एक्सपर्ट टेस्ट के लिए और 758 को पारंपरिक माइक्रोस्कोप टेस्ट के लिए भेजा गया. माइक्रोस्कोप टेस्ट में फेफड़े के द्रव्य की जांच की जाती है. स्मियर माइक्रोस्कोपी नाम के इस परीक्षण को अक्सर सीने के एक्सरे के साथ मिला कर किया जाता है लेकिन इससे हर साल कम से कम 40 से 60 फीसदी टीबी मरीज पकड़ में नहीं आ पाते. इतना ही नहीं, संक्रमित 40 फीसदी मरीज इलाज के लिए कभी क्लीनिक नहीं आते.

इसी वजह से जरूरत एक्सपर्ट जैसे तेज परीक्षणों की है, जो दो घंटे में ही नतीजा बता देते हैं. इस परीक्षण का विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2011 में समर्थन किया था, खासकर उन लोगों के लिए जो मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी से संक्रमित हैं या फिर ऐसे टीबी से जो एसआईवी संक्रमण के कारण जटिल हो गया हो.

दक्षिण अफ्रीका में जांच के दौरान 182 लोग एक्सपर्ट टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए और 182 दूसरी टेस्ट में. इनका फिर दो महीने बाद परीक्षण किया गया और इलाज शुरू होने के छह महीने बाद भी. इस परीक्षण के दौरान उनके जीवन की गुणवत्ता, टीबी के लक्षण देखे गए. शोध के खत्म होने कर माइक्रोस्कोपी और एक्सपर्ट परीक्षण वाले दोनों ग्रुप में आठ फीसदी मरीजों की मौत हो गई.

रिपोर्ट में कहा गया है कि माइक्रोस्कोपी समूह में इलाज में देरी के बावजूद, टीबी से जुड़ी बीमारियों की गंभीरता में कोई अंतर नहीं पाया गया. अगर जल्दी पता चलने से जल्दी इलाज शुरू हुआ, तो फिर दोनों समूहों के मरीजों की स्थिति में फर्क होना चाहिए था, जो जाहिर है कि नहीं दिखा. शोध के नतीजे में लिखा गया है, "लंबे समय में परीक्षण के असर को संभवतया जरूरत से ज्यादा आंका गया." यह शोध नीति बनाने वालों के लिए अहम साबित हो सकता है क्योंकि एक्सपर्ट परीक्षण शुरू करने का खर्च काफी ज्यादा है.

टीबी संक्रमण कम करना संयुक्त राष्ट्र के सहस्राब्धि लक्ष्यों में शामिल है. लेकिन आज भी इस बीमारी के कारण कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़ रहा है. इतना ही नहीं टीबी के दवा प्रतिरोधी संक्रमण भी देखने में आ रहे हैं. अगर इलाज नहीं हो तो संक्रमित मरीजों में से आधे मारे जाते हैं. 2012 में फेफड़ों की इस बीमारी से 86 लाख लोग संक्रमित हुए और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक इनमें से 13 लाख की मौत हुई. दुनिया भर में टीबी के 95 फीसदी मामले निम्न या औसत आय वाले देशों में सामने आते हैं. 15 से 44 की उम्र की महिलाओं में मौत की यह तीसरी सबसे बड़ी वजह है.

एएम/एनआर(एएफपी)

DW.COM

WWW-Links