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विज्ञान

जलवायु से जूझता भूटान

इको फ्रेंडली आदतों और नीतियों को अपनाने के बावजूद भूटान फिलहाल जलवायु परिवर्तन से जूझ रहा है. यह उन लोगों के लिए बुरी खबर है जो नदी किनारे रह रहे हैं.

पुना त्सांग चू नदी हिमालय की बर्फीली चोटियों से मध्य पश्चिम भूटान की ओर बहती है, इससे यहां के कई पनबिजली संयंत्रों को फायदा होता है. और यह भूटान में बिजली का मुख्य स्रोत है. और सिर्फ साफ ऊर्जा ही भूटान की खासियत नहीं है, देश की सकल राष्ट्रीय खुशी भी सिर्फ यहीं देखी जाती है. यहां देश का कम से कम 60 फीसदी हिस्सा जंगलों से भरा हुआ रखा जाता है.

सूरज से डर

इन अच्छी नीतियों के बावजूद भूटान का पर्यावरण हाल के साल में खराब हुआ है. नदियों में पानी भरने वाले ग्लेशियर संकरे हो रहे हैं और पिघलते पानी के कारण पुनाखा घाटी की ग्लेशियर झील में पानी का स्तर बढ़ रहा है. लोगों को डर है कि झीलों के तट टूट सकते हैं और आस पास के गांवों और शहरों को लील सकते हैं.

नदी के तट पर दुकान चलाने वाले माहुम ने डॉयचे वेले को बताया, "जब भी सूरज चमकने लगता है, मुझे चिंता होती है, क्योंकि मुझे बताया गया है कि सूरज के कारण ग्लेशियर पिघलते हैं. जब रात में मैं नदी की आवाज सुनता हूं तो मुझे डर लगता है और मैं हमेशा लाइट ऑन रखता हूं."

माहुम और उनके पड़ोसियों को कुछ साल पहले तक नहीं पता था कि उन्हें ऐसी कोई चिंता कभी करनी होगी. हाल ही में अधिकारियों ने उन्हें बताया कि उनका गांव सामदिनखा हाई रिस्क जोन में है. जबकि उनका गांव ग्लेशियल लेक से तीन हजार मीटर नीचे हैं. 1994 में यहां ग्लेशियर के कारण बनी एक झील के तट टूटने से भारी बाढ़ आ गई थी. इसमें 22 लोग मारे गए.

पूर्व चेतावनी सिस्टम

अब नदी किनारे रहने वाले लोगों को सिखाया जा रहा है कि बाढ़ का साइरन बजने पर वह जगह खाली कैसे करें. जिले के पारंपरिक नेता ताउचु कहते हैं, "इसकी आवाज अलग सी है. जब आप इसको सुनते हैं, तो आप जान जाते हैं कि यह कोई कार या मोबाइल की आवाज नहीं. आप तुरंत समझ जाते हैं कि आपको अब खाली करना है."

एक बार जब अलार्म बजना शुरू होता है तो संकेत मिल जाता है कि किसी झील का तट टूट गया है और पास के गांव के लोगों को तीन घंटे के अंतर खाली करना जरूरी है, इतनी देर में पानी गांव में पहुंचता है. आपात स्थिति में स्कूल की एक इमारत में जाना होता है.

वानग्दी शहर में बने कंट्रोल रूम से फ्लड वॉच टॉवरों पर निगरानी रखी जाती है. वानग्दी में गणेश प्रधान और जांग्मो कंप्यूटर से पानी के स्तर की निगरानी करते हैं. उन्हें पहाड़ों में पानी का स्तर नापने वालों से हर घंटे में नई जानकारी मिलती है. जांग्मो ने बताया, "अगर ताजा जल स्तर जो अभी 6.99 है अगर यह 7.8 हो जाएगा तो फिर चेतावनी दी जाएगी. 1994 में बाढ़ के बाद यह साइरन सिस्टम बनाया हया था. आज देश में करीब 14 फ्लड वॉच टॉवर हैं जहां साइरन हैं. ये टॉवर नदियों, गांवों और हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्लांट के आस पास बनाए गए हैं.

अनियमित बारिश

एक ओर तो बाढ़ का खतरा बना हुआ है तो दूसरी ओर अनियमित बारिश भी परेशानी खड़ी कर रही है. कभी कम कभी ज्यादा बारिश के कारण बिजली उत्पादन में मुश्किल हो रही है. अधिकतर बिजली संयंत्र नदियों पर ही निर्भर हैं, इस सिस्टम में पानी भंडारण नहीं हो पाता और अगर होता भी है तो बहुत ही कम.

Bhutan Gletscherschmelze 2013 Tauchu Frühwarnungsystem

वॉर्निंग सिस्टम के साथ ताउचु

बासोचू हाइड्रोपॉवर प्लांट में काम करने वाले इंजीनियर कर्मा तेनजिन कहते हैं, "पिछले कुछ साल में लगातार और अच्छी बारिश नहीं हुई. बल्कि पिछले साल तो हमारा अब तक का सबसे कम उत्पादन हो पाया था. बारिश के पैटर्न बहुत अनियमित है."

बारिश में बदलाव, ग्लेशियरों के पिघलने की पुष्टि पिछले 10-12 साल के डाटा से हो रही है. सरकार के बर्फ और ग्लेशियर विभाग के छिमी दोरजी ने बताया, "भूटान में ग्लेशियर कम हो रहे हैं, अधिकतम तापमान बढ़ रहा है और बारिश में कमी आई है. लेकिन पिछले साल में पानी बढ़ रहा है. यह शायद इसलिए है क्योंकि ग्लेशियरों के पिघलने के कारण पानी आ रहा है, भले ही बारिश कम हो रही हो."

पनबिजल अहम

भूटान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी पनबिजली परियोजनाएं हैं. और भूटान के 90 फीसदी घरों में पूना त्सांग चू नदी पर बने बिजली संयंत्रों से ही रोशनी होती है.

भूटान भारत को भी बिजली बेचता है और राजस्व कमाता है. भारत भी भूटान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाला बड़ा साझेदार है और फिलहाल पनबिजली परियोजना के विस्तार के लिए निवेश भी कर रहा है.

पर्यावरण कार्यकर्ता और सरकार के राष्ट्रीय पर्यावरण आयोग के सलाहकार पेल्जोर दोरजी कहते हैं कि पन बिजली को इतना ज्यादा बढ़ाना सही विकास नहीं है. वे दलील देते हैं, "कई लोग कहते हैं कि जब आप बहते पानी से बिजली बनाते हैं तो यह ग्रीन है. मैं ऐसा नहीं मानता. यह ऐसा तरीका है जिससे नदी का बहाव रुकता है."

दोरजी मानते हैं कि पनबिजली परियोजनाओं के विस्तार का फैसला बहुत जल्दबाजी में लिया गया. "इस पर और शोध किया जाना चाहिए था. ऐसा तो है नहीं कि भूटान जितनी बिजली बना रहा है, खुद ही इस्तेमाल कर लेगा, यह निर्यात भी होती है."

दोरजी को चिंता है कि भूटान का आधुनिक बनने का लक्ष्य और निर्यात से राजस्व बढ़ाने की उसकी कोशिशों से देश के नाजुक हो चुके पर्यावरण को और नुकसान पहुंचेगा.

रिपोर्टः आंद्रे आलेटा/एएम

संपादनः ईशा भाटिया

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