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विज्ञान

जलवायु संरक्षण में पिछड़ता जर्मनी

पर्यावरण संरक्षण के चैंपियन देश जर्मनी पर सवाल उठने लगे हैं. अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट बताती है कि जर्मनी आठवें से 19वें नंबर पर फिसल गया है और जलवायु संरक्षण में इसकी दिलचस्पी कम होती दिख रही है.

पर्यावरण और जलवायु के लिए काम कर रहे संगठन जर्मनवॉच और क्लाइमेट ऐक्शन नेटवर्क यूरोप (कैनई) ने हाल ही में अपना नया जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन इंडेक्स जारी किया. रिपोर्ट में लिखा है, "अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी आईईए से मिली उत्सर्जन जानकारी के विश्लेषण से पता चलता है कि इस साल जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन इंडेक्स में उत्सर्जन नई ऊंचाइयां छू रहा है."

दोनों संगठनों का कहना है कि जर्मनी यूरोपीय पर्यावरण संरक्षण राजनीति का अब और नेतृत्व नहीं कर सकता. यह सूचकांक हर साल प्रकाशित होता है. विशेषज्ञों ने इंडेक्स के पहले तीन स्थान खाली छोड़ दिए हैं. उनका कहना है कि दुनिया भर में कोई ऐसा देश नहीं है जो जलवायु परिवर्तन के लिए पूरी श्रद्धा से काम कर रहा हो.

पर्यावरण संरक्षण प्रदर्शन इंडेक्स से पता चलता है कि कौन सा देश पर्यावरण के प्रति कितना जिम्मेदार है. भारत 24वें से 30वें स्थान पर आ गया है.

नीति में अडंगा

पिछले साल जर्मनी आठवें स्थान पर था. इस साल वह 19वें स्थान पर आ गया है और इसका मतलब एक ही हो सकता है, कि पर्यावरण संरक्षण में जर्मनी की दिलचस्पी कम होती जा रही है. संगठनों में काम कर रहे विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले साल जर्मनी ने यूरोपीय ऊर्जा बहस में बहुत सकारात्मक भूमिका नहीं निभाई. साथ ही जर्मनी ने यूरोपीय उत्सर्जन व्यापार प्रणाली को लेकर सुधारों को रोकने की कोशिश की है.

इस प्रणाली में कोई भी फैक्ट्री सीमित स्तर पर कार्बन डायॉक्साइड उत्सर्जित कर सकती है. अगर वह इससे ज्यादा कार्बन डायॉक्साइड उत्सर्जित करती हैं तो उन्हें कम उत्सर्जन करने वाली कंपनी से सर्टिफिकेट खरीदने होंगे. साथ ही जर्मनी ने यूरोपीय संसद में कम ईंधन से चलने वाली गाड़ियों पर कड़े नियमों को लागू करने की कोशिशों पर भी अड़ंगा डाला है. विशेषज्ञ कहते हैं कि जर्मनी अपनी ही ऊर्जा नीति के बदलाव में परेशानी खड़ा कर रहा है. हालांकि चांसलर अंगेला मैर्केल ने फुकुशीमा परमाणु हादसे के बाद एलान किया है कि जर्मनी 2022 तक परमाणु ऊर्जा से अलग हो जाएगा.

भारत में बढ़ते उत्सर्जन

वहीं कैनई और जर्मनवॉच की रिपोर्ट में चीन ज्यादा जिम्मेदार बनता नजर आ रहा है. चीन का कार्बन डायॉक्साइड उत्सर्जन कम हो रहा है और आर्थिक विकास और उत्सर्जन के बीच का रिश्ता भी खत्म होता दिख रहा है. इसका अंजाम यह हो सकता है कि भविष्य में अधिक आर्थिक विकास का प्रदूषण पर कम असर पड़ेगा. अमेरिका में भी उत्सर्जन की मात्रा कम हो रही है और आने वाले सालों में कोयले से चलने वाले बिजली संयत्रों को बंद करने की योजना है.

वहीं भारत पिछले साल 24वें स्थान पर था. इस साल उसकी हालत खराब हुई है और वह 30वें स्थान पर आ गया है. भारत में कार्बनडायॉक्साइड उत्सर्जन बढ़ा है. देश में नवीनीकृत ऊर्जा का अच्छा इस्तेमाल हो रहा है लेकिन पर्यावरण संरक्षण को लेकर नीतियों को और तेजी से कार्यान्वित करने की जरूरत है.

एमजी/एजेए (एएफपी, ईपीडी)

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