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दुनिया

जलवायु परिवर्तन से लड़ना सीखते किसान

अस्थिर मौसम, बढ़ता तापमान, जल संसाधन में गिरावट हरियाणा में खेती के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं. अब किसान सदियों पुरानी पद्धति को मजबूरन छोड़ रहे हैं. लाखों लोगों का पेट भरने के लिए वे स्मार्ट तकनीक अपना रहे हैं.

खेतों में चावल बोने के लिए मशीनों का इस्तेमाल, सिंचाई का सही वक्त बताने वाले उपकरणों का इस्तेमाल और फसल में संक्रमण होने पर फोन पर आने वाले चेतावनी संदेश. मिट्टी उपजाऊ बनाना या फिर कार्बन उत्सर्जन में कमी करना, हजारों किसान जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनना सीख रहे हैं. दिल्ली से करीब 130 किलोमीटर दूर हरियाणा के बीड़ नारायणा में 36 वर्षीय किसान हरप्रीत सिंह कहते हैं, "शुरू में कई किसान अनिश्चित थे, दशकों से जिस तरह से आपने खेती की है उसे बदलना और कुछ नया करना बहुत जोखिम भरा था. इस भाग में खेती आजीविका का सिर्फ साधन नहीं है, यह जीने का एक तरीका है. लेकिन पिछले चार सालों में इन तकनीकों की मदद से हमने पानी और उर्वरक बचाना सीखा है, किराये पर मजदूर लेने की लागत कम की है और फसल के अवशेष को न जलाकर प्रदूषण में भी कमी लाई है."

सिंह हरियाणा के करनाल जिले के 27 गांवों के 12,000 किसान परिवारों में से एक हैं जो वैज्ञानिकों के साथ मिलकर स्मार्ट तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह देश के सबसे उपजाऊ खेती बेल्ट को बनाए रखने का उद्देश्य है. अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान सलाहकार समूह (सीजीआईएआर) स्मार्ट तकनीक का मार्गदर्शन कर रहा है.

खतरे में भारत का ब्रेडबास्केट

1960 और 1970 में भारत के तथाकथित "हरित क्रांति" में सरकार ने ऐसे कार्यक्रम चलाए जिसमें उर्वरक और सिंचाई के ज्यादा इस्तेमाल से कृषि उत्पादन को बढ़ावा दिया गया. हरियाणा का धान उत्पादन 1966/67 में 3,34,000 टन के मुकाबले 2013/14 में तेजी से बढ़कर 40 लाख टन हो चुका है. हरित क्रांति को देश भर में अकाल समाप्त करने का श्रेय दिया जा सकता है लेकिन इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी और अप्रत्याशित मौसम के कारण होने वाला जलवायु परिवर्तन इनमें से एक है.

भारत की खाद्य सुरक्षा एक बार फिर खतरे में हैं. आधी सदी के बाद भी किसानों को पर्यावरण से जुड़े समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जैसे लगातर सिंचाई के लिए पंप चलने से भूजल का स्तर बेहद कम होना, खेतों की मिट्टी का कम उपजाऊ होना.

खतरे में कृषि उत्पादन

अंतर्राष्‍ट्रीय मक्‍का और गेहूं सुधार केंद्र के कृषिविज्ञानी एम एल जाट कहते हैं, "संसाधन घट रहे हैं. भूजल स्तर गिर रहा है. पर्यावरण अस्थिरता सामने आ रही है. मिट्टी की सेहत खराब हो रही है और मुनाफा कम हो रहा है." जलवायु परिवर्तन के अध्ययन के लिए बनी संयुक्त राष्ट्र संस्था आईपीसीसी के विशेषज्ञों का कहना है कि चावल और गेंहू वाले राज्य हरियाणा और पंजाब विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन की चपेट में हैं.

वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी है कि यहां 2080 तक तापमान औसत पांच डिग्री सेल्सियस तक बढ़ेगा जो गंभीर रूप में गेंहू की फसल को प्रभावित करेगा. अप्रैल महीने में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के एक शोध में अनुमान लगाया कि 2050 तक जलवायु परिवर्तन देश में गेंहू की पैदावर को 6 से 23 फीसदी तक कम कर देगा.

अप्रत्याशित बारिश का असर चावल पर भी पड़ेगा. अधिकारियों का कहना है कि करनाल के अलग अलग इलाकों में पिछले दो दशकों में भूजल का स्तर एक से लेकर 13 मीटर तक गिर गया है. हरियाणा खास तौर पर गरीब राज्यों से आने वाले मजदूरों पर निर्भर है, उसे इस क्षेत्र में मजदूरों की कमी की दिक्कत झेलनी पड़ रही हैं. क्योंकि सरकारें अब अपने राज्यों में ऐसी योजनाएं चला रही हैं जिससे मजदूरों को रोजगार वहीं मिल रहा है.

इन चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि समूह करनाल के किसानों को क्लाइमेट स्मार्ट तकनीक से परिचय करा रहे हैं. जैसे बीज बोने के लिए मशीन का इस्तेमाल, ऐसी मशीन के इस्तेमाल से पानी और मजदूर दोनों की बचत होती है.

एए/एमजे (रॉयटर्स)

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