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जर्मन चुनाव

जलवायु परिवर्तन पर डॉयचे वेले की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी

जलवायु परिवर्तन की समस्या के प्रति जागरुकता पैदा करना और इसमें मीडिया की भूमिका-- यह है डॉयचे वेले द्वारा आयोजित ग्लोबल मीडिया फ़ोरम में इस बार का विषय. तीन दिनों के आयोजन में 1000 से अधिक प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं.

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एरिक बेटरमान - ज़रूरी है पत्रकारों का दिमाग बदलना

पू्र्णांग सत्र के अलावा अनेक पैनलों व 50 वर्कशापों में विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों और उससे निपटने के उपायों पर विचार कर रहे हैं. सोमवार सुबह ग्लोबल मीडिया फ़ोरम के सत्र का उद्घाटन करते हुए डॉयचे वेले के महानिदेशक एरिक बेटरमान ने सिनोवेट व डॉयचे वेले द्वारा किए गए एक साझे सर्वेक्षण के नतीजों की ओर ध्यान दिलाया. उन्होंने कहा कि सारी दुनिया में लोग जलवायु परिवर्तन को एक ख़तरे के रूप में देख रहे हैं, लेकिन साथ ही ऐसे लोगों की संख्या भी बढ़ती जा रही है, जिन्हें कोई चिंता नहीं है. उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के ख़तरों व प्रभावों के बारे में बहुतों को पर्याप्त जानकारी नहीं है, और यहां समाचार साधनों की एक विशेष भूमिका है. आगे उन्होंने कहा, " अनेक संकेतों से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन हो रहा है. इंसान और पर्यावरण के लिए उसके परिणामों का हिसाब नहीं लगाया जा सकता. विशेषज्ञों के बीच भी मतभेद हैं. दुनिया ख़त्म नहीं हो जाएगी, लेकिन वह बदल जाएगी. शहर, गांव और मु्ल्क बदल जाएंगे. पर्यावरण नीति के क्षेत्र में जर्मनी की ओर से काफ़ी कुछ किया गया है. लेकिन हमारे सामने ऐसी चुनौतियां हैं, जिनसे अकेले नहीं, बल्कि सिर्फ़ विश्वव्यापी स्तर पर निपटा जा सकता है. लेकिन इस सिलसिले में अलग-अलग दृष्टिकोण हैं, जिनका मीडिया से भी लेना-देना है."

डॉयचे वेले के महानिदेशक ने ध्यान दिलाया कि औद्योगिक देशों के मीडिया

GMF Global Media Forum 2010 Plakat Eingang

डॉयचे वेले का ग्लोबल मीडिया फ़ोरम

में अक्सर जताया जाता है कि विकासशील और विकासोन्मुख देश जलवायु रक्षा के लिए प्रभावशाली क़दम उठाने से कतरा रहे हैं. अक्सर इस बात से आंख मूंद ली जाती है कि इन देशों को आर्थिक वृद्धि और ख़ुशहाली के रास्ते पर आगे बढ़ने का अधिकार है. इस सिलसिले में उन्होंने कहा कि विदेश यात्राओं के दौरान उन्हें अक्सर देखने को मिला है कि जिन इलाकों में उम्मीद नहीं की जाती है, वहां भी पर्यावरण और जलवायु रक्षा के क्षेत्र में बदलाव आया है. " अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलनों में राजनीतिक दांवपेंच की बात अलग है. लेकिन मिसाल के तौर पर एशियाई देशों में पर्यावरण और जीवन की परिस्थिति में सुधार के लिए घटनास्थल पर जो ठोस क़दम उठाए जा रहे हैं, वह एक दूसरी बात है. यूरोप के हमारे आरामदेह माहौल के विपरीत लोग वहां जलवायु परिवर्तन के ख़तरे को नज़दीक से पहचान रहे हैं."

एरिक बेटरमान ने कहा कि यही वजह है कि अपने भविष्य की सुरक्षा की ख़ातिर वहां काफ़ी कुछ किया जा रहा है, यूरोपीय मीडिया जिन पर ध्यान नहीं देता. उनकी राय में इस क्षेत्र के देश इस समस्या से निपटने के सिलसिले में जल्द ही यूरोप से आगे होंगे, क्योंकि वे इस चुनौती का सामना करते हुए शिकायत नहीं करते हैं, बल्कि उसमें नई संभावनाएं देखते हैं.

डॉयचे वेले के महानिदेशक ने कहा कि 58 देशों के रेडियो स्टेशनों की संस्था एशिया-पैसिफ़िक ब्रॉडकास्टिंग यूनियन ने 2009 में उलन बाटोर के अपने सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ संघर्ष में अपनी विशेष ज़िम्मेदारी पर ज़ोर दिया है. मीडिया को इस संघर्ष की रिपोर्ट देनी है, उसकी व्याख्या करनी है. एरिका बेटरमान की राय में इसके लिए पत्रकारों की चेतना में भी जलवायु जैसे परिवर्तन की ज़रूरत है.

रिपोर्ट: उज्ज्वल भट्टाचार्य

संपादन: राम यादव

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