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दुनिया

जर्मन स्कूलों से कंप्यूटर गायब

देश के हर स्कूल में कंप्यूटर हो, हर बच्चे के पास इंटरनेट की सुविधा हो, ऐसे प्रयास दुनिया भर में चल रहे हैं. जर्मनी में 16 साल पहले इसकी शुरुआत हुई. पर अब इन्हें रोक दिया गया है. बच्चे और स्कूल दोनों परेशान हैं.

भारत में टेबलेट आकाश की लोकप्रियता बढ़ रही है. हर बच्चे तक इसे पहुंचाने में तो अभी काफी वक्त लगेगा, लेकिन शुरुआत हो चुकी है. यह बदलते भारत की छवि है. एक छवि अमेरिका की भी है, जहां कई स्कूलों में बच्चे लैपटॉप और टेबलेट के साथ ही आते हैं. लेकिन जर्मनी में ऐसा नहीं होता. कभी टीचर अपना टेबलेट ले आएं तो बच्चे उसी को उत्सुकता से देखते हैं. पर यहां हर स्कूल में कंप्यूटर जरूर होते हैं. अधिकतर स्कूल तो ऐसे हैं, जहां हर क्लास में एक कंप्यूटर है ताकि अगर बच्चों को इंटरनेट में कुछ पता करना हो तो वे उसका इस्तेमाल कर सकें. पर शायद भविष्य में ऐसा ना हो सके. स्कूलों और बच्चों दोनों को इसकी चिंता सता रही है.

हर स्कूल में इंटरनेट

दरअसल 16 साल पहले जर्मनी में एक प्रोजेक्ट शुरू किया गया जिसके तहत स्कूलों को आधुनिक और तकनीक से लैस बनाने की कोशिश शुरू हुई. इसी प्रोजेक्ट के तहत हर स्कूल को कंप्यूटर मुहैया कराए गए थे. 90 के दशक में कंप्यूटर की लोकप्रियता अचानक से बढ़ी. तब तक कुछ ही स्कूल ऐसे थे जहां इनका इस्तेमाल किया जा रहा था. फिर 1996 में शिक्षा मंत्रालय ने दूरसंचार कंपनी डॉयचे टेलिकॉम के साथ मिल कर 'स्कूल्स ऑनलाइन' के नाम से एक प्रोजेक्ट शुरू किया. उस वक्त देश में कुल 35,000 स्कूल थे और मंत्रालय का उद्देश्य था इन सबको ऑनलाइन करने यानी इंटरनेट से जोड़ देने का.

Schulen an Netz e.V. Geschäftsführerin Maria Brosch

स्कूल ऑनलाइन की अध्यक्ष मारिया ब्रोश

कोलोन के एक कैथोलिक स्कूल को भी इसका फायदा मिला. प्रोजेक्ट के ही कारण स्कूल में एक मीडिया रूम बनाया जा सका. लेकिन अब अचानक इस प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया है. माइंत्सर श्ट्रासे स्कूल की प्रिंसिपल बारबरा जेंगेलहोफ का कहना है कि यह उनकी समझ के बाहर है, "तकनीक और मीडिया लगातार तरक्की कर रहे हैं. हमारे जैसे स्कूलों को भविष्य में भी सरकार की मदद की जरूरत पड़ेगी." लेकिन सरकार ने अब मदद देने से इनकार कर दिया है.

स्कूल ऑनलाइन का दफ्तर जर्मनी की पूर्व राजधानी बॉन में था. अब 16 साल बाद इसे बंद कर दिया गया है. स्कूल ऑनलाइन की अध्यक्ष मारिया ब्रोश कहती हैं, "मुझे इस बात की खुशी है कि हम इतने सफल रहे, लेकिन करने के लिए अब भी बहुत कुछ था." प्रोजेक्ट शुरू होने के पांच साल के अंदर ही स्कूल ऑनलाइन सफलता की ऊंचाइयों को छू रहा था. 2001 में ही जर्मनी के हर स्कूल में इंटरनेट लग चुका था.

क्यों ठप पड़ा प्रोजेक्ट?

लेकिन केवल कंप्यूटर और इंटरनेट लगा देना ही काफी नहीं था. नए टीचर ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किए गए. कई ई-लर्निंग वेबसाइटें भी तैयार की गयी ताकि बच्चे स्कूल के बाहर भी इंटरनेट के जरिए टीचरों के साथ संपर्क में रह सकें और किताबों के बाहर भी कुछ सीख सकें.

प्रोजेक्ट को बंद करने की वजह आर्थिक है. दरअसल 1995 तक डॉयचे टेलिकॉम एक सरकारी कंपनी थी जो जर्मन पोस्ट के अंतर्गत आती थी. तब तक देश भर में इंटरनेट की सुविधा देने वाली यह एकमात्र कंपनी थी. 1996 से इसका विनिवेशीकरण होना शुरू हुआ. आज जर्मन सरकार के पास इसके 15 प्रतिशत ही शेयर हैं. तीन साल पहले ही डॉयचे टेलिकॉम ने प्रोजेक्ट से अलग होने का फैसला किया. तब से सरकार नये पार्टनर की खोज में थी जो प्रोजेक्ट का खर्च उठा सके. लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी कोई सफलता हासिल नहीं हुई.

अब यदि स्कूल बच्चों को इंटरनेट से जोड़े रखना चाहते हैं तो उन्हें निजी कंपनियों से ही सुविधा लेनी होगी. कोलोन के माइंत्सर श्ट्रासे स्कूल ने भी ऐसा ही किया है. प्रिंसिपल जेंगेलहोफ बताती हैं कि फिलहाल तो निजी कंपनियों की मदद से वह स्कूल के मीडिया रूम को बचाने में कामयाब रहीं हैं, लेकिन उन्हें डर है कि जल्द ही यह ठप पड़ जाएगा. ऐसे में स्कूलों को नये उपाय ढूंढने ही होंगे.

रिपोर्ट: स्वेन्या यूलिंग/ईशा भाटिया

संपादन: महेश झा 

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