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दुनिया

जर्मन सेना में परिवार और पेशे में सामंजस्य

जर्मनी की रक्षा मंत्री ऊर्सुला फॉन डेअ लाएन ने पद संभालने के एक महीने के भीतर जर्मन सेना को परिवार के लायक बनाने की बड़ी पहल की है. इसे देश में व्यापक समर्थन मिल रहा है लेकिन धन की कमी के कारण इस पर अमल आसान नहीं.

"पद संभालने के पहले ही हफ्ते में ऊर्सुला फॉन डेअ लाएन ने कहा, "हम आकर्षक नियोक्ता होना चाहते हैं." उनका मानना है कि सेना को सैनिकों के परिवारों का ख्याल रखना होगा. पहला कदम, सेना की छावनियों में बच्चों के देखभाल की व्यवस्था और जवानों की तैनाती करते समय उनकी पारिवारिक स्थिति पर ध्यान रखना.

नए रंगरूटों की दिक्कत

भविष्य में जर्मन सेना में काम करने वाले सेवा के तथाकथित पारिवारिक दौर में पार्टटाइम काम कर सकेंगे और बहुत जरूरी होने पर ही उनका ट्रांसफर किया जाएगा. छावनियों में बच्चों के देखभाल की सुविधा में विस्तार किया जा रहा है. जर्मनी की पहली महिला रक्षा मंत्री कहती हैं, "सेना के पुरुष और महिला कर्मियों को नई स्फूर्ति के लिए समय चाहिए. उन्हें नौकरी और परिवार में संतुलन की जरूरत है. और इसमें हम और बेहतर हो सकते हैं."

यह बात सत्ताधारी पार्टियों के बीच हुए गठबंधन समझौते में भी तय की गई है. रक्षा मंत्री का मकसद सेना में असंतोष को भी कम करना है. 2010 में सेना में सुधारों की घोषणा के बाद से इसमें वृद्धि हुई है. इस मामले में नई मंत्री पुराने मंत्री थोमस दे मेजियेर से अलग हैं. दे मेजियेर ने अपने विदाई भाषण में कहा, "सेना में सुधारों का लक्ष्य सैनिकों और कर्मचारियों की संतुष्टि बढ़ाना नहीं था और न ही हो सकता था."

2010 में शुरू किए सुधारों ने जर्मन सेना को बदल दिया है. 2011 से अनिवार्य सैनिक सेवा समाप्त कर दी गई और सैनिकों की संख्या ढाई लाख से घटाकर पौने दो लाख कर दी गई. इसके अलावा 2017 तक जर्मन सेना 'बुंडेसवेयर' की 32 छावनियों को बंद किया जा रहा है और 90 को छोटा किया जा रहा है. इसकी वजह से सेना के असैनिक कर्मचारियों की भी तादाद कम होगी. सैनिकों ने इन सुधारों पर अपने रोष का पिछले साल स्पष्ट इजहार किया है. संसद के सेना प्रभारी हेल्मुठ कोएनिग्सहाउस के पास 5061 शिकायतें आईं. सैनिकों के अनुपात के हिसाब से यह 1959 के बाद से सबसे बड़ी संख्या थी.

जर्मन सैनिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले सेना संघ ने सुधारों पर अमल की गति की आलोचना की है. संघ के अध्यक्ष आंद्रे वुस्टनर का कहना है कि अनिवार्य सेवा वाली सेना से स्वयंसेवी सेना में परिवर्तन का फैसला तेजी से लिया गया लेकिन उसके लिए जरूरी सामाजिक ढांचे की कमी है. वे कहते हैं, "अब इंसान को केंद्र में रखने का समय आ गया है. ऊर्सुला फॉन डेअ लाएन ने इसे समझा है, इसलिए सेना में बहुत से लोगों की उम्मीदें फिर जगी हैं."

बचत के बावजूद आकर्षक

जर्मन सेना के जानकार बैर्टोल्ड मायर को इस पर आश्चर्य नहीं है कि पहले श्रम और समाज कल्याण मंत्री रहीं फॉन डेअ लाएन सेना में भी परिवार और पेशे में सामंजस्य बनाना चाहती हैं. लेकिन साथ ही वे चेतावनी देते हैं, "मेरे विचार में कोई और पेशा ऐसा नहीं जिसमें परिवार के साथ सामंजस्य सेना जितना मुश्किल हो. वे ऐसी स्थिति में काम करते हैं जो हर तरह से परिवार के विपरीत है."

मुश्किल यह है कि जर्मन सेना अब पेशेवर सेना है और श्रम बाजार में उसे रोजगार देने वाली दूसरी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करनी होती है. मायर कहते हैं, "उद्यम बुरी तरह युवा लोगों की खोज कर रहे हैं. और वे कुछ हद तक ज्यादा वेतन दे सकते हैं, बेहतर सामाजिक सुविधाएं दे रहे हैं और अपने कर्मचारियों से जान देने की मांग नहीं कर रहे हैं."

जर्मन रक्षा मंत्री की योजनाओं की राह में सिर्फ संरचनात्मक बाधाएं नहीं हैं. ग्रीन पार्टी के रक्षा नीति प्रवक्ता टोबियास लिंडनर कहते हैं, "इन कदमों पर अमल के लिए धन चाहिए जो इस समय रक्षा बजट में नहीं है." बच्चों के लिए हर जगह किंडरगार्टन की सुविधा देने पर लाखों यूरो का खर्च होगा. इसके अलावा सैनिकों को पार्ट टाइम की सुविधा देने के लिए अतिरिक्त बहाली की जरूरत होगी. साथ ही विदेशों में तैनात सैनिकों को यह सुविधा देना आसान नहीं होगा.

रक्षा मंत्रालय की प्रवक्ता का कहना है कि पेशे और परिवार में सामंजस्य का खर्च मंत्रालय के मौजूदा बजट से ही उठाया जाएगा. इसके लिए सबसे पहले जरूरतों का आकलन किया जाएगा और उसके बाद फैसले लिए जाएंगे. रक्षा मंत्री की घोषणा ने उम्मीदें जगा दी हैं.

रिपोर्ट: स्वेन पोएले/एमजे

संपादन: ईशा भाटिया

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