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दुनिया

जर्मन सेना के भूले बिसरे जवान

जर्मन सेना की विदेशों में बीस साल की तैनाती के बाद पूर्व सैनिकों की युवा पीढ़ी पैदा हो गई है. वे ज्यादा अधिकारों और अपनी कुर्बानियों की मान्यता के अलावा सेना और समाज के बीच मुश्किल रिश्तों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं.

सीन कुछ खतरनाक सा लगता है. करीब 100 मोटरसाइकिल सवार राजधानी बर्लिन में कतार में आगे जा रहे हैं. लेकिन उनके कपड़ों पर किसी रॉक क्लब का निशान नहीं है, बल्कि हरा ड्रेस, कपड़े पर छिपाने वाले धब्बे और सुनहरे रंग वाले पत्तों से बना वी. मोटरसाइकिल सवार यूरोप के रिटायर्ड सैनिक हैं जो गॉन बट नॉट फॉरगॉटेन, शहीद हुए लेकिन भुलाए नहीं गए के नारे के साथ अपने शहीद साथियों की याद कर रहे हैं और अपने लिए ज्यादा अधिकारों की मांग कर रहे हैं. मई के शुरू में बर्लिन में निकाली गई रैली पहला खुला अभियान था जिसमें जर्मन सेना बुंडेसवेयर के पूर्व सैनिकों ने हिस्सा लिया.

रैली के आयोजकों में शामिल जर्मन वेटरन संघ के उपाध्यक्ष क्रिस्टियान बैर्नहार्ट कहते हैं, "हम पहली बार सामने आए और यह हममें से बहुत से लोगों के लिए अद्भुत भावना थी." 35 वर्षीय बैर्नहार्ट काफी समय तक सेना में रह चुके हैं. 2003 में इराक युद्ध शुरू होने से पहले तक वे कुवैत में तैनात थे, जहां उनकी जिम्मेदारी लोगों को रासायनिक और जैविक हथियारों से सुरक्षा देने की थी. "वहां कोई उपयुक्त बंकर नहीं था. हम वहां सुरक्षा वर्दी में ड्यूटी करते थे और इराकी सैनिकों ने हम पर गोलियां चलाई थीं." लौटने के बाद डॉक्टरों ने बैर्नहार्ट को पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर का मरीज घोषित कर दिया.

Bundeswehr Patrouille in Afghanistan ARCHIVBILD

अफगानिस्तान में पेट्रोलिंग

विदेशों में बुंडेसवेयर

जर्मन सेना 20 साल से विदेश में सुरक्षा और युद्धक अभियानों में हिस्सा ले रही है. तब से जर्मनी में फिर से युद्ध में जाने वाले और वहां का अनुभव करने वाले पूर्व सैनिक भी हैं. नए वेटरन में से बहुत से सैनिक युद्ध क्षेत्र से स्वस्थ लौटते हैं जबकि दूसरे शारीरिक और मानसिक घाव लेकर वापस आते हैं. जर्मन वैटरन संघ उन्हें आवाज देना चाहता है. यह काम आसान नहीं. बहुत से जर्मन जब सैनिक, युद्ध और सम्मान जैसे शब्द एक साथ सुनते हैं तो द्वितीय विश्व युद्ध की दर्दनाक यादें उनके मन में ताजा हो जाती हैं. इसलिए जब वेटरन की बात होती है तो बहुत से जर्मन बेचैन से हो उठते हैं. ब्रिटेन या अमेरिका के विपरीत जर्मनी में अब तक सिर्फ द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लेने वाले पूर्व सैनिकों को ही वैटरन कहा जाता है और नाजी युद्ध में हिस्सा लेने के कारण उनसे दूरी दिखाई जाती रही है.

जर्मन रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता श्टेफान पैरिस भी इसकी पुष्टि करते हैं. "लोगों के मन में बेहद स्याह छवियां तैरने लगती हैं, नाजी सेना वेयरमाख्त, तृतीय राइष, बूढ़े लोग और कॉमरेडशिप." रक्षा मंत्रालय में जर्मनी के पूर्व सैनिकों की सुविधाएं बढ़ाना चाहता है, लेकिन इस तरह से कि उसका लाभ नाजी सेना के पूर्व जवानों को न मिले. इसलिए रक्षा मंत्री थोमस डिमिजियेर ने वेटरन शब्द की नई व्याख्या की है. उनके हिसाब से वेटरन सैनिक वे हैं, जिन्होंने सेना में अपनी नौकरी के दौरान विदेशी अभियानों में हिस्सा लिया है और सम्मान के साथ सेना से रिटायर हुए हैं.

Berlin - Ostermarsch

बर्लिन में शांति मार्च, विदेशी तैनाती का विरोध

मान्यता और अधिकार

रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता श्टेफान पैरिस कहते हैं, "हम चाहते हैं कि इन युवा सैनिकों को वुंडेसवेयर के वैटरन के रूप में इसके लिए मान्यता मिले कि उन्होंने यह सेवा की है." रक्षा मंत्री डिमिजियेर ने युद्ध क्षेत्र से लौटे पूर्व सैनिकों के सम्मान के लिए एक स्मृति दिवस बनाने का भी प्रस्ताव दिया है, लेकिन जर्मन संसद में उसे बहुत समर्थन नहीं मिला. पैरिस का कहना है कि पूर्व सैनिकों के लिए सुविधाएं बढ़ाने की बहस इस समय जल्दबाजी होगी. वे कहते हैं, "बुंडेसवेयर में सेवा करने वाले हर सैनिक को बाद में कुछ सुविधाएं मिलती हैं, पेंशन, नए पेशे में जाने की तैयारी या चिकित्सा सुविधा जैसे मुद्दे अच्छी तरह तय हैं."

जर्मन वेटरन संघ के क्रिस्टियान बैर्नहार्ट इससे सहमत नहीं हैं, "अधिकांश सैनिक पार्ट टाइम नौकरी पर होते हैं. बुंडेसवेयर की औपचारिक पेशकश हमेशा नौकरीपेशा जवानों के लिए होती है. सेना छोड़ने के बाद मैं उनका फायदा नहीं उठा सकता." पूर्व सैनिकों का संगठन वैटरन सैनिकों के लिए अलग कानूनी दर्जा चाहता है. इनकी मदद से उन सैनिकों को भी लाभ पहुंचेगा जो सैनिक सेवा के सालों बाद मानसिक दबाव या स्ट्रेस डिसऑर्डर के शिकार होते हैं. बैर्नहार्ट का कहना है कि आम लोगों की मान्यता भी जरूरी है.

उदासीन हैं आम लोग

पूर्व सैनिकों के मामले में लोग आम तौर पर कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. सेना के सोशल साइंस इंस्टीट्यूट के एक ताजा सर्वे के अनुसार पूर्व सैनिकों पर चल रही बहस आम लोगों को आकर्षित नहीं कर रही है. हालांकि सेना की छवि अत्यंत सकारात्मक है. क्या इस उदासीनता की वजह यह है कि विदेशों में होने वाले बहुत से अभियानों को जनता का समर्थन नहीं है? तथ्य यह है कि यदि लोगों को अफगानिस्तान में जर्मन सेना को तैनात करने के बारे में फैसला करना होता तो सैनिकों को वहां से बहुत पहले वापस बुला लिया गया होता. इस बीच सिर्फ 38 प्रतिशत लोग जर्मन सेना के अफगानिस्तान मिशन का समर्थन कर रहे हैं.

जर्मन वेटरन संघ के क्रिस्टियान बैर्नहार्ट उस तरह की आपत्तियों को स्वीकार नहीं करते. वे कहते हैं, "हम अपने आप को खुद विदेशों में तैनात नहीं कर रहे, बल्कि यह काम संसद करती है. और संसद का चुनाव नागरिक करते हैं. सांसद इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रहे क्योंकि इसके साथ चुनाव नहीं जीता जा सकता. विवाद हमारे कंधों पर हो रहा है." बैर्नहार्ट और उनके साथ स्मृति दिवस के लिए संसद का समर्थन चाहते हैं, लेकिन उनका कहना है कि उसके बिना भी काम चल सकता है. "हम और दस साल इंतजार नहीं कर सकते, जब संभवतः सरकार कहे कि हम एक औपचारिक स्मृति दिवस तय कर रहे हैं और उसमें हिस्सा लेंगे, हम यह खुद अपने हाथों में ले रहे हैं." अब मोटरसाइकिल रैली जैसे आयोजन हर साल बर्लिन में हर साल होंगे. दिन भी तय है, ईस्टर रविवार के 40 दिन बाद ईसा मसीह के स्वर्ग प्रयाण के बाद आने वाले शनिवार को.

रिपोर्ट: मिषाएल हार्टलेप/एमजे

संपादन: ए जमाल

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