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OLD - जर्मन चुनाव

जर्मन संसदीय चुनाव के मुद्दे

जर्मनी में इस साल हो रहे आम चुनाव में चांसलर अंगेला मैर्केल की जीत तय लगती है. नतीजे फिर भी चौंका सकते हैं. मैर्केल को मात देने के लिए एसपीडी के चांसलर उम्मीदवार पेयर श्टाइनब्रुक कई मोर्चों पर लड़ रहे हैं.

चांसलर को चुनौती दे रहे श्टाइनब्रुक मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. दरअसल वे सही वक्त पर सही व्यक्ति हैं. वे वित्तीय मामलों के जानकार हैं और जर्मनी के बजट की दिक्कतों को सही सही जानते हैं. सीडीयू-सीएसयू और एसपीडी के महागठबंधन में वे अंगेला मैर्केल के वित्त मंत्री थे. इसी समय वित्तीय संकट शुरू हो गया. अब वे उस समय की अपनी बॉस की कुर्सी हासिल करना चाहते हैं, वे चांसलर बनना चाहते हैं. लेकिन यह द्वंद्व गैरबराबरी का द्वंद्व लगता है. श्टाइनब्रुक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं. कम से कम देखने में यही लगता है. चुनाव सर्वे में सीधे मुकाबले में वे चांसलर से पीछे हैं, और वह भी उम्मीदवारी की घोषणा के बाद से ही.

इसकी कई वजह हैं. मैर्केल अपनी सत्ता के शिखर पर हैं. पार्टी उनके नियंत्रण में है और यूरोपीय राजनीति में यूरो और कर्ज प्रबंधन में उनका दबदबा है. जर्मनों का बहुमत इसके लिए उनका सम्मान और प्रशंसा करता है. चुनौती देने वाले की हैसियत से एसपीडी और श्टाइनब्रुक के पास इसका मुकाबला करने के लिए कुछ भी नहीं. संचार विशेषज्ञ क्रिस्टॉफ मोस कहते हैं, "एसपीडी कह रही है कि क्या कुछ ठीक से नहीं चल रहा है." उनका कहना है कि यह एसपीडी के संभावित मतदाताओं के लिए बहुत कम है और इसलिए भी फिट नहीं बैठ रहा क्योंकि लोग इस समय संतुष्ट हैं. लोग यह जानना चाहते हैं कि जीतने पर श्टाइनब्रुक क्या बेहतर करेंगे.

एजेंडा का फायदा मैर्केल को

हालांकि श्टाइनब्रुक और एसपीडी के पास मतदाताओं को देने के लिए कुछ है. हालांकि कुछ अप्रिय सा. अंगेला मैर्केल से पहले चांसलर रहे एसपीडी के गेरहार्ड श्रोएडर का सुधार पैकेज एजेंडा 2010. उसे विशेषज्ञ आज कर्ज संकट से जूझ रही दुनिया में जर्मनी की मजबूती का आधार मानते हैं. इसके साथ एक सोशल डेमोक्रैट नेता ने कल्याणकारी राज्य में कटौती की शुरुआत की और वह भी अपनी ही पार्टी के भारी विरोध के बावजूद. सामाजिक बीमा पद्धति में कर्मचारियों के योगदान को बढ़ा दिया गया, बेरोजगारी भत्ता कम कर दिया गया, पेंशन की उम्र बढ़ा दी गई यानी सरकार पर बोझ कम किया गया.

इन कदमों का असर जिन लोगों पर मुख्य रूप से पड़ा, वे एसपीडी के परंपरागत मतदाता थे. बहुत से सदस्य नाराज होकर पार्टी छोड़ गए. आज एसपीडी अपराधबोध से ग्रसित है. इतिहासकार एडगर वोल्फरुम कहते हैं, "समस्या यह है कि एसपीडी खुद अपनी सरकार की सफलताओं से किनारा कर रही है." वोल्फरुम इसे 1998 से 2005 की नीतियों को अवैध ठहराने की संज्ञा देते हैं. श्टाइनब्रुक इन सुधारों के समर्थक थे और आज भी हैं, जिसे सभी पार्टियां विकल्पहीन मानती हैं. लेकिन एसपीडी के अंदर इसे पर्याप्त समर्थन नहीं है. अंगेला मैर्केल को आज इसका फायदा मिल रहा है कि एसपीडी ने देश को संकट के समय के लिए मजबूत बनाया.

मध्यमार्गियों के लिए संघर्ष

संसदीय चुनाव के लिए तैयार घोषणापत्र में अंतर है. एसपीडी साढ़े आठ यूरो प्रति घंटे के न्यूनतम वेतन की मांग कर रहा है, सीडीयू-सीएसयू उसके खिलाफ है. उनका कहना है कि कानूनी दबाव के बिना वेतन वार्ता करने वाली पार्टियों को इसे तय करना चाहिए. कर के मामले में एसपीडी समृद्ध लोगों से ज्यादा टैक्स उगाहना चाहती है तो सीडीयू-सीएसयू सरकारी कर्ज कम करना चाहती है. अधिक खर्च करना चाहती है, लेकिन टैक्स बढ़ाए बिना. दोनों मुख्य पार्टियों के लक्ष्य भी अलग हैं. लेकिन घोषणापत्र में राजनीतिक मध्यमार्ग का बोलबाला है. चांसलर अपने प्रोग्राम को "नपातुला और मध्यमार्गी" कह रही हैं, किसी पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं.

चूंकि सभी पार्टियां समाज के मध्य वर्ग का दिल जीतना चाहती हैं, पार्टी कार्यक्रमों में अंतर ढूंढना मुश्किल है. हैम्बर्ग के जनसंपर्क सलाहकार वोल्फगांग राइके कहते हैं, "आजकल ध्रुवीकरण नहीं होता." वे दिन बीत गए जब समाजवाद के बदले आजादी जैसे नारे दिए जाते थे, जैसा 1976 में सीडीयू-सीएसयू ने किया था. यहां तक कि फुकुशिमा की दुर्घटना के बाद से परमाणु ऊर्जा भी विवाद का मुद्दा नहीं रहा. कभी परमाणु बिजली की कट्टर समर्थक रही मैर्केल की सरकार ने जापान में हुई दुर्घटना के बाद परमाणु बिजलीघरों को बंद करने का फैसला किया.

नीति का नाम मैर्केल

अंगेला मैर्केल के लिए यह समयानुकूल है. वे अपनी नीतियों से नहीं, बल्कि रुख से समर्थन जीतती हैं. वह कम बोलती हैं, कम चौंकाने वाली बातें भी. भावनात्मक रूप से वे नियंत्रित रहती हैं और इस किफायती प्रतिक्रिया को दिल का आकार बनाने वाले अंगुलियों के विशेष अंदाज के साथ जोड़ती हैं. एडगर वोल्फरुम कहते हैं, "वे बहुत सामान्य हैं, वे असाधारण नहीं हैं, वे अच्छी मध्य स्तर की हैं, जिसके साथ हर कोई अपनी शिनाख्त कर सकता है." यही उनकी सफलता का राज है, यही उनका कार्यक्रम है.

यदि चुनावी हालात बदलते हैं तो मैर्केल का सत्ताधारी गठबंधन सहयोगी पार्टी एफडीपी को कम मत मिलने के कारण बहुमत खो सकता है. अपनी ताकत बचाने के लिए लिबरल पार्टी एफडीपी चुनाव प्रचार में चांसलर की पार्टी की आलोचना कर रही है. चांसलर की पार्टी बाल परवरिश करमुक्त भत्ता बढ़ाने, मांओं की पेंशन बढ़ाने और किराएदारों को राहत देने जैसे वायदे कर रही है तो एफडीपी का जोर संतुलित बजट पर है. उसके नेता राइनर ब्रुडर्ले कहते हैं, "हमने पूरे यूरोप को कर्ज पर लगाम लगाने को राजी किया है, तो हमें खुद भी उसे लागू करना होगा."

चुनावी गणित का फैसला

अंतिम फैसला चुनावी गणित करेगा. मैर्केल का चांसलर बने रहना एसडीपी को पांच प्रतिशत से ज्यादा वोट आने पर निर्भर करेगा. यदि ऐसा नहीं होता है और एसपीडी तथा ग्रीन पार्टी को बहुमत मिल जाता है तो 40 प्रतिशत वोट पाने के बावजूद चांसलर अपनी कुर्सी खो सकती हैं. लेकिन अगर एसपीडी और ग्रीन पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है तो एसपीडी के साथ मिल कर मैर्केल महागठबंधन सरकार बना सकती हैं. लोगों में महागठबंधन बहुत लोकप्रिय नहीं होता, लेकिन कानून बनाने और कठिन सुधारों को लागू करने में उसके बड़े फायदे हैं.

महागठबंधन से ज्यादा डर पार्टियों को वोट नहीं देने वाले मतदाताओं से है. 2009 के पिछले चुनावों में 30 प्रतिशत मतदाताओं ने किसी पार्टी को वोट नहीं दिया. प्रांतीय चुनावों में तो 40 फीसदी मतदाता चुनाव केंद्रों से दूर रहते हैं. पहले समझा जाता था कि युवा मतदाता वोट देने नहीं जाते, लेकिन नए सर्वे से पता चला है कि सभी उम्र के मतदाताओं में वोट न करने वाले शामिल हैं. फ्रीडरिष एबर्ट फाउंडेशन के डीटमार मोल्टहागेन चेतावनी देते हैं, "यदि कुछ खास तबके मतदान नहीं करेंगे तो उनके हितों का प्रतिनिधित्व भी नहीं होगा."

रिपोर्ट: फोल्कर वागेनर/एमजे

संपादन: अनवर जे अशरफ

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