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जर्मन चुनाव

जर्मन राष्ट्रपति कोएलर के सफर पर नजर

होर्स्ट कोएलर ने 2004 में जर्मन राष्ट्रपति का पद संभाला. पर सोमवार को उन्होंने इस्तीफा दे दिया. विदेश में जर्मनी के सैनिकों की तैनाती पर अपने बयान की आलोचना के बीच कोएलर को इस्तीफा देना पडा. एक नजर उनके अब तक के सफर पर.

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कोएलर की विदाई

कोएलर चांसलर अंगेला मैर्केल की सीडीयू पार्टी के सदस्य हैं और उनका जन्म 22 फरवरी 1943 को पोलैंड के स्कीरविसोव में हुआ. उनका परिवार रोमानिया में बसे उन जर्मन परिवारों में से एक रहा है दो दूसरे विश्व युद्ध के बाद भाग कर जर्मनी आ गए. विश्व स्तर पर नीति निरधारकों में कोएलर का अहम स्थान रहा है और उनकी छवि अपने काम को कुशलता से अंजाम देने वाले व्यक्ति की रही है.

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2004 में जर्मन राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया. कांटेदार मुकाबले में बहुत कम अंतर से उनकी जीत हुई. वह चार साल तक आईएमएफ के मुखिया रहे. इससे पहले वह लंदन में यूरोपीय पुनर्निर्माण विकास बैंक के अध्यक्ष भी रहे.

चांलसर हेल्मुट कोह्ल के मंत्रिमंडल में उप वित्त मंत्री रहते हुए उन्होंने एकीकरण के बाद पश्चिम जर्मनी के मार्क को पूर्वी जर्मनी तक ले जाने में अहम भूमिका निभाई. यूरोपीय मुद्रा संघ पर मासट्रिस्त संधि कराने में भी उन्होंने खासा योगदान दिया. साथ ही उन्होंने बहुत से अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलनों के लिए जमीन तैयार की.

कोएलर सरकार के रुख पर नुक्ताचीनी करने से हिचकिचाते नहीं थे, जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी के इतिहास में अपने आप में अनोखी बात है. 2006 में उन्होंने हवाई यातायात नियंत्रण कंपनी डॉयचे फ्लुगजिशरुंग में हिस्सेदारी बेचने के एक नए कानून पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, जबकि मैर्केल की सरकार इससे एक अरब यूरो जुटाने की उम्मीद कर रही थी. मई 2008 में उन्होंने कहा कि पर्याप्त जोखिम प्रावधानों के बिना जोखिम उठाने वाले बैंकों के कारण विश्व वित्तीय बाजार एक ऐसा दानव बन गया है जिस पर काबू करना होगा.

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कोएलर प्रोटेस्टेंट ईसाई हैं और उनके परिवार में पत्नी और दो संतानें हैं. आर्थिक मुद्दों पर पहले के राष्ट्रपतियों के मुकाबले उनकी कहीं गहरी पकड़ रही है. वह कई बार सरकार की आलोचना भी करते रहे हैं. 2007 में उन्होंने यह कहते हुए मैर्केल की सुधार कोशिशों को निशाना बनाया कि उनकी सरकार को चाहिए कि देश को ग्लोबलाइजेशन की चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर तरीके से तैयार करें. साथ ही उन्हें उम्रदराज मजदूरों को बेरोजगारी भत्ते देने और पोस्टल सेक्टर के लिए न्यूनतम मेहनताना तय करने के अपने फैसलों पर सवाल उठाना चाहिए.

रिपोर्टः एजेंसियां/ए कुमार

संपादनः ए जमाल

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