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दुनिया

जर्मन फेमिनिज्म का चेहरा श्वार्जर

एलिस श्वार्जर जर्मनी में स्त्रीवाद का एक जाना माना चेहरा है. 70 साल के साथ भी वह अपनी गति बरकरार रखे हैं और आगे भी महिला अधिकारों के लिए काम कर रही हैं.

कोलोन में रहने वाली जर्मन पत्रकार और लेखक ऐलिस श्वार्जर जर्मनी में महिला अधिकारों का सबसे मशहूर चेहरा हैं. 70 साल की लेखक लेकिन विवाद से परे नहीं हैं और नए विचार अपनाने वाले इनसे दूर ही रहते हैं.

एमा नाम की पत्रिका की संपादक श्वार्जर कहती हैं कि इतने सालों तक विरोध से उनका फायदा हुआ है. वुपरटाल में पैदा हुई श्वार्जर ने अपनी किताब में अपने निजी जीवन के बारे में भी बताया है. उन्हें पुरुषों और महिलाओं से प्यार हुआ और कई सालों से वे एक महिला के साथ हैं. अपने बारे में श्वार्जर कहती हैं कि वह बहुत कुछ सह तो सकती हैं लेकिन बहुत जल्दी दुखी भी हो जाती हैं. उन्हें जर्मनी का सबसे अहम पुरस्कार बुंडेसफरडींस्टक्रायज भी मिल चुका है. एलिस श्वार्जर लेखन में कटाक्ष के लिए जानी जाती रही हैं.

श्वार्जर के कई आलोचक हैं. शार्लोट रोश जैसी कई लेखिकाओं का मानना है कि श्वार्जर अब भी पुराने मुद्दों पर बात कर रही हैं. इतिहासकार मिरियम गेबहार्ट लिखती हैं कि श्वार्जर अपनी धारणाओं में फंसी हैं और एक "मातृसत्तात्मक" बात बोलती रहती हैं. लेकिन श्वार्जर का कहना है कि जिन बहस पर वह अपने विचार रखती हैं वह अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर अहम हैं.

मिसाल के तौर पर गर्भपात करने का अधिकार और पोर्नोग्राफी के खिलाफ उनकी मुहिम. साथ ही अफ्रीका में महिलाओं के जननांगों को काटा जाना और यौन शोषण भी इन्हीं मुद्दों का हिस्सा है. कहती हैं कि 1979 से वह इस्लामी चरमपंथ के खिलाफ बोल रही थीं और उस वक्त एक अकेली उन्हीं की आवाज थी.

श्वार्जर ने फ्रांस में महिलावाद से अपनी शुरुआत की और फिर जर्मनी में महिलावाद के लिए अहम आवाज बनीं. 1975 में वह अपने लेख "एक छोटा सा अंतर" से मशहूर हुईं और दो साल बाद उन्होंने एमा पत्रिका छापना शुरू किया. श्वार्जर ने कई अभियान शुरू किए, महिलाओं के शोषण से लेकर दफ्तरों में महिलाओं की परेशानी और डायटिंग. इस वजह से उनकी काफी आलोचना भी हुई. 2007 में उन्होंने जर्मन पत्रिका बिल्ड त्साइटुंग के लिए दो प्रचार किए. पहले तो वह खुद इस पत्रिका के खिलाफ बोलती रहीं लेकिन फिर खुद इन प्रचारों में हिस्सा लिया. गुंटर वालराफ और हांस लायेनडेकर ने इसे श्वार्जर की छवि के लिए अच्छा नहीं माना.

70 साल की उम्र में अब श्वार्जर अपनी दूसरी जीवनी लिखना चाहती हैं और एमा के साथ आगे बढ़ना चाहती हैं. कहती हैं, "मैं सोचती, लिखती और काम करती रहूंगी, जब तक मुझमें जान है."

एमजी/एएम(डीपीए)

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