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जर्मन एकीकरण: सारे आंकड़ों से परे

इतिहास में पलक झपकते बीत जाते हैं 20 साल. डॉयचे वेले के मुख्य संपादक मार्क कॉख का कहना है कि जर्मन एकीकरण की 20वीं जयंती के अवसर पर खामियों की बात करने वालों को इसे भूलना नहीं चाहिए.

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जयंती के अवसर पर आंकड़े पेश किए जा रहे हैं, जिनसे पता चलता है कि एकीकरण के 20 साल बाद जर्मनी आज कहां पहुंचा है. और बहुतेरे आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले दो दशकों में गलतियां हुई हैं, खामियां रह गई हैं, जर्मनी के पूरब में पश्चिम के मुकाबले दोगुने लोग बेरोजगार है, एक ही काम के लिए पश्चिम में पूरब के मुकाबले ज्यादा वेतन मिलता है. बहुत सारे अध्ययनों में इन्हें पेश किया गया है, लेकिन क्या इनसे जर्मनी और उसके एकीकरण का परिचय मिलता है? जी नहीं.

एक अनोखी ऐतिहासिक घटना

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के जर्मन इतिहास की सबसे बड़ी परियोजना अभी खत्म नहीं हुई है, और उसे आंकड़ों में नहीं आंका जा सकता. इसमें कोई शक नहीं कि जर्मनी के पूर्वी हिस्से के लिए अरबों यूरो की धनराशि खर्च करनी पड़ रही है, और करनी पड़ेगी तथा पुराने पश्चिम जर्मनी के निवासी इस बोझ को महसूस कर रहे हैं. और पुराने जीडीआर के निवासियों के लिए चुनौतियां इससे कहीं बड़ी रही हैं, अपने देश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रणाली के विध्वंस के बाद जिन्हें एक बिल्कुल नई जिंदगी शुरू करनी पड़ी है.

जर्मनी के सार्वजनिक जीवन में इस प्रक्रिया की सफलता को पर्याप्त रूप से सराहा नहीं जाता है. शिकायतें ही की जाती हैं, हालांकि 20 साल बाद अब ये शिकायतें अपनी झोली भरने की कोशिश के सिवा और कुछ नहीं है. चाहे पूरब में हो या पश्चिम में. किसे उम्मीद थी कि पश्चिम और पूरब की दो परस्परविरोधी सामाजिक प्रणालियां दो दशकों के अंदर पूरे तौर पर घुलमिल जाएंगी? आज जो लोग मांग करते हैं कि 20 साल बाद पूरब और पश्चिम के बीच कोई फर्क नहीं रहना चाहिए, उन्हें ऐतिहासिक रूप से अनोखी इस प्रक्रिया के आयाम की कोई समझ ही नहीं है.

Deutsche Welle Chefredakteur Marc Koch neu

डॉयचे वेले के मुख्य संपादक मार्क कॉख

प्रयोग के लिए वक्त नहीं

यह सच है कि दीवार के गिरने और एकीकरण के दिन के बीच अनेक गलतियां हुई थीं, अक्सर परिस्थिति का गलत मूल्यांकन किया गया था. लेकिन एक बात तय है: एकीकरण के वास्तुकारों के पास प्रयोग के लिए समय नहीं था, दोनों जर्मन देशों को धीरे धीरे नजदीक लाने के लिए समय नहीं था. तेजी से बदल चुकी विश्वव्यवस्था के दौर में एक अनोखे ऐतिहासिक मौके का फायदा उठाना था, और ऐसा ही उन्होंने किया. जाहिर है कि 1990 में तत्कालीन चांसलर हेलमुट का वादा कि कुछ ही सालों में किफायत के साथ एकीकरण हासिल कर लिया जाएगा, जल्दबाजी में किया गया एक वादा था. आज भी उनके इन लफ्जों का हवाला दिया जाता है, लेकिन इनसे चांसलर कोल व जर्मन एकीकरण के दूसरे वास्तुकारों की भूमिका को घटाकर पेश नहीं किया जा सकता.

देश के एकीकरण से जर्मनी को हर हिसाब से फायदा हुआ है. यह भी कोई कम बात नहीं कि पिछले 20 सालों में यह देश कहीं ज्यादा उन्मुक्त, रंगीन, जीवंत और बिंदास बना है. सामाजिक विवादों से झेंपने के बदले उनका सामना किया जा रहा है. आंख मूदकर जवाब ढूंढने के बदले खुली आंखों के साथ सवालों का सामना किया जाता है, चारों ओर नजर फेरी जाती है. यूरोप के बीचोबीच जर्मनी एक प्रयोगशाला है, जिसे लगातार परिवर्तनों, चुनौतियों और नई बातों से रूबरू होना पड़ रहा है. यह भी एकीकरण का एक नतीजा है. आंकड़ों से यह कहीं परे तक है.

समीक्षा: मार्क कॉख, मुख्य संपादक, डॉयचे वेले (उज्ज्वल भट्टाचार्य)

संपादन: महेश झा

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