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ब्लॉग

जर्मन एकीकरण के 24 साल

जर्मनी एकीकरण के 24 साल पूरे हो गए हैं. इन सालों में जर्मनी बहुत बदला है. डॉयचे वेले के ग्रैहम लूकस का कहना है कि जर्मनी अपनी उपलब्धियों पर नाज कर सकता है

मुझे विश्वास नहीं होता कि जर्मनी को एक हुए 24 साल बीत गए. समय कितनी तेजी से बीतता है और बदलाव अभूतपूर्व रहे हैं. पूर्वी जर्मनी में शुरू हुई शांतिपूर्ण क्रांति ने एकीकृत जर्मनी को लोकतांत्रिक राज्य की चमकती मिसाल बना दिया है. जर्मनी दुनिया का सबसे अहम निर्यातक नहीं रह गया है, लेकिन यूरोप की सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्था है. यह जर्मनी के स्थायित्व और उसकी सफलता की कुंजी है.

2008 के बैंकिंग संकट के बाद जर्मनी ने यूरो को स्थिर करने में मुख्य भूमिका निभाई. विदेशनीति में जर्मनी सुलह वाली भूमिका निभा रहा है, एशिया में भी. उसके राजनयिकों ने अलग थलग पड़े नरेंद्र मोदी को अंतरराष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने का प्रयास करने की पहल की थी. चीन एक चुनौती है जहां जर्मनी कारोबार और मानवाधिकारों में संतुलन की कोशिश कर रहा है. वह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अपनी प्रतिबद्धता को संयुक्त राष्ट्र के सुधारों में देखना चाहता है. वह सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनना चाहता है. यह सब 24 साल पहले सोचा भी नहीं जा सकता था.

घरेलू मोर्चे पर भी जर्मनी बहुत बदल गया है. राजनीतिक व्यवस्था में बिखराव है. पुराने जमाने की तीन या चार पार्टियों वाली व्यवस्था की जगह लेफ्ट, ग्रीन और यूरो विरोधी एएफडी जैसी पार्टियां भी शामिल हो गई हैं. लेकिन जर्मन सरकार सीडीयू-सीएसयू और एसपीडी के गठबंधनों की बदौलत मध्यमार्गी और स्थिर रही है. साम्यवादी पूर्वी जर्मनी और उसकी पौने दो करोड़ की आबादी का समेकन प्रमुख उपलब्धि रही है. पूरब और पश्चिम का विभाजन धीरे धीरे मिट रहा है, हालांकि पूर्वी हिस्से में आर्थिक समस्याएं बनी हुई हैं.

देश में दूरगामी सामाजिक बदलाव हुआ है. जर्मनी में विदेशियों की बढ़ती तादाद ने देश का चेहरा बदल दिया है. 2008 से यह अमेरिका के बाद स्थायी आप्रवासन के लिए दुनिया का दूसरा सबसे लोकप्रिय ठिकाना बन गया है. 2012 में यहां 400,000 प्रशिक्षित विदेशी रहने के लिए आए. इससे जन्मदर में भारी कमी का सामना करने में मदद मिली है. नतीजे में जर्मनी बहु-सांस्कृतिक देश बन गया है. सवा 8 करोड़ की आबादी में डेढ़ करोड़ लोग विदेशी मूल के हैं और उनमें से बहुत मुस्लिम हैं.

विदेशी मूल के जर्मन सालों से देश के आर्थिक विकास में योगदान दे रहे हैं लेकिन अब धीरे धीरे उनका प्रभाव बढ़ रहा है. इसका एक उदाहरण ग्रीन पार्टी के अध्यक्ष चेम ओएजदेमिर हैं जो खुद तुर्क मूल के हैं जबकि उनकी पत्नी ब्राजील की हैं. देश के प्रमुख पदों पर तुर्क मूल के राजनीतिज्ञ हैं. पिछली संसद में भारतीय मूल के तीन सांसद थे. अब फलीस्तीन में जन्मे युवा राजनीतिज्ञ रायद सालेह सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी की ओर से बर्लिन का गवर्निंग मेयर बनने की रेस में हैं. ये अहम नहीं कि वे जीतते हैं या हारते हैं. बीस साल पहले शरणार्थी गृहों पर हमले के कारण सुर्खियों में आने वाले जर्मनी में बहुत कुछ बदल चुका है.

निश्चित तौर पर समस्याएं हैं. धीमे आर्थिक विकास के कारण सामाजिक कल्याण व्यवस्था चरमरा रही है. बच्चों में गरीबी चिंताजनक है. लोग ज्यादा जी रहे हैं जिसका असर पेंशन सिस्टम पर पड़ रहा है और शिक्षा व्यवस्था प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए संघर्ष कर रही है. देश का भविष्य सुरक्षित करने के लिए ज्यादा निवेश किए जाने की जरूरत है. यदि जर्मन सेना को अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों में हिस्सा लेना है तो उसका भी आधुनिकीकरण करने की जरूरत है.

जर्मन एकीकरण की 24वीं वर्षगांठ के मौके पर सबसे चिंताजनक बात इस्लामी कट्टरपंथ का बढ़ना है. घरेलू खुफिया सेवा के अनुसार सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट के साथ लड़ने के लिए गए लोगों की संख्या 500 से ज्यादा है. वापस लौटने के बाद उनसे पैदा होने वाले खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. देश के लोगों में कट्टरपंथ की प्रवृति को रोकने के लिए बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है.

जर्मनी की सफलता दिखाती है कि वह एकीकरण के 24 साल बाद सही रास्ते पर है और वह अपनी उपलब्धियों पर नाज कर सकता है, भले ही बहुत सी चुनौतियां बाकी हों.

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