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दुनिया

जर्मन अदालत पहुंचे तुर्क पत्रकार

आतंकवाद से जुड़े एक जर्मन मुकदमे ने राजनीतिक रूप ले लिया है. जिस आतंकी हमले में आठ तुर्क मारे गए थे, उसकी रिपोर्टिंग के लिए तुर्की मीडिया को अदालत में जगह नहीं मिली. तुर्क पत्रकार फैसले को चुनौती देने का मन बना रहे हैं.

तुर्की के विदेश मंत्री एहमत दावुतोग्लू मे जर्मन विदेश मंत्री गीडो वेस्टरवेले को फोन किया और मांग की कि संदिग्ध नवनाजी आतंकी बैआटे चैपे के खिलाफ मुकदमे में तुर्क पत्रकारों और नेताओं को भी सीटें मिलें. जर्मनी ने तुर्की की मांग को गंभीरता से लिया है लेकिन साथ ही अदालतों की स्वतंत्रता का भी ध्यान दिलाया है. इस आतंकी हमले में दस लोग मारे गए थे, जिनमें से आठ तुर्क मूल के थे.

तुर्की अखबार सबाह ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का एलान किया है. अखबार के डिप्टी एडिटर इस्माइल एरेल का कहना है, "हम समझते हैं कि प्रेस और सूचना की आजादी जर्मनी के तुर्क भाषी पत्रकारों के लिए भी है और इसलिए हम इस मुकदमे की कार्यवाही में हिस्सा लेना चाहते हैं."

दुनिया के ज्यादातर देशों की तरह जर्मनी में अदालतें स्वतंत्र हैं. इसकी वजह संविधान में अधिकारों का बंटवारा है. इसके अनुसार न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका, जिसमें पुलिस भी शामिल है, एक दूसरे से स्वतंत्र हैं. बर्लिन के राजनीतिशास्त्री हायो फुंके कहते हैं, "अदालत की स्वतंत्रता बहुत मूल्यवान है. कानूनसम्मत राज्य की मूल्यवान चीज, और उस पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए." लेकिन म्यूनिख की अदालत को सीटों के बंटवारे में नरमी दिखाने की जरूरत है. फुंके कहते हैं, "ऐसा वह कर सकता है, लेकिन स्वतंत्र रूप से."

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अदालत का कमरा

नहीं मिली तुर्क प्रेस को सीटें

अदालत में आम लोगों के लिए 100 सीटें हैं, उनमें से अदालत ने 50 सीटें मीडिया को दी हैं. पहले आओ, पहले पाओ के हिसाब से. अदालत का कहना है कि पहले आवेदन देने वाले 50 मीडिया प्रतिनिधियों को सीटें दी गई हैं, बाकी प्रतीक्षा सूची में हैं. जर्मनी के सर्वोच्च न्यायालय के रिटायर्ड जस्टिस वोल्फगांग हॉफमन रीम का कहना है कि एक विकल्प यह हो सकता था कि कुछ सीटों को तुर्की के मीडिया प्रतिनिधियों के लिए रिजर्व कर दिया जाता क्योंकि एनएसयू द्वारा मारे गए अधिकांश लोग तुर्क मूल के थे और इसकी वजह से तुर्क मीडिया की इस मुकदमे में काफी दिलचस्पी है.

ऐसी व्यवस्था पत्रकार योर्ग काखेलमन के मुकदमे में की गई थी, जो स्विट्जरलैंड के नागरिक हैं और मुकदमे में स्विस मीडिया की बड़ी दिलचस्पी थी. इस मुकदमे के शुरू होने से पहले ही स्विस पत्रकारों के लिए कुछ सीटें रिजर्व कर दी गई थीं.

विश्वसनीय हैं जर्मन अदालतें

सीटों के बंटवारे पर हुए विवाद के कारण तुर्की में जर्मन अदालतों की विश्वसनीयता पर संदेह उठ रहे हैं. लेकिन राजनीतिशास्त्री फुंके इसे बढ़ा चढ़ा हुआ मानते हैं. उनका कहना है कि नुकसान यह नहीं है कि अदालत स्वतंत्र नहीं है, इस बात के कोई संकेत नहीं हैं, "और मैं यह मानता हूं कि एनएसयू मामले में स्वतंत्र मुकदमा चलेगा."

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हाईकोर्ट के प्रमुख कार्ल हूबर

जर्मन संसद के निचले सदन बुंडेसटाग के विदेश नीति आयोग के प्रमुख और सीडीयू सांसद रूपरेष्ट पोलेंस का भी यही मानना है. वे कहते हैं कि जर्मन न्याय व्यवस्था में उनका भरोसा है और यह उन्होंने तुर्की से भी कहा है. उन्होंने तुर्की से संयम बरतने की अपील की है. उनका भी कहना है कि सीटों का बंटवारे में चतुराई नहीं दिखाई गई है, लेकिन वे कहते हैं, "उससे यह नतीजा निकालना कि पूरा मुकदमा निष्पक्ष और कानूनसम्मत नहीं है, उचित नहीं होगा." पोलेंस का कहना है कि तुर्की को जर्मन कानूनी व्यवस्था और जर्मन अदालतों पर भरोसा करना चाहिए.

जनमत का दबाव

जर्मन विदेश मंत्री को तुर्की के विदेश मंत्री के फोन से पहले ही जर्मनी की विदेशी मामलों की मंत्री मारिया बोएमर ने इस मामले में कहा था, "इस मामले में पूरी दुनिया जर्मनी की ओर देख रही है." उनका कहना है कि हत्याकांड में मारे गए लोगों और उनके परिजनों के सम्मान में और भरोसा दोबारा जीतने के लिए वे इसे जरूरी मानती हैं कि तुर्की और ग्रीस के मीडिया प्रतिनिधियों पर सीटों के बंटवारे में ध्यान दिया जाए. उन्होंने अदालत से विवादास्पद फैसले पर दोबारा विचार करने की अपील की.

म्यूनिख की अदालत के जजों पर जर्मन और तुर्क जनमत का दबाव बढ़ रहा है. फुंके इस बात का स्वागत करते हैं कि यहां विवेकपूर्ण जनमत है और वे उसके अप्रत्यक्ष प्रभाव से इनकार नहीं करते. "लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस वजह से अदालत स्वतंत्र नहीं है." उनका कहना है कि यह मुकदमे की प्रक्रिया पर कोई प्रभाव नहीं है, बल्कि उससे जुड़े सार्वजनिक ढांचे पर."

उग्र दक्षिणपंथी संगठन एनएसयू (नेशनल सोशलिस्ट अंडरग्राउंड) के संदिग्ध आतंकियों और समर्थकों पर मुकदमा म्यूनिख की अदालत में 17 अप्रैल को शुरू होगा.

रिपोर्ट: आन्या फैनले/एमजे

संपादनः ए जमाल

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