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दुनिया

जर्मनों से ज्यादा प्रशिक्षित है नए आप्रवासी

जर्मनी में बसने आने वाले विदेशियों की योग्यता बढ़ती जा रही है. खासकर एशिया और पूर्वी यूरोप से उच्च प्रशिक्षित लोग जर्मनी आ रहे हैं. विशेषज्ञ इसे सबके लिए लाभकारी बता रहे हैं और जर्मनी में आप्रवासियों की छवि बदल रही है.

बहुत से जर्मनों के मन में आप्रवासियों की अभी भी गलत छवि है. वे दिन बीत गए जब अकुशल मजदूर काम करने जर्मनी आते थे. आज जर्मनी दुनिया की सर्वोत्तम प्रतिभाओं को आकर्षित कर रहा है. एक प्रमुख शोध संस्था बेर्टेल्समन फाउंडेशन का कहना है कि यह सबके लिए फायदेमंद है.

शूओ चेन का गांव चीन के प्रमुख शहर शंघाई से दो घंटे की दूरी पर है. उन्हें अच्छी शिक्षा मुहैया कराने के लिए परिवार ने उन्हें छह साल की उम्र में शंघाई में रिश्तेदार के पास भेजने का फैसला लिया. 19 साल की उम्र में शूओ ने एक और छलांग लगाने का फैसला किया और गगनचुम्बी इमारतों वाले शहर को छोड़कर जर्मनी के वोर्म्स में अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने चले आए. आज 35 वर्षीय शूओ एक जर्मन मशीन टूल्स कंपनी में सीनियर मैनेजर हैं. सफलता की कहानी जो विशेषज्ञों की राय में अब कोई अपवाद नहीं है.

खासकर चीन का संभ्रांत वर्ग अपने बच्चों को आईटी, बिजनेस मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए जर्मनी भेज रहा है. रिक्रूटमेंट कंपनी पर्सोनालग्लोबाल के टोबियास बुश बताते हैं, "ये ऐसे चुनिंदा लोग हैं जो बहुत सारी शक्ति, ऊर्जा और इच्छाशक्ति लेकर आते हैं." राजनीतिक नेतृत्व वाले परिवारों के समृद्ध बच्चे इंगलैंड या अमेरिका की अच्छी यूनिवर्सिटियों में पढ़ाई करने जाते हैं जबकि कम साधनों वाले परिवारों के बच्चे किफायती पढ़ाई के लिए जर्मनी आते हैं. इस समय जर्मनी में 20,000 से 30,000 छात्र या पढ़ाई पूरी कर चुके लोग रहते हैं. बुश कहते हैं, "आप्रवासन में चीन ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है."

बढ़ती तादाद

पहले की ही तरह जर्मनी में यह धारणा है कि आप्रवासी कम पढ़े लिखे लोग होते हैं, जबकि यह सही नहीं है. यह कहना है कि श्रम बाजार पर शोध करने वाले हैर्बर्ट ब्रुकनर का, जिन्होंने बेर्टेल्समन फाउंडेशन के लिए आप्रवासन पर रिपोर्ट लिखी है. इस रिपोर्ट के अनुसार इस समय आने वाले 15 से 65 साल के नए आप्रवासियों के 43 प्रतिशत को मास्टर, यूनिवर्सिटी या तकनीक की शिक्षा मिली हुई है.यह संख्या साल 2000 की संख्या से दोगुनी है. बिना विदेशी मूल वाले जर्मनों में सिर्फ 26 प्रतिशत के पास मास्टर, यूनिवर्सिटी या तकनीकी शिक्षा है. इसी तरह कम प्रशिक्षित विदेशियों की तादाद भी 40 प्रतिशत से गिरकर सिर्फ 25 प्रतिशत रह गई है.

चीनियों के अलावा मुख्य रूप से यूरोपीय संघ के नए सदस्य देशों से लोग रहने और काम करने के लिए जर्मनी आ रहे हैं. ब्रुकर बताते हैं, "आप्रवासन की वजह मुख्य रूप से यूरो संकट है." पहले लोग स्पेन, इटली, ब्रिटेन या आयरलैंड जाते थे, लेकिन बेरोजगारी की वजह से ये मुल्क उतने आकर्षक नहीं रह गए हैं. जर्मन सांख्यिकी कार्यलय के अनुसार पिछले साल जितने लोग जर्मनी छोड़कर गए उनसे कुल 370,000 ज्यादा लोग जर्मनी में बसने के लिए आए. 1995 के बाद से यह सबसे ऊंची संख्या है.

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नौकरशाही बाधाएं

इस समय हालत भले ही जर्मनी के लिए बहुत अनुकूल हो, बेर्टेल्समन फाउंडेशन के योर्ग ड्रेगर का कहना है कि यूरो संकट के खत्म होने के साथ ही आप्रवासियों की संख्या फिर से घट सकती है, हालांकि जन्मदर में लगातार जारी कमी के कारण जर्मनी कुशल आप्रवासियों पर निर्भर है. "हमारे यहां कुशल कामगारों की कमी है, हमारी आबादी घट रही है और यदि लगातार कम युवा लोगों को ज्यादा वृद्ध लोगों की मदद करनी होगी तो हमारी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था डगमगा जाएगी."

इसलिए बेर्टेल्समन फाउंडेशन नई आप्रवासन नीति की वकालत कर रहा है. फाउंडेशन कामगारों की कमी वाले पेशों में आप्रवासियों के लिए ग्रीन कार्ड की तर्ज पर एक स्याह-लाल-पीले कार्ड की मांग कर रहा है, जो लोगों को बिनी किसी समय सीमा के रहने और काम करने का परमिट दे. फाउंडेशन का कहना है कि इस तरह से बेहतरीन प्रतिभाओं को जर्मनी आने के लिए लुभाया जा सकता है. श्रम बाजार विशेषज्ञ ब्रुकर का कहना है, "जर्मनी सचमुच अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया से प्रतिस्पर्धा में है."

ब्रुकर कहते हैं कि इसके लिए सिर्फ कानूनी बदलावों की जरूरत नहीं है, क्योंकि पिछले सालों में बहुत कुछ हुआ है, इसके लिए एक रणनीति बनाने की जरूरत है. इसमें विदेशी डिग्रियों की मान्यता भी शामिल है. हालांकि 2012 से जर्मनी में विदेशी डिग्रियों की मान्यता पर नया कानून लागू हो गया है, लेकिन नौकरशाही बाधाएं बनी हुई हैं. "सबसे बड़ी समस्या यह है कि यूरोप में एकदम अलग अलग शिक्षा व्यवस्था है." अधिकांश देशों में जर्मनी जैसी दोहरी शिक्षा व्यवस्था नहीं है, जहां पेशेवर प्रशिक्षण स्कूलों के बदले सीधे उद्यमों में होता है.

ब्रेन ड्रेन का फायदा

पश्चिमी यूरोप के कई देश कुशल कामगारों की समस्या का सामना कर रहे हैं. दूसरे देशों के प्रशिक्षित युवाओं को लुभाना एक तरह से ब्रेन ड्रेन जैसा है. आखिरकार कुशल कामगारों के पलायन का सामना कर रहे देश स्थिति से कैसे निबट रहे हैं? सालों पहले विशेषज्ञों ने ब्रेन ड्रेन के खिलाफ चेतावनी दी थी, क्योंकि उच्च प्रशिक्षित लोगों के पलायन का नुकसान उन देशों की अर्थव्यवस्था को होता है, जो उनके प्रशिक्षण पर खर्च तो करते हैं, लेकिन उसका फायदा नहीं उठा पाते.

लेकिन श्रम बाजार के विशेषज्ञ ब्रुकर इस चिंता को नकारते हैं और कहते हैं कि जर्मनी में होने वाले आप्रवासन का फायदा उन देशों को भी मिलता है, जहां से लोग जर्मनी आ रहे हैं. "उच्च प्रशिक्षित लोगों के देश छोड़ने से वहां बेरोजगारी घटती है. इसकी वजह से सरकार और अर्थव्यवस्था को फायदा होता है, क्योंकि प्रति व्यक्ति खर्च में कमी आती है."

रिपोर्ट: श्टेफानी होएपनर/एमजे

संपादन: मानसी गोपालकृष्णन

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