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दुनिया

जर्मनों की लोकप्रियता का रहस्य

जर्मनी एक स्थिर लोकतंत्र है, लेकिन यहां के लोगों के विचार बदलते रहते हैं. कभी रूस के साथ सहानुभूति तो कभी अमेरिका की आलोचना. डॉयचे वेले के मुख्य संपादक अलेक्जांडर कुदाशेफ को आश्चर्य है कि वे दुनिया भर में लोकप्रिय हैं.

जर्मन लोग ऐतिहासिक भूलों और गलतियों के बाद आखिरकार पश्चिम में जगह बनाने में कामयाब रहे हैं. एक नामी इतिहासकार ने ऐसा पाया है. सच भी है. जर्मनों की भावना पश्चिमी है, कुछ का तो दक्षिणी भी कहना है. इस बीच जर्मनों को गर्मी और सूरज पसंद है. लेकिन राजनीति में वे दक्षिण के नहीं, बल्कि ढुलमुल हैं. असुरक्षित.

रूस की समझ

स्वाभाविक रूप से वे पुतिन के आचरण को गलत मानते हैं, लेकिन पूरी तरह नहीं. स्वाभाविक रूप से वे क्रीमिया के अधिग्रहण को गलत मानते हैं. लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं. वे क्रेमलिन के खिलाफ प्रतिबंधों में साझेदार हैं, लेकिन संकोच और चिंता के साथ. उनका कहना है कि रूस का पतन नहीं होना चाहिए और इसके साथ खुद अपने प्रतिबंधों पर संदेह व्यक्त किया जा रहा है. लेकिन सबसे बढ़ कर जर्मनों इस बात के लिए बहुत समझ है कि पुतिन यूक्रेन में अपने हितों को नव साम्राज्यवादी तरीके से मना रहे हैं. यह रूसी इतिहास और संस्कृति का समझ में आनेवाला कर्तव्य है. जर्मनों का बहुमत, स्वाभाविक रूप से सारे नहीं, रूस को समझने वाला है.

जर्मनी का इस्राएल के साथ खास रिश्ता है. यह सब समझते हैं. लगेगा कि 60 लाख यूरोपीय यहूदियों की हत्या बिना किसी सवाल के कर्तव्य देते हैं. लेकिन यदि गजा युद्ध पर "सामान्य" जर्मनों की टिप्पणी पर नजर डालें तो पता चलता है कि जर्मन ऐसा नहीं समझते हैं. इस मामले में सामान्यता और सामान्य होना केंद्रीय तत्व नहीं हैं, जैसा कि माना जा सकता था. नहीं, जर्मनों का फलीस्तीनियों के साथ विशेष संबंध है और हमास के साथ भी, जो खुले आम इस्राएल के खात्मे का आह्वान करता है. और इस्राएल के साथ खास आलोचनात्मक रिश्ता. इसके लिए इस्राएलक्रिटीक शब्द का इस्तेमाल होता है कि इस्राएल की आलोचना संभव होनी चाहिए. सरकार और विपक्ष का बड़ा हिस्सा अपनी नीतियों पर अडिग है, उन्हें पता है कि जर्मनी को किसका समर्थन करना चाहिए.

अमेरिका के आलोचक

जर्मनों को नाराज होना पसंद है, दूसरों पर. खास कर अमेरिका पर. ज्यादातर उन्हीं की गलती होती है, या तो कुछ करने के लिए या कुछ नहीं करने के लिए. इस मामले में जर्मन गलत नहीं हो सकते क्योंकि ज्यादातर लोग यही करते हैं, वामपंथी से लेकर दक्षिणपंथी तक. स्वाभाविक रूप से जर्मन अमेरिका विरोधी नहीं है, वे तो पश्चिम में जगह बनाने में कामयाब रहे हैं. लेकिन अंकल सैम के खिलाफ नैतिक अंगुली लगातार उठी रहती है. समाज हो या राजनीति और अर्थव्यवस्था, कवियों और दार्शनिकों के देश की जनता का इस अमेरिकन वे ऑफ लाइफ से ज्यादा लेना देना नहीं. उसे अपने रास्ते की तलाश है? पश्चिम में - या बीच में स्थित यूरोपीय साम्राज्य में? ढुलमुल रहते?

जर्मनी कारीगरों, आविष्कारकों, इंजीनियरों का देश है. उन्हें सम्मति पसंद है. इस समय वाम मुख्यधारा में, क्योंकि अनुदारवादी रुख से मुश्किल होती है, वे ज्यादा प्रचलित भी नहीं हैं. वे सामाजिक न्याय को आजादी से अहम मानते हैं. उन्हें एक हरे भरे स्विट्जरलैंड में रहना पसंद है, यानि द्वीप पर. विदेशों में ज्यादा सक्रिय होने की सरकार की अपील उन्हें पसंद है, जब तक मामला गंभीर न हो जाए. उन्हें खतरे में पड़े लोगों की सुरक्षा से ज्यादा पर्यावरण सुरक्षा और मेढकों के आने जाने के और रास्ते पसंद है. हैरानी की बात है कि विदेशों में जर्मनी खास तौर पर लोकप्रिय देश है. दरअसल सबसे लोकप्रिय. कम से कम यह अंग्रेजों का कहना है जो पहले हमें नहीं चाहते थे, लेकिन अब तारीफ करते अघाते नहीं. आखिर क्यों?

अलेक्जांडर कुदाशेफ/एमजे

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