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दुनिया

जर्मनी में सांसद के भत्तों पर विवाद

जन प्रतिनिधियों की तनख्वाह पर हर जगह हंगामा होता है. चाहे भारत का उत्तर प्रदेश हो जहां विधायकों की तनख्वाह बढ़ाने की मांग हो रही है या जर्मनी जहां सांसदों का भत्ता बढ़ाने के बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी में देर हो रही है.

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जर्मन संसद बुंडेसटाग

पहली जुलाई से जर्मन सांसदों का वेतन बढ़ना था, लेकिन राष्ट्रपति योआखिम गाउक ने इस बिल पर हस्ताक्षर नहीं किया है. राष्ट्रपति बिल की संवैधानिकता की जांच करा रहे हैं. शनिवार को राष्ट्रपति कार्यालय की एक प्रवक्ता ने कहा, "यह एक जटिल प्रक्रिया है, जिसके लिए गहन जांच की जरूरत है." सत्ता पक्ष के भारी बहुमत से पास इस बिल का विपक्ष ने विरोध किया था. विपक्षी ग्रीन पार्टी और वामपंथी डी लिंके ने इस बात का स्वागत किया है कि राष्ट्रपति बिल की गंभीरता से जांच करा रहे हैं.

जर्मनी के 631 सांसदों को हर महीने 8252 यूरो मासिक भत्ता मिलता है. जुलाई से इसे बढ़ा कर 8667 और अगले साल की जनवरी से 9082 यूरो करने का प्रस्ताव है. उसके बाद सांसदों का वेतन सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतनवृद्धि के अनुपात में बढ़ेगा. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार राष्ट्रपति कार्यालय के कानूनी अधिकारियों को इस प्रावधान की संवैधानिकता पर संदेह है कि 2016 से भत्ता सरकारी कर्मचारियों की वेतन वृद्धि के साथ जोड़ दिया जाएगा. राष्ट्रपति इस बिल पर संवैधानिक अदालत की जांच की शर्त पर हस्ताक्षर कर सकते हैं.

Joachim Gauck Rede zum Flüchtlingsschutz 30.06.2014 in Berlin

राष्ट्रपति योआखिम गाउक

दो चरणों में करीब 10 फीसदी की वृद्धि के बाद सांसदों का मासिक भत्ता संघीय न्यायाधीशों के वेतन के बराबर हो जाएगा. हर साल सरकारी अधिकारियों की वेतन वृद्धि के साथ सांसदों के भत्ते में वृद्धि से इस पर नियमित रूप से होने वाली सार्वजनिक बहस से बचा जा सकेगा जो आम तौर पर इसके खिलाफ होते हैं. सांसदों के वेतन भत्ते में वृद्धि जर्मनी में भी कोई लोकप्रिय मुद्दा नहीं है. हालांकि भत्ते में इस वृद्धि के साथ पेंशन में मिलने वाली राशि में कटौतियां भी की गई हैं. भविष्य में सांसदों को 63 साल का हो जाने के बाद ही पेंशन मिलेगा और वह भी कटौतियों के साथ. पेंशन पाने के लिए आम लोगों को 67 की उम्र तक काम करना पड़ता है. इस समय सांसदों को सदस्य नहीं रहने पर 57 की उम्र से ही पूरा पेंशन मिलने लगता है.

भारत के उत्तर प्रदेश में 271 करोड़पतियों वाली विधानसभा में विधायक महंगाई और मुद्रास्फीति का हवाला देकर वेतन बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. इस समय उत्तर प्रदेश के विधायकों को महीने में 50,000 रुपये मिलते हैं, जिसमें 8,000 रुपये वेतन, 22,000 कंस्टीचुएंसी भत्ता, 10,000 रुपये सचिव भत्ता और 10,000 चिकित्सा भत्ता मिलता है. इसके अलावा उन्हें 6,000 रुपये टेलीफोन भत्ता भी मिलता है. वे साल में सवा लाख रुपये यात्रा पर खर्च कर सकते हैं. विपक्षी भारतीय जनता पार्टी की मांग है कि विधायकों को मुख्य सचिव से अधिक वेतन मिलना चाहिए क्योंकि प्रोटोकॉल में उनका दर्जा मुख्य सचिव से ऊपर है.

एमजे/एजेए (डीपीए)

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