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दुनिया

जर्मनी में शरणार्थियों से मारपीट

जर्मनी के एक शरणार्थी गृह के निवासियों के साथ वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों की मार पीट का मामला बढ़ता जा रहा है.. कई जगहों से ऐसी खबरें मिली हैं. शरणार्थी गृहों की निजी सुरक्षा कंपनियों को देने की आलोचना हो रही है.

एक बिस्तर पर बैठे हुए आदमी के कपड़ों पर उल्टी के दाग हैं. पीटने की धमकी देकर उसे जबरदस्ती लेटने को कहा जा रहा है. मोबाइल वीडियो का यह सीन करीब 15 सेकंड का है. दूसरा आदमी जमीन पर पड़ा हुआ है. उसके हाथ पीठ पर बंधे हुए हैं. यूनिफॉर्म पहने दो सुरक्षाकर्मी उसके पास खड़े हैं और एक का पैर गिरे हुए आदमी की गर्दन पर है.

रिपोर्टों के मुताबिक नीचे गिरा यह व्यक्ति 20 साल का अल्जीरियाई युवक है. ये फोटो और वीडियो नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया में शरणार्थियों के लिए बुरबाख शहर में बनाए आपात आवास में लिए गए हैं. सुरक्षा के लिए तैनात किए गए चार चौकीदारों ने शरणार्थियों के साथ दुर्व्यवहार किया और उन्हें अपमानित किया. इन में से दो के पास से प्रतिबंधित हथियार बरामद किए गए.

शरणार्थी गृहों की जांच

वेस्ट जर्मन रेडियो (डबल्यूडीआर) के मुताबिक एसेन शहर में भी दो सप्ताह तक सुरक्षाकर्मियों ने शरणार्थियों पर अत्याचार किया और उन्हें अपमानित किया. शारीरिक क्षति की दो रिपोर्टें यहां से दर्ज करवाई गईं. अब पुलिस और अभियोजन पक्ष चार संदिग्धों की जांच कर रहे हैं और निजी कंपनियों के प्रबंधन वाले शरणार्थी गृहों की भी. साथ ही पता लगाया जा रहा है कि और किन शहरों में इस तरह की घटनाएं हुई हैं.

मामला यहां तक पहुंचा कैसे. नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया राज्य में कारिटास और माल्टेसर जैसी सामाजिक कल्याण संस्थाओं के अलावा कुछ निजी कंपनियां भी इन विशेष आवासों की देख रेख करती हैं. इनके लिए आर्थिक मदद नगर पालिकाओं से भी मिलती है. बुरबाख के मामले में इस विशेष गृह की देख रेख करने वाली कंपनी यूरोपीयन होमकेयर थी. इनके हाथ में 17 में से छह ऐसे आवास हैं.

नगर पालिकाएं इन आवासों के लिए पूरा पैसा नहीं देती, बल्कि सस्ते में अपना काम करना चाहती हैं. इसलिए दूसरी कंपनियों को ठेका दिया जाता है, खासकर चौकीदारी या सुरक्षा मामलों में. अक्सर शरणार्थियों की सुरक्षा के लिए तैनात किए जाने वाले लोग किसी निजी कंपनी के होते हैं.

चिंताजनक घटनाक्रम

जर्मनी में आपराधिक मामलों के अधिकारी संघ के उप प्रमुख सेबास्टियान फीडलर नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया में जारी इस घटनाक्रम पर लंबे समय से नजर रखे हैं और इसे चिंताजनक मानते हैं. आतंरिक सुरक्षा के मामले में निजीकरण गुपचुप लेकिन तेजी बढ़ रहा है. डीडबल्यू के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि अब गुणवत्ता नहीं, बल्कि प्रतिघंटा मजदूरी के बारे में पहले विचार किया जाता है. बिना सीखे हुए कर्मचारी कुशल कामगारों की तुलना में सस्ते हैं. फीडलर कहते हैं, "समस्या यह है कि अक्सर नहीं देखा जाता कि व्यक्ति की गुणवत्ता क्या है और वह किस पृष्ठभूमि से आया है. बुरबाख के मामले में तो सुरक्षाकर्मी कट्टर दंक्षिणपंथियों वाली पृष्ठभूमि से था."

डबल्यूडीआर रेडियो की रिपोर्टों के मुताबिक चार में से दो को पुलिस पहले से पहचानती है. इन्हें पहले मादक द्रव्यों के कानून का हनन करने और शारीरिक क्षति पहुंचाने के मामले में पकड़ा गया था. सेबास्टियान फीडलर इसलिए जिम्मेदार ऑफिस की आलोचना करते हैं, "सबसे बुरी बात यह है कि इसमें वह परेशान हो रहे हैं जो पहले से ही न जाने कितने अत्याचार और पीड़ा से गुजर चुके हैं. वह जर्मनी आए कि उन्हें सुरक्षा और शरण मिले. और यहां जर्मनी उन्हें सुरक्षा मुहैया करवाने में समर्थ नहीं है. वह सिर्फ हर संभव जगह पर बचत कर रहा है और देख ही नहीं रहा कि वह किसे नौकरी पर रख रहा है." वैसे तो सुरक्षा की जिम्मेदारी भी नगर पालिकाओं की है. इसलिए पुलिसकर्मी संघ के प्रमुख राइनर वेन्ट ने टीवी इंटरव्यू में मांग की थी कि चौकीदारी और सुरक्षा का काम भी स्थानीय नियामक एजेंसियां ही संभालें. लेकिन धन की कमी के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा.

नए मानक

डबल्यूडीआर रेडियो रिपोर्ट के मुताबिक यूरोपीयन होमकेयर बहुत तेजी से विस्तार कर रही है क्योंकि इसमें कुशल कामगारों को नहीं लिया जा रहा. बिना ट्रेनिंग के लोगों को रखा जा रहा है और इससे फायदा कमाया जा रहा है. डबल्यूडीआर के लिए काम करने वाले रिपोर्टरों को अपनी जांच के दौरान कोई मनोचिकित्सिक या सामाजिक कार्यकर्ता नहीं मिला. जबकि शरणार्थी गृहों के लिए यह नियम हैं.

यूरोपीयन होमकेयर का कहना है कि तेजी से बढ़ने वाले शरणार्थियों के कारण उच्च स्तर बनाए रखना संभव नहीं है. कंपनी की प्रवक्ता ने जेडडीएफ को दिए टीवी इंटरव्यू में कहा कि नए मानकों को स्वीकार कर लिया गया है ताकि इस तरह की घटनाएं फिर नहीं हों. बुरबाख के लिए जिम्मेदार आर्न्सबैर्ग जिला प्रशासन ने तय किया है अब से कड़ी जांच के बाद ही सुरक्षाकर्मियों को रखा जाएगा और सभी कंपनियों को काम करने वालों को एक न्यूनतम तनख्वाह देनी होगी.

रिपोर्टः सबीने पाब्स्ट/एएम

संपादनः ईशा भाटिया

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