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दुनिया

जर्मनी में शरणार्थियों की संख्या सीमित करने पर छिड़ी बहस

जर्मनी की रुढ़िवादी सीडीयू/सीएसयू पार्टियां देश में आने वाली शरणार्थियों की संख्या को सीमित करने पर सहमत हो गयी हैं. कुछ लोग इसे असंवैधानिक बता रहे हैं तो कुछ की राय में यह वैध है, लेकिन इसे लेकर कई सवाल उठ रहे हैं.

सीडीयू की नेता और चांसलर अंगेला मैर्केल और उनकी बवेरियन सहयोगी पार्टी सीएसयू के नेता होर्स्ट जेहोफर ने सोमावार को एक नीतिगत सुझाव पेश किया जिस पर लगभग दो साल से बात हो रही है. दोनों पार्टियां इस बात पर सहमत हो गयी हैं कि जर्मनी में आने वाले शरणार्थियों से किस तरह निपटा जाए.

आम चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए ग्रीन पार्टी और उदारवादी एफडीपी से बात शुरू करने से पहले दोनों पार्टियों के बीच इस सहमति का मकसद एकजुटता पेश करना है. सीडीयू और सीएसयू ऐसे दिशानिर्देश चाहती हैं जिनके मुताबिक मानवीय आधार पर जर्मनी में एक साल के भीतर दो लाख से ज्यादा लोगों को ना लिए जाए. जोहोफर ने कहा है कि इस संख्या में शरण के लिए आवेदन करने वाले, जिनेवा समझौते के तहत शरणार्थी के रूप में परिभाषित लोग और अपने परिवार के साथ रहने के लिए जर्मनी में आने वाले लोग, सभी शामिल हैं. लेकिन दो लाख की इस सीमा में उच्च दक्षता प्राप्त कामगार शामिल नहीं हैं.

सीएसयू ने धमकी दी थी कि शरणार्थियों की मुद्दे पर वह कोई समझौता नहीं करेगी. हालांकि सीडीयू-सीएसयू दोनों ने अब भी "प्रवासियों की सीमा" शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है, जिसे लेकर बरसों से जर्मनी में गर्म बहस चल रही है. सीएसयू जहां इसके बिना सरकार में शामिल होने को तैयार नहीं है, वहीं ग्रीन पार्टी ऐसे किसी भी विचार को साफ तौर पर खारिज करती है.

लेकिन प्रवासियों की संख्या को सीमित करने के मुद्दे पर कई विशेषज्ञों की राय अलग है. जर्मनी की जारलैंड यूनिवर्सिटी में यूरोपीय और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रोफेसर थॉमस गीकेराइश कहते हैं, "हमारे यहां यूरोपीय संघ की साझा शरणार्थी नीति और नियम हैं जो बताते हैं कि शरणार्थी के तौर पर संरक्षण की चाह में आने वाले लोगों के साथ किस तरह का व्यवहार होना चाहिए." वह कहते हैं, "यूरोपीय संघ का कानून संरक्षण की तलाश में आने वाले लोगों की संख्या पर कोई सीमा नहीं लगाता. अगर कोई व्यक्ति गृह युद्ध झेल रहे देश से भागकर आता है और यह साफ है कि वह वहां वापस नहीं जा सकता, तो उसे संरक्षण पाने का अधिकार है और उसे वापस नहीं लौटाया जाना चाहिए."

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इस तरह, किसी व्यक्ति को सिर्फ एक निर्धारित कोटे की वजह से युद्ध झेल ऐसे देश में वापस भेजना, जहां उसकी जान खतरे में हो, यह यूरोपीय संघ के कानून का उल्लंघन होगा. लेकिन सीडीयू और सीएसयू पार्टियों ने जो समझौता सोमवार को पेश किया, उसे कुछ इस तरह से तैयार किया गया है कि दोनों पार्टियां उस स्थिति को रोकना चाहती हैं जहां जर्मनी को प्रवासियों के लिए अपने दरवाजे बंद करने पड़ जाएं.

उन्होंने कहा है कि वे हर साल दो लाख शरणार्थियों की सीमा को "हासिल" करना चाहते हैं, लेकिन अगर कोई अभूतपूर्व स्थिति पैदा होती है तो फिर इस संख्या को बढ़ाया-घटाया जा सकता है.

शरणार्थियों के लिए सक्रिय संगठन प्रो असाइल की कानूनी सलाहकार मारेई पेल्सर कहती हैं, "किसी व्यक्ति के मानवाधिकारों के साथ एक कोटे की वजह से छेड़छाड़ नहीं हो सकती." उनका कहना है, "प्रवासी कामगारों से जुड़े कानूनों पर यह अलग तरह से लागू होता है. वहां सरकार निश्चित क्षेत्रों के मांग के मुताबिक आने वाले लोगों की संख्या को सीमित कर सकती है. लेकिन बात जब मानवाधिकारों की रक्षा करने की हो तो आपके पास यह विकल्प नहीं है."

पेल्सर मानती हैं किशरणार्थियों की संख्या को सीमित करने की योजना पर अगर जर्मनी की अगली सरकार अमल करती है तो फिर उसे अपने खिलाफ बड़ी कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहना होगा. उनके मुताबिक अगर शरणार्थियों को लेने से इनकार किया जाता है तो फिर वे जर्मन संविधान में शरण के बुनियादी अधिकार और मानवाधिकारों पर यूरोपीय संघ के नियमों का हवाला देंगे. पेल्सर कहती हैं, "बेशक वे मुकदमा कर सकते हैं."

लेकिन इससे पहले की हालात यहां तक पहुंचे, सीडीयू-सीएसयू को अपने संभावित गठबंधन साझीदारों को शरणार्थियों की संख्या सीमित करने वाले इस प्रस्ताव पर राजी करना होगा. फिलहाल इसकी संभावना कम ही दिखती है.

कार्ला ब्लाइकर

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