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दुनिया

जर्मनी में रेडियो के 90 साल

अक्सर दावे किए जाते हैं कि रेडियो के दिन अब खत्म हो चुके हैं, लेकिन यह हमेशा कोई नया रास्ता ढूंढ ही लेता है. चलते हैं आवाज की दुनिया के इतिहास की ओर..

"अटेंशन प्लीज, आप सुन रहे हैं 400 मीटर पर फॉक्स हाउस बर्लिन का प्रसारण. हम आपको बताना चाहते हैं कि आज से एंटरटेनमेंट रेडियो पर आप संगीत सुन सकते हैं." इस सूचना के साथ 29 अक्टूबर 1923 को एजी बर्लिन का प्रसारण शुरू हुआ, ठीक रात आठ बजे.

इस दिन जो संगीत कार्यक्रम प्रसारित किया गया उसे सुनने वाले लोग बहुत ही कम थे क्योंकि महंगे रेडियो जर्मनी में बेहद कम लोगों के पास थे. इसके अलावा खेल की रिपोर्टें भी प्रसारित की गईं. 1930 में अल्फ्रेड ब्राउन ने बर्लिन के स्टेडियम से इंग्लैंड और जर्मनी के फुटबॉल मैच की लाइव कमेंट्री भी की.

नाजियों का प्रचार

1931 में टेलीफुंकेन नाम की कंपनी का पेटेंट खत्म हो गया और फिर बहुत सारी कंपनियां रेडियो बनाने में लग गईं. इससे कीमत थोड़ी कम होने लगे. इस कारण फोल्क्सएंफेंगर नाम का एक रेडियो शुरू हुआ जो जल्द ही नाजी विचारधारा के प्रचार का साधन बन गया और इसका गलत इस्तेमाल होने लगा. विदेशी रेडियो चैनलों को सुनने पर दंड दिया जाने लगा.

Deutschland Geschichte Rundfunk Zwei Frauen und ein Junge hören Radio

पुराने दौर की बात

लोकतांत्रिक शुरुआत

युद्ध के बाद फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका ने तय किया कि सरकार से अलग सार्वजनिक नियंत्रण वाले प्रसारण की शुरुआत की जाए. ऐसी प्रसारण सेवा जिसके लिए शुल्क लिया जाए और जो विकेंद्रित हो. लोकतंत्र का प्रसार ही सबसे बड़ी प्राथमिकता थी. उस समय आदर्श बना बीबीसी.

युद्ध के बाद के सालों में सैन्य रेडियो के कारण अंग्रेजी भाषा के गाने जर्मनी पहुंचे. श्रोता खोने ना पड़ जाएं इसलिए जल्द ही जर्मन प्रसारकों ने भी यह संगीत अपने कार्यक्रम में शामिल किया.

कोलोन से किगाली

1953 में जर्मन रेडियो डॉयचे वेले के साथ जर्मनी की विदेश प्रसारण सेवा शुरू हुई. प्रसारण तेजी से आगे बढ़ा, कई भाषाएं इसमें जुड़ीं. दूर दराज के इलाकों में इसे सुना जाने लगा.

1975 में हाइन्स पेटेर फ्रीडरिष इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद डॉयचे वेले के कोलोन ऑफिस में आए. उन्होंने जल्द ही रुआंडा के किगाली में रिलेस्टेशन का काम संभाला. यहां जर्मनी से मिली रेडियो तरंगों को लिया जाता और उन्हें ताकतकवर बनाया जाता ताकि पूरे अफ्रीका में कार्यक्रम सुना जा सके.

Relaisstation Kigali

किगाली का रिले स्टेशन

बदलता माध्यम

धीरे धीरे रेडियो की जगह टीवी और इंटरनेट ने ले ली और दुनिया भर के सभी रेडियो को इन नए माध्यमों से चुनौती मिली. रेडियो को घरेलू कामों या कार चलाते समय सुना जाने लगा. स्ट्रीमिंग के कारण दुनिया भर के सभी देशों में रेडियो प्रोग्राम सुने जाने लगे. इसलिए ऐसे रेडियो प्रोग्राम जो पारंपरिक पुराने वेव पर कार्यक्रम प्रसारित करते उन्हें एक और नई चुनौती का सामना करना पड़ा.

बर्लिन की हुमबोल्ट यूनिवर्सिटी के मीडिया विशेषज्ञ वोल्फगांग मुइल बेनिंगहाउस कहते हैं कि इन चुनौतियों के बाद भी उन्हें ऐसा नहीं लगता कि पुराने फॉर्मेट वाला रेडियो खत्म हो जाएगा, "उपभोक्ता दो या तीन राष्ट्रीय प्रसारण से संतुष्ट नहीं होंगे." रेडियो सुना जाए, इसके लिए रेडियो कार्यक्रमों को और क्षेत्रीय होने की जरूरत है और लक्षित टारगेट पर ध्यान रखने की भी.

रिपोर्टः मार्कुस लुइटिके/एएम

संपादनः ईशा भाटिया

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