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दुनिया

जर्मनी में रहना है तो जर्मन बोलें

जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल की गठबंधन सरकार में शामिल बवेरिया की पार्टी सीएसयू के इस प्रस्ताव पर विवाद छिड़ गया है कि जो आप्रवासी जर्मनी में बसना चाहते हैं उन्हें घर पर भी जर्मन भाषा बोलनी होगी.

सीएसयू के इस प्रस्ताव की गठबंधन पार्टियों ने भी कड़ी आलोचना की हैं. सीडीयू प्रमुख और चांसलर अंगेला मैर्केल ने भी दो भाषाओं में परवरिश के फायदों पर जोर दिया है और कहा है कि अच्छी जर्मन जानना समाज में घुलने मिलने की निशानी है, "लेकिन इसमें भी कोई गल्ती नहीं है कि बच्चे दो भाषाओं में पले बढ़ें और उन्हें एक विदेशी भाषा कम सीखनी पड़े."

विवाद और आलोचना के बाद सीएसयू ने अपने प्रस्ताव को बदल दिया है. संशोधित प्रस्ताव में कहा गया है कि जो जर्मनी में स्थायी रूप से रहना चाहता है उसे रोजमर्रा में जर्मन बोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. इससे पहले अपने ड्राफ्ट में पार्टी ने कहा था, "वे लोग जो स्थायी तौर पर यहां रहना चाहते हैं उनका सार्वजनिक स्थलों और घर पर परिवार के साथ जर्मन भाषा में बात करना अनिवार्य होना चाहिए." यह ड्राफ्ट उस समय सामने आया है जबकि जर्मनी में आप्रवासियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है. आप्रवासियों में पूर्वी यूरोपीय देशों पोलैंड, रोमानिया और बुल्गारिया से आ रहे सदस्यों के अलावा बड़ी संख्या में सीरिया से आ रहे शरणार्थी भी शामिल हैं.

विरोधी प्रतिक्रियाएं

सीएसयू के कुछ सदस्यों को चिंता है कि अगर आप्रवासियों की संख्या में बढ़ोतरी होगी तो पार्टी के कुछ समर्थक विदेशी मूल के लोगों पर सख्त रवैया रखने वाली नई पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी की तरफ झुक सकते हैं. सीएसयू के इस ड्राफ्ट की चांसलर मैर्केल की गठबंधन सरकार की अन्य पार्टियों ने निंदा की है. विरोधियों में मैर्केल की पार्टी सीडीयू के एक उच्च अधिकारी भी शामिल हैं.

सीडीयू पार्टी के महासचिव पीटर टाउबर ने माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर कहा, "इससे राजनेताओं का कुछ लेना देना नहीं कि मैं घर पर लैटिन बोलता हूं, क्लिंगन या फिर हेसियन." सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी एसपीडी की महासचिव यासमीन फहीमी के मुताबिक यह प्रस्ताव "बिल्कुल बेतुका" है. फहीमी ने जर्मन अखबार बिल्ड से कहा, "यह तय करने में सरकार का कोई दखल नहीं है कि लोग अपने घर की चारदीवारी के अंदर कौन सी भाषा का इस्तेमाल करते हैं."

और बढ़ेंगे शरणार्थी

जर्मनी में 2015 में 230,000 शरणार्थियों के आने की संभावना है. यानि देश पर शरणार्थियों के बोझ में और बढ़ोतरी होगी. आप्रवासियों और शरणार्थियों के केंद्रीय मुख्यालय के प्रमुख मानफ्रेड श्मिट ने जर्मन अखबार राइनिशे पोस्ट से बात करते हुए कहा, "नए अनुमान के मुताबिक 2015 में शरण के लिए करीब 230,000 नई अर्जियों की संभावना है." जर्मनी यूरोप में शरणार्थियों का सबसे बड़ा ठिकाना बनता जा रहा है. 2014 में करीब 200,000 शरणार्थी अर्जियों का अनुमान लगाया गया है जो कि 2013 के मुकाबले 60 फीसदी ज्यादा है. सीरिया, इराक और अफगानिस्तान में जारी जंग के माहौल ने वहां के रहने वालों को विस्थापन के लिए मजबूर कर दिया है. जर्मनी के लिए शरणार्थियों की बढ़ती संख्या से निपटना मुश्किल सवाल बनता जा रहा है.

जर्मनी की तेजी से बूढ़ी हो रही आबादी और घटती जन्म दर के चलते देश को आप्रवासियों की जरूरत है ताकि जनसंख्या में कमी के कारण अर्थव्यवस्था को होने वाली चुनौती का सामना किया सके. जनसंख्या में कमी से सरकारी पेंशन और राष्ट्रीय चिकित्सा तंत्र के प्रभावित होने की भी संभावना रहती है. लेकिन बहुत से जर्मन इस बात से सहज महसूस नहीं करते कि अन्य देशों के लोग उनके यहां आकर रहें और अच्छी नौकरियों पर कब्जा कर लें.

एसएफ/एमजे (रॉयटर्स,एएफपी)

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