जर्मनी में बायो प्रोडक्ट लोकप्रिय | दुनिया | DW | 13.02.2013
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दुनिया

जर्मनी में बायो प्रोडक्ट लोकप्रिय

जर्मनी में बिना रसायनों का इस्तेमाल किए तैयार किए गए बायो प्रोडक्ट की लोकप्रियता बढ़ रही है. पिछले साल लोगों ने इन पर 7 अरब यूरो खर्च किए. लेकिन जमीन के महंगे होने के कारण किसान इस मांग का फायदा नहीं उठा पा रहे हैं.

कुछ साल पहले तक फसल बढ़ाने पर जोर था, लोगों को सस्ता अनाज उपलब्ध करना महत्वपूर्ण था. बायो उत्पादों का बाजार बहुत छोटा था. कम ही लोग थे जो सही तरीके से उगाए गए अनाज और परंपरागत तरीके से किए गए पशुपालन के लिए ज्यादा खर्च करने को तैयार थे. इस बीच बायो प्रोडक्ट हर परिवार के खान पान का अहम हिस्सा बन गया है. मार्केटिंग सर्वे कंपनी जीएफके के हेल्मुट हुब्श कहते हैं कि हर परिवार कम से कम एक ऑर्गेनिक उत्पाद तो खरीदता ही है. इस बीच 30 से 40 फीसदी जर्मन नियमित रूप बायो प्रोडक्ट खरीदते हैं जबकि 15 फीसदी लोग अपनी जरूरत का ज्यादा सामान बायो दुकानों से खरीदते हैं.

इसका असर बाजार पर भी दिखने लगा है. खाद्य विशेषज्ञों के अनुसार पिछले साल सात अरब यूरो का कारोबार हुआ जो एक साल पहले के मुकाबले छह फीसदी ज्यादा है. कोई आश्चर्य नहीं कि बायो उत्पादों का दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार मेला भी जर्मनी में ही होता है. बुधवार से न्यूरेम्बर्ग में बायोफाख शुरू हो रहा है.

Deutschland Supermarkt Lebensmittel Obst und Gemüse

बायो उत्पादों की बिक्री भले ही बढ़ रही हो, लेकिन जहां तक उपभोक्ता के करीब उसके उत्पादन का सवाल है, उसमें मुश्किलें बनी हुई हैं. बायो खाद्य पदार्थों के संगठन के अलेक्जांडर गैर्बर बताते हैं कि बिक्री और दुकानों में वृद्धि हुई है लेकिन बायो प्रोडक्ट के उत्पादन में ठहराव है. इसका नतीजा यह हुआ है कि दूसरे देशों से बायो उत्पादों का आयात बढ़ रहा है. गैर्बर कहते हैं कि इससे पता चलता है कि परंपरागत खेती के मुकाबले ऑर्गेनिक खेती की प्रतिस्पर्धी क्षमता मुश्किल है.

जर्मन कृषि मंत्री इल्जे आइगर ने जर्मन किसानों से अपील की है कि वे बायो खेती पर ज्यादा ध्यान दें. उनका कहना है कि जर्मन किसानों को देश में बायो उत्पादों की मांग को खुद पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए. जर्मन सरकार भविष्य में जर्मनी के बायो किसानों की बेहतर तरीके से वित्तीय मदद करने पर विचार कर रही है. उनका कहना है कि 2014 से बायो खेती शुरू करने और बनाए रखने के लिए ज्यादा रियायत दी जाएगी.

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पर्यावरण का ख्याल रखते हुए खेती करने वाले किसानों की सबसे बड़ी मुश्किल खेतों की कमी है. जमीन का किराये जिस तेजी से बढ़ रहा है उसे बायो किसान देने की हालत में नहीं हैं. बायो गैस संयंत्रों को बढ़ावा देने की वजह से मक्के की खेती की मांग बढ़ गई है और खेत महंगे हो गए हैं. बहुत सी जगहों पर तो बढ़ा हुआ किराया न दे पाने के कारण बायो किसानों को खेती की जमीन बढ़ाने के बदले कम करनी पड़ी है.

इतना ही नहीं, पंरपरागत खेती में भी मुनाफा बढ़ा है. इसलिए परंपरागत खेती छोड़कर बायो खेती करना उतना आकर्षक नहीं रहा है. दूसरी ओर नए किसानों को शुरू में कुछ नुकसान भी उठाना पड़ता है क्योंकि शुरुआती दो तीन साल उन्हें जैविक तरीके से खेती करनी पड़ती है लेकिन इस फसल को सिर्फ परंपरागत बाजार में सस्ते में बेचना पड़ता है. इसलिए नए किसानों को बायो खेती के लिए लुभाना मुश्किल हो गया है.

एक और मुश्किल बायो खेती के लिए सरकारी रियायत की है. प्रांतीय सरकारें पैसा समाप्त होते ही सब्सिडी देना बंद कर देती हैं. गैर्बर सरकारों से विश्वसनीयता की मांग करते हैं. सरकारी सब्सिडी और अगले साल से लागू होने वाली यूरोपीय कृषि नीति बायोफाख मेले में विचार विमर्श के केंद्र में होगी. बायो उत्पाद विक्रेता संघ की एल्के रोएडर का कहना है कि बायो समुदाय इस बीच इतना बड़ा और व्यापक हो गया है कि उसे समुदाय कहना उचित नहीं होगा. यह खाद्य बाजार का एक सेक्टर है.

लेकिन पुराने लोग भी इस बाजार के विकास पर जमकर बहस कर रहे हैं. जहां पहले रासायनिक खादों का इस्तेमाल न करने और परंपरागत तरीके से खेती करने पर जोर दिया जाता था अब यह पूछा जा रहा है कि क्या परंपारगत बाजार में आ रहा हर नयापन बायो क्वालिटी में भी होना चाहिए या फिर पशु और पेड़ पौधों की सुरक्षा, जैव विविधता और टिकाऊ खेती को बहस में केंद्र में लाया जाना चाहिए. बहुमत दूसरे विकल्प के पक्ष में है. पिछले साल बायोफाख में शामिल होने वाले विशेषज्ञों ने दोहरे इस्तेमाल वाली मुर्गी को बेहतरीन नया उत्पाद चुना था. यह अंडा और मीट दोनों देती है. लिहाजा चिकन के लिए मुर्गे को माने की जरूरत नहीं.

एमजे/ओएसजे (डीपीए, एएफपी)

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