जर्मनी में परंपरागत ईस्टर शांति रैलियां | दुनिया | DW | 18.04.2014
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दुनिया

जर्मनी में परंपरागत ईस्टर शांति रैलियां

जर्मनी के कई शहरों में रैलियों साथ शांति आंदोलन का परंपरागत ईस्टर अभियान शुरू हुआ है. इस साल के शांति मार्चों के केंद्र में यूक्रेन का बढ़ता विवाद है. साथ ही पहले विश्वयुद्ध की 100वीं वर्षगांठ भी मनाई जा रही है.

जर्मनी में शीतयुद्ध के समय से ही ईस्टर की छुट्टियों के दौरान शांति रैलियों की परंपरा है. गुड फ्राइडे के दिन से शुरू होने वाली रैलियां सोमवार तक चलती हैं. शुक्रवार को ग्रोनाउ शहर में जर्मनी के यूरेनियम संवर्धन करने वाले कारखाने के सामने प्रदर्शन हुआ और प्रदर्शनकारियों ने दुनिया भर में परमाणु संयंत्रों को बंद करने की मांग की. इस साल के रैलियों में एक शांतिपूर्ण विश्व की मांग की जा रही है. पिछली सदी में हुए दो विश्व युद्धों में 40 लाख से ज्यादा लोग मारे गए थे. यूक्रेन में बढ़ते तनाव के बीच आयोजकों ने रूस और नाटो से यूक्रेन में संयम बरतने की मांग की है.

आयोजकों के अनुसार शुक्रवार को हेस्से प्रांत के ब्रुखकोएबेल, पूर्वी जर्मन शहर केमनित्स और डॉर्टमुंड के निकट बिटरमार्क में भी प्रदर्शन हुए. बिटरमार्क में नाजियों ने द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने से ठीक पहले अप्रैल 1945 में राजनीतिक बंदियों और नाजियों का विरोध करने वालों को गुड फ्राइडे के दिन गोलियों से भून डाला था.

उत्साह में कमी

यूक्रेन विवाद, सीरिया में जारी संकट और पहले विश्व युद्ध की वर्षगांठ के बावजूद शुरुआती रैलियों में सिर्फ कुछ सौ लोगों का आना आयोजकों के लिए सरदर्द पैदा कर रहा है. फ्रैंकफुर्ट के आयोजन ब्यूरो के विली फॉन ऊयेन ने कहा कि प्रतिक्रिया पिछले साल जैसी थी और शांति आंदोलन को यह दिखाने में सफलता मिली है कि वह पूरे देश में उपस्थित है. विरोध प्रदर्शनों पर शोध करने वाले बर्लिन के रिसर्चर डीटर रूख्त का कहना है कि शांति मार्चों के उत्कर्ष से हम कोसों दूर हैं. 1980 के दशक में हर साल 6 से 7 लाख प्रदर्शनकारी शांति रैलियों में भाग लेते थे.

प्रदर्शन विशेषज्ञ लोगों में शांति मार्चों के लिए लिए उत्साह में कमी के लिए कई वजहें बता रहे हैं. समाजशास्त्री रूख्त का कहना है, "जब कई राजनीतिक मुद्दों पर एक साथ चर्चा होती है तो लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए मुद्दों की प्रतिद्वंद्विता शुरू हो जाती है." रूख्त का कहना है कि इस समय वित्तीय संकट और यूरो की स्थिरता जैसे मुद्दे शांति से ज्यादा अहम हैं.

असैनिक यूरोपीय संघ

ईस्टर के मौके पर शांति मार्चों की परंपरा ब्रिटेन में शुरू हुई जब नामचीन ब्रिटिश दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल के आह्वान पर लंदन में 10,000 लोग परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग करने के लिए इकट्ठा हुए. जर्मनी में इसकी शुरुआत 1960 में हुई थी जब शांतिवादी कार्यकर्ताओं ने बैर्गेन-होने में परमाणु रॉकेटों के अभ्यास केंद्र को प्रदर्शन के लिए चुना था. जर्मनी में शांति मार्च तब अपने उत्कर्ष पर रहे जब देश में परमाणु बिजली विरोधी आंदोलन के अलावा वियतनाम युद्ध विरोधी भावनाएं चरम पर थीं.

आयोजकों के अनुसार इस साल शांति मार्चों के सिलसिले में देश भर में 80 आयोजन किए जा रहे हैं. अलग अलग शहरों में रैलियां शनिवार, रविवार और सोमवार को जारी रहेंगी. अगले महीने होने वाले यूरोपीय चुनावों से प्रदर्शनकारी एक असैनिक यूरोपीय संघ की मांग कर रहे हैं, "जो निरस्त्रीकरण, विवाद के असैनिक समाधान और शरणार्थियों को पनाह देने का पक्षधर हो."

ईस्टर के दौरान प्रदर्शनों का आयोजन करने वाले कार्यकर्ता और संगठन इस बात की आलोचना कर रहे हैं कि यूरोप से हथियार बनाने वाले उद्यम पूरी दुनिया के संकट क्षेत्रों में युद्ध के लिए हथियार बेच रहे हैं. जर्मनी अमेरिका और रूस के बाद तीसरा सबसे बड़ा हथियार विक्रेता है. शांतिवादियों का कहना है कि हथियारों की बिक्री के कारण यूरोपीय संघ लाखों लोगों के पलायन और विस्थापन के लिए जिम्मेदार है.

एमजे/आईबी (डीपीए, एएफपी)

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