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दुनिया

जर्मनी में नयी सरकार और यूरोप में सुधारों के प्रयास

जर्मनी के चुनाव नतीजे न सिर्फ जर्मनी पर असर डालेंगे बल्कि इनका असर यूरोपीय संघ की राजनीति पर सीधे तौर पर दिखेगा. जर्मन संसद में एएफडी के आने का मैर्केल और फ्रांस के राष्ट्रपति माक्रों की नीतियों पर गहरा असर होगा.

चुनाव नतीजों के बाद अब चांसलर अंगेला मैर्केल की सीडीयू के लिए यह तय कर पाना मुश्किल होगा कि इन चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनने की खुशी मनायी जाए या जर्मन राजनीति में अब तक के अपने सबसे खराब प्रदर्शन पर पार्टी चिंतन करें. सीडीयू-सीएसयू को बेशक इन चुनावों में लगभग 33 फीसदी वोट मिले हैं लेकिन यह  1949 में गठन के बाद से पार्टी का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है. ये नतीजे न सिर्फ मैर्केल को प्रभावित करेंगे बल्कि इसका असर मैर्केल और फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों के उस विचार पर भी पड़ेगा जिसका मकसद यूरोप के मौजूदा रूप में बदलाव लाना है.

चुनाव परिणाम और उसके बाद एसपीडी के विपक्ष में जाने का फैसला सीडीयू-सीएसयू के साथ, पर्यावरण मुद्दे पर लड़ने वाली ग्रीन पार्टी और कारोबारियों की पार्टी मानी जाने वाली एफडीपी के गठबंधन की ओर इशारा करती है. लेकिन भावी गठबंधन के ये दोनों ही संभावित सदस्य राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों की यूरोपीय नीतियों के घोर आलोचक रहे हैं. ऐसे में जर्मनी और फ्रांस की यूरोपीय संघ को लेकर जो सोच बनती दिख रही थी वह जरूर ही प्रभावित हो सकती है.

मैर्केल के सामने न सिर्फ गठबंधन चलाने की चुनौती होगी बल्कि इस बार उनका सामना तीखे विपक्ष से भी होगा जो हर कदम पर मैर्केल से सवाल करेगा. पिछले 12 साल में मैर्केल के लिए विपक्ष कभी इतना बड़ा मुद्दा नहीं था लेकिन इस बार विरोध में महज एक विपक्ष नहीं बल्कि एक उग्र विचार है. संसद में आने से पहले ही एएफडी पार्टी की नेता एलिस वाइडल मैर्केल को संसदीय जांच की धमकी दे चुकी हैं. किसी भी धुर दक्षिणपंथी पार्टी के लिए बुंडेसटाग में प्रवेश करना दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहला मौका होगा, इसलिए एएफडी का जोश भी अपने चरम पर रहेगा.

जर्मन मार्शल फंड के बर्लिन कार्यालय से जुड़े थॉमस क्लाइन-ब्रॉकहोफ कहते हैं, "मेरे विचार में यूरो जोन में सुधार ही विदेश नीति का सबसे अहम मुद्दा है जो नई सरकार के सामने एक चुनौती होगा." ब्रॉकहोफ के मुताबिक मैर्केल की रूढ़िवादी सीडीयू के लिए इस गठबंधन में काम करना आसान नहीं होगा. नतीजों के बाद जहां ग्रीन पार्टी ने "मजबूत यूरोप" को अपनी प्राथमिकता बताया है तो वहीं एफडीपी यूरोपीय स्तर पर नीतियों को एकीकृत करने के खिलाफ है. ब्रॉकहोफ के मुताबिक, "यह गठबंधन फ्रेंको-जर्मन सौदेबाजी के लिए भी आदर्श स्थिति नहीं है."

फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने जर्मनी के साथ मिलकर यूरोप का पुनर्गठन करने का वायदा किया था ताकि न सिर्फ आर्थिक संकट से उबरा जा सके बल्कि यूरोपीय संघ को ब्रिटेन से बाहर हो जाने के बाद जो नुकसान हुआ है उसकी भी भरपाई की जा सके. अपने एक भाषण में माक्रों ने इन विचारों पर रोशनी डालते हुए कहा कि उन्होंने एकल मुद्रा ब्लॉक के लिए काम करना शुरू कर दिया है. इस विचार को अब तक मैर्केल का सहयोग भी मिलता रहा है. लेकिन नई सरकार की संभावित पार्टी एफडीपी के साथ और विपक्षी दल एएफडी की मौजूदगी में इस तरह का यूरोपीय एकीकरण बेहद ही चुनौती भरा साबित होगा.

अपने चुनाव अभियान में उदारवादी एफडीपी ने यूरोप के ईएसएम बेलआउट फंड को खत्म करने  साथ उन संधियों में बदलाव की वकालत की थी जो यूरोपीय देशों को यूरोपीय संघ छोड़ने की इजाजत देते हैं. ग्रीन पार्टी के नेता फ्रांसिस्का ब्रांटनर के मुताबिक, "यूरोप में एफडीपी भी एएफडी से अलग नहीं है. अगर एफडीपी के विचारों पर अमल किया जाए तो यूरोपीय संकट खड़ा हो जाएगा." गठबंधन में सिर्फ एफडीपी ही मैर्केल की मुश्किल नहीं होगी बल्कि सीडीयू की सहोदर पार्टी सीएसयू भी नये गठबंधन में रच-बस पायेगी कि नहीं ये भी एक बड़ा सवाल है. एएफडी का शानदार प्रदर्शन बवेरिया में सीएसयू के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है. अगले साल राज्य में चुनाव होने हैं जो सीएसयू को सीधे नुकसान पहुंचा सकते हैं.

अपने नये कार्यकाल में चांसलर मैर्केल और सीडीयू के रूढ़िवादी खेमे के लिए उन मतदाताओं को अपनी ओर वापस लाना सबसे बड़ी चुनौती होगी जिन्होंने इन चुनावों में एएफडी पर भरोसा जताया है. इससे साफ है कि भविष्य में जर्मनी की शरणार्थी नीति में भी बदलाव नजर आएगा.

हालांकि चुनाव के पहले से ही मैर्केल के करीबी अधिकारी यूरो जोन में तात्कालिक सुधार की बात करते हुए यूरोपीय सीमाओं की सुरक्षा के लिए प्रयासरत हैं और साथ ही पूरे यूरोपीय ब्लॉक में शरणार्थियों के समान वितरण की बात कर रहे हैं. एक जर्मन अधिकारी के मुताबिक, "शरणार्थीं समस्या अगर दूसरी बार भी पैदा होती है तो यह पूरे यूरोप के लिए दूसरे यूरोजोन संकट के बराबर होगी." ये अधिकारी यूरोपीय अर्थव्यवस्था की मजबूती पर विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि माक्रों को यूरोजोन की उनकी शानदार नीतियों के चलते ही चुना गया था. हालांकि सर्वे बताते हैं कि जर्मनी और फ्रांस के लोग ही माक्रों की यूरो जोन बजट जैसी नीतियों पर सबसे अधिक संदेह व्यक्त करते हैं. एक सर्वे के मुताबिक फ्रांस के महज 31 फीसदी लोग और 39 प्रतिशत जर्मन ही मानते हैं कि यूरोजोन बजट का प्रयोग आर्थिक रूप से कमजोर देशों के लिए किया जाना चाहिए.

एए/एमजे (रॉयटर्स)

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