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दुनिया

जर्मनी में जल रही है घृणा की आग

सीरिया और उत्तरी अफ्रीका से यूरोपीय संघ आने वाले शरणार्थियों की सबसे बड़ी संख्या जर्मनी में है. तादाद बढ़ रही है लेकिन पिछले कुछ वक्त से शरणार्थी स्थलों पर हो रहे हमले दिखाते हैं कि जर्मनी में स्थिति तनावपूर्ण है.

वे लोग सीरिया, इरिट्रिया और कोसोवो जैसे देशों से आते हैं. ऐसे देश, जो गृहयुद्ध या ऐसे ही किसी भीषण संकट से गुजर रहे हैं. एक सुरक्षित जीवन की तलाश में वे जर्मनी पहुंचते हैं. अधिकतर उनके पास महज कुछ जोड़ी कपड़ों के अलावा और कुछ भी नहीं होता. ताजा आंकड़ों के अनुसार इस साल जून तक ही पौने दो लाख से ज्यादा लोग जर्मनी में शरण पाने के आवेदन दे चुके हैं.

लेकिन जर्मनी के नागरिक यह साफ करते जा रहे हैं कि वे अपने आसपास इन शरणार्थियों को नहीं चाहते. और अपना बैर वे केवल विरोध प्रदर्शन और मोर्चों के ही जरिए नहीं दिखा रहे, बल्कि उनमें से कई तो अब आग का भी प्रयोग करने लगे हैं. इस साल जर्मनी में शरणार्थी के लिए बने घरों पर आगजनी के 13 मामले सामने आए हैं, यानि हर महीने औसतन दो हमले.

पूरे देश में हमले

हाल ही में दक्षिणी शहर रेमषिंगेन में एक खाली इमारत को आग लगा दी गयी. इस इमारत को शरणार्थियों के रहने के लिए तैयार किया जा रहा था. कुल 70,000 यूरो का नुकसान हुआ. पिछले गुरूवार एक दूसरे शहर राइषर्ट्सहोफेन में भी ऐसा ही हुआ. सितंबर से उस इमारत में 67 शरणार्थियों को ठहराने की योजना थी. शहर के मेयर मिषाएल फ्रांकेन इस हादसे से सदमे में दिखे. कड़े शब्दों में उन्होंने घोषणा की कि एक सितंबर को शरणार्थी यहां आ कर ही रहेंगे.

आगजनी के ये मामले किसी एक इलाके या प्रांत तक सीमित नहीं हैं. पूरे देश में ही इस तरह के वाकये सामने आ रहे हैं. मिसाल के तौर पर पूर्वी शहर सोसेन में दो उग्रदक्षिणपंथियों ने एक शरणार्थी शिविर में आग लगाई, पश्चिमी शहर कोसफेल्ड में एक स्कूल के मैदान में लगे तंबुओं को आग के हवाले कर दिया गया. यहां पहले से ही शरणार्थी रह रहे थे. फिर उत्तरी शहर एशेबुर्ग में एक 38 वर्षीय पुरुष ने इसलिए एक घर पर पेट्रोल का कनस्तर फैंक दिया कि वहां इराकी शरणार्थी ना आ सकें. और दक्षिणी प्रांत बवेरिया के हेपबैर्ग में भी अनजान लोगों ने शरणार्थियों के लिए बन रही एक इमारत में आग लगाई.

बढ़ता उग्रदक्षिणपंथ

इनमें से अधिकतर हमले उन जगहों पर हुए जहां शरणार्थी अभी आए नहीं हैं. कई जगहों पर उनके आने से महीनों पहले हमले हुए, तो कई जगह कुछ हफ्ते या दिन पहले. बीलेफेल्ड यूनिवर्सिटी के आंद्रेयास सिक बताते हैं, "इन घटनाओं से पता चलता है कि उग्रदक्षिणपंथ बढ़ रहा है. हमलावर यह साबित करना चाहते हैं कि विरोध प्रदर्शन बहुत हुए, अब वे मामले को अपने हाथ में ले रहे हैं."

जर्मनी में उग्रदक्षिणपंथ के खिलाफ काम करने वाली संस्था अमादेयो आंतोनियो फाउंडेशन के रोबर्ट लुडेके कहते हैं कि अगर राज्य सरकारें योजनानुसार ना चल कर शरणार्थियों को कहीं और भेजने के बारे में विचार करने लगती हैं, तो यह सबसे बुरा कदम साबित होगा, "पीछे हट जाना बहुत बड़ी गलती होगी. उन्हें चाहिए कि वे दिखाएं कि उग्रदक्षिणपंथी उन्हें नहीं बता सकते कि क्या करना है."

समेकन की राह

लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसे समाज में, जो शरणार्थियों को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं है, हमलों को रोका कैसे जाए. इस पर लुडेके कहते हैं, "नगरपालिका को सुनिश्चित करना होगा कि नागरिकों को शुरू से ही सूचित किया जाता रहे. उन्हें लोगों को समझाना होगा कि शरणार्थी क्यों आ रहे हैं, वे किन मुश्किल हालात से गुजर रहे हैं. और इस पूरी प्रक्रिया के लिए प्रशिक्षित लोगों की जरूरत है."

बीलेफेल्ड यूनिवर्सिटी के आंद्रेयास सिक का भी मानना है कि समेकन की राह पर नागरिकों को शरणार्थियों के साथ मिल कर चलना होगा और नेताओं को भी इसमें अपनी भूमिका समझनी होगी. आने वाले समय में शरण के लिए आवेदन देने वालों की संख्या में कमी आने के कोई आसार नजर नहीं आते. और जब तक जर्मनी के लोग शरणार्थियों की दिक्कतों को समझेंगे नहीं, तब तक देश में स्थिति तनावपूर्ण बनी रहेगी.

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