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दुनिया

जर्मनी पर दबाव डालता कोयला

जर्मनी जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर आवाज बुलंद करता आया है. लेकिन पेरिस जलवायु समझौते पर जर्मनी की प्रतिबद्धता को लेकर विशेषज्ञ संदेह जाहिर करते रहे हैं. सवाल अब भी वही है कि क्या नयी सरकार इस ओर कोई कदम उठायेगी?

अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन समझौतों पर चांसलर अंगेला मैर्केल की ओर से जतायी गई प्रतिबद्धता और देश का जीवाश्म ईंधन और नाभिकीय ऊर्जा से हटकर अक्षय ऊर्जा को प्रोत्साहित करने की नीति को दुनिया भर में सराहना मिली है, लेकिन व्यावहारिकता में इस पर कितना अमल किया गया यह अब सवालों के घेरे में है.

जर्मनी आज भी अपने सस्ते ऊर्जा स्रोतों को इस्तेमाल करने से बाज नहीं आ रहा है और न ही इसके कार्बन उत्सर्जन में कोई खास कमी आई है. देश में अब भी लिग्नाइट और सस्ते भूरे कोयले (ब्राउन कोल) का खनन किया जा रहा है जो अन्य ऊर्जा स्रोतों के मुकाबले अधिक उत्सर्जन करते हैं. अब पर्यावरणविदों के सुर में सुर मिलाते हुए एक सरकारी विशेषज्ञ सलाहकारी परिषद ने जर्मन सरकार से ऐसे तापीय संयंत्रों को तुरंत बंद करने की अपील की है. परिषद की एक सदस्य कलाउडिया केम्फर्ट के मुताबिक, "जर्मनी को बिजली उत्पादन के लिए कोयले का इस्तेमाल तुरंत घटाना चाहिए और आखिरी तापीय बिजली संयंत्र भी 20 सालों के भीतर बंद कर दिया जाना चाहिए." केम्फर्ट और उनके साथियों का कहना है कि अगले चार साल जर्मनी के लिए पेरिस जलवायु समझौते के तहत ग्लोबल वार्मिंग की 2 डिग्री सेल्सियस तक कम रखने का आखिरी मौका हो सकता है. हालांकि अब अक्षय ऊर्जा देश की लगभग एक तिहाई बिजली मांग को पूरा कर रहा है लेकिन तापीय ऊर्जा के इस्तेमाल को घटाने के लिए तुरंत कदम उठाने होंगे. 

तीखी बहस

पिछले लंबे समय से पर्यावरणवादी जर्मनी की कोयले पर बढ़ती निर्भरता के खिलाफ आवाज उठाते आये हैं और अब वे अपने इस विरोध को कोयला खनन के शुरूआती स्तर तक ले गये हैं. हाल में ही, कार्यकर्ताओं ने यहां की निजी बिजली कंपनी आरडब्ल्यूई के खिलाफ मुहिम छेड़ी और कोयला खनन के लिए कंपनी की जंगल साफ करने की योजना का विरोध किया. अगस्त में यूरोप के तमाम कार्यकर्ताओं ने जर्मनी के कोयले समृद्ध प्रदेश नार्थ राइन-वेस्टफेलिया में जमकर विरोध किया. लेकिन बहस सिर्फ कोयले पर निर्भरता को कम करने से जुड़ी नहीं है. दरअसल इस कोयला उद्योग में देश के हजारों लोग कार्यरत हैं जिन्हें सरकार का कोई भी कदम आर्थिक रूप से परेशानी में डाल सकता है. अगर इस उद्योग में कोई कटौती की जाती है तो हजारों लोगों की नौकरी जा सकती है, इन्हीं सामाजिक, आर्थिक प्रभावों से बचने के लिए अब तक नेता कोयले के इस्तेमाल को पूर्ण रूप से नहीं रोक पाये हैं. इन्हीं वजहों के चलते तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के बीच चांसलर मैर्केल भी प्रदूषण फैलाने वाले इस उद्योग का समर्थन करती रहीं हैं.  

पर्यावरण के मुद्दे पर आवाज उठाने वाली जर्मनी की ग्रीन पार्टी ही इकलौता ऐसा राजनीतिक दल है जो कोयले के इस्तेमाल पर तुंरत रोक लगाने की पक्षधर है. अब इस ग्रीन पार्टी के नई गठबंधन सरकार में हिस्सा बनने के कयास हैं तो इस मुद्दे को समर्थन मिलने की भी उम्मीद की जा रही है. लेकिन कारोबारियों की पार्टी जाने वाली एफडीपी इसे जल्द भविष्य में बंद करने के पक्ष में नहीं हैं. मैर्केल की पार्टी फिलहाल ग्रीन्स और एफडीपी के साथ गठबंधन वार्ता में जुटी हुई है लेकिन अब कोयले जैसे पर्यावरण मुद्दे को लेकर इनका क्या रुख होगा यह अब तक साफ नहीं है. लेकिन सलाहकारी परिषद को उम्मीद है कि नई सरकार इस मसले पर गंभीरता से विचार करेगी.

अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी

पोस्टडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च और सलाहकार परिषद के सदस्य वोल्फगांग लुचे के मुताबिक अगर जर्मनी कार्बन डायआक्साइड की उत्सर्जन दर 2000 मेगाटन तक सीमित कर लेता है, तो देश उत्सर्जन के अपने न्यूनतम 2 फीसदी लक्ष्य को हासिल करने में सक्षम रहेगा. उन्होंने कहा कि हम आदर्श स्थिति में उत्सर्जन लक्ष्य को घटा कर 1.5 डिग्री सेल्सियस तक कर सकते हैं. लेकिन इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भी जर्मनी को अपने तापीय बिजली संयंत्र अगले दो से ढाई साल के बीच बंद करने होंगे. लेकिन इस आदर्श स्थिति में जर्मनी के कार्बन डाइआक्साइड के पिछले रिकॉर्ड को शामिल नहीं किया गया है. अगर जर्मनी के उत्सर्जन से जुड़े पुराने आंकड़ों पर नजर डाले तो जर्मनी ने अब उत्सर्जन बजट में तय सीमा को  पार कर लिया है.

कोयला कैसे हो खत्म

जर्मनी के लिए कोयला परिचालन के प्रस्ताव को तत्काल स्वीकार करना मौजूदा राजनीतिक स्थिति में असंभव है. विशेषज्ञों ने देश को कोयले से मुक्त करने का रणनीतिक प्रस्ताव दिया है. इसमें सबसे पहले, पुराने और अक्षम संयंत्र को साल 2020 तक बंद किया जाना शामिल है. स्टडी के मुताबिक इससे जर्मनी को साल 2020 तक अपने जलवायु परिवर्तन लक्ष्यों को हासिल करने का मौका मिलेगा. इसी के साथ अन्य तापीय संयंत्रों पर भी नजर रखी जाये और स्थायी बिजली आपूर्ति की अन्य व्यवस्था अपनाते हुए धीरे-धीरे इन्हें बंद कर दिया जाये और इस क्रम में आखिरी संयंत्र साल 2030 तक बंद कर दिया जाये. ये योजना नाभिकीय ऊर्जा के इस्तेमाल को समाप्त करने की जर्मन सरकार की प्रतिबद्धता को भी बताती है, जिसके तहत देश के सभी नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों को साल 2022 तक बंद करने का लक्ष्य तय किया है. अगले साल, एक "कोल कमीशन" के गठन की योजना है जो कोयले के इस्तेमाल पर रोक लगाने की संभावित रणनीतियों पर विचार करेगा और देखेगा कि तापीय ऊर्जा पर निर्भर उद्योग की समस्याओं का समाधान कैसे निकाला जाये. हालांकि पर्यावरणविदों को डर है कि यह एक लंबी प्रक्रिया हो सकता है.

रिपोर्ट- गेरो रुएटर, काथरीन वेकर

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